SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF INAUGURATION A FREE FITMENT CAMP ORGANISED IN CHANDIGARH WITH THE SUPPORT OF THE SOCIAL WELFARE DEPARTMENT AND THE LORD MAHAVIR DISABLED ASSISTANCE COM
- by Admin
- 2026-05-11 18:50
तीन दिवसीय ‘‘इंटीग्रेटिड असेसमेंट-कम-फिटमेंट कैंप’’ के अवसर पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 11.05.2026, सोमवार समयः शाम 05:00 बजे स्थानः चंडीगढ़
नमस्कार!
आज इस तीन दिवसीय निःशुल्क “इंटीग्रेटेड असेसमेंट-कम-फिटमेंट कैम्प” के अवसर पर उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। यह शिविर समाज कल्याण, महिला एवं बाल विकास विभाग, चण्डीगढ़ प्रशासन द्वारा भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति अर्थात ‘जयपुर फुट’ के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है।
सबसे पहले, मैं इस सराहनीय पहल से जुड़े सभी अधिकारियों, डॉक्टरों, विशेषज्ञों, स्वयंसेवकों एवं आयोजकों का हृदय से अभिनंदन करता हूँ, जिन्होंने इस शिविर को सफल बनाने के लिए निरंतर प्रयास किए हैं। विशेष रूप से मैं भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति का आभार व्यक्त करता हूँ, जिसने लाखों दिव्यांगजनों के जीवन में नई आशा और नया आत्मविश्वास जगाने का कार्य किया है।
वर्ष 1975 में आदरणीय श्री डी.आर. मेहता जी द्वारा स्थापित यह संस्था, आज केवल एक नाम नहीं, बल्कि दुनिया भर के लाखों दिव्यांगजनों के लिए ‘उम्मीद की एक किरण’ बन चुकी है। मुझे यह बताते हुए अत्यंत गर्व होता है कि यह संस्था दिव्यांगजनों को निःशुल्क कृत्रिम अंग, कैलीपर्स, व्हीलचेयर, ट्राईसाइकिल, श्रवण यंत्र और अन्य सहायक उपकरण उपलब्ध कराने वाली दुनिया की सबसे बड़ी संस्था है।
जरा इन आंकड़ों की विशालता और सेवा भाव पर गौर कीजिए! आज भारत भर में इस संगठन के 36 केंद्र दिन-रात कार्य कर रहे हैं। इसके अलावा, लाभार्थियों की सहूलियत के लिए हर साल लगभग 50 कृत्रिम अंग वितरण शिविर लगाए जाते हैं। ‘‘दिव्यांगजनों को गतिशीलता और गरिमा प्रदान करना’’, यही इस संस्था का मूल मंत्र है। इसी उद्देश्य के साथ, यह संगठन प्रति वर्ष लगभग 90 हजार दिव्यांग भाई-बहनों को उपकरण सौंपकर उन्हें उनके पैरों पर खड़ा कर रहा है। अब तक 25 लाख से अधिक दिव्यांगजनों का सफल पुनर्वास किया जा चुका है। विश्व के इतिहास में ऐसा निस्वार्थ मानवीय कार्य वास्तव में बेमिसाल है।
मित्रो,
इस संस्था की सबसे बड़ी तकनीकी पहचान ‘जयपुर फुट’ के रूप में पूरी दुनिया में विख्यात है। यह सिर्फ एक कृत्रिम पैर नहीं है; यह एक इंसान की खोई हुई आजादी और उसका स्वाभिमान है। लचीलेपन, कार्य-क्षमता और बनावट में यह मानव पैर के इतने करीब है कि इसे पहनकर घुटने के नीचे कटे अंग वाला कोई भी व्यक्ति न केवल चल और दौड़ सकता है, बल्कि ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर आसानी से सफर कर सकता है। वह साइकिल चला सकता है, कार चला सकता है, पेड़ पर चढ़ सकता है और यहाँ तक कि तैर भी सकता है!
और सबसे बड़ी बात इसकी लागत है। जहाँ अमेरिका जैसे विकसित देशों में इस स्तर के कृत्रिम अंग की कीमत लगभग 10 हजार डॉलर (लाखों रुपये) होती है, वहीं हमारा स्वदेशी ‘जयपुर फुट’ मात्र 100 डॉलर के औसत खर्च में तैयार हो जाता है। और संस्था की महानता देखिए कि यह उपकरण जरूरतमंदों को पूरी तरह निःशुल्क प्रदान किया जाता है।
बड़े ही गर्व का विषय है कि इनकी तकनीकी उत्कृष्टता को आज वैश्विक मंचों पर सराहा जा रहा है। अमेरिका की प्रसिद्ध स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर इन्होंने एक विशेष ‘फोर-बार लिंकेज नी जॉइंट’ (घुटने का जोड़) विकसित किया, जिसे प्रतिष्ठित ‘टाइम मैगज़ीन’ ने 2009 के दुनिया के 50 सर्वश्रेष्ठ आविष्कारों में शामिल किया था।
इस संगठन की विश्वसनीयता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि संयुक्त राष्ट्र संघ की आर्थिक एवं सामाजिक परिषद ने इसे ‘विशेष परामर्शदाता’ (Special Consultative Status) का दर्जा दिया है।
प्रसिद्ध क्रेडिट रेटिंग एजेंसी CARE ने भी इस संस्था को 'A-1' रेटिंग प्रदान की है, जो किसी भी चैरिटेबल संस्था के लिए सर्वोच्च सम्मान है।
मेरा मानना है कि यह संस्था आज हमारे ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के संदेश की सबसे बड़ी वैश्विक ब्रांड एंबेसडर है। भारत में केंद्रित रहने के साथ-साथ, पिछले कुछ वर्षों में संस्था ने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के 50 देशों (जैसे अफ़ग़ानिस्तान, इराक, सीरिया, नेपाल, रवांडा आदि) में 120 अंतरराष्ट्रीय शिविर लगाए हैं।
महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर भारत सरकार के विदेश मंत्रालय द्वारा शुरू किए गए ‘इंडिया फॉर ह्यूमैनिटी’ (India for Humanity) कार्यक्रम के तहत, इस संस्था ने 25 देशों में 31 शिविर लगाकर 17 हजार से अधिक लोगों को नया जीवन दिया। संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय, न्यूयॉर्क में भी 2018 में ‘जयपुर फुट के 50 वर्ष’ पर एक विशेष सम्मेलन और प्रदर्शनी आयोजित की गई थी।
यह हमारे लिए अत्यंत हर्ष और असीम गौरव की बात है कि पूरी तरह निःशुल्क कृत्रिम अंग प्रदान करने वाली विश्व की इस सबसे बड़ी संस्था ने भारत की मानवीय संवेदना को वैश्विक स्तर पर एक नई और सशक्त पहचान दी है।
मुझे यह जानकर भी प्रसन्नता है कि समाज कल्याण विभाग लगातार दिव्यांगजनों के कल्याण एवं सशक्तिकरण के लिए कार्य कर रहा है। विभाग द्वारा पेंशन योजनाएँ, सहायक उपकरण, पुनर्वास सेवाएँ एवं अन्य अनेक कल्याणकारी योजनाएँ संचालित की जा रही हैं। यह शिविर उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
11 मई से 13 मई 2026 तक आयोजित इस शिविर में पात्र दिव्यांगजनों को कृत्रिम अंग एवं अन्य सहायक उपकरण पूर्णतः निःशुल्क प्रदान किए जाएंगे। विभिन्न आयु वर्ग के लाभार्थियों को विशेषज्ञों द्वारा पूरी संवेदनशीलता और सम्मान के साथ सेवाएँ प्रदान की जाएंगी।
आज यहाँ लगाया जाने वाला हर कृत्रिम अंग केवल तकनीक नहीं, बल्कि किसी व्यक्ति के जीवन में नई उम्मीद, नया आत्मविश्वास और नई शुरुआत है।
साथियो,
हम सभी जानते हैं कि चण्डीगढ़ में, बड़ी संख्या में दिव्यांगजन निवास करते हैं। विशेषकर वे लोग, जिनके हाथ या पैर किसी दुर्घटना, बीमारी या अन्य कारणों से प्रभावित हुए हैं, उन्हें दैनिक जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। चल पाना केवल शारीरिक आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता और जीवन में आगे बढ़ने का माध्यम है। इसलिए दिव्यांगजनों को बेहतर पुनर्वास सुविधाएँ उपलब्ध कराना केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि मानवता और सामाजिक न्याय के प्रति हमारी जिम्मेदारी है।
इसी सोच के साथ चण्डीगढ़ प्रशासन ने इस विशेष शिविर की परिकल्पना की।
यह शिविर इसलिए भी विशेष है क्योंकि यह केवल उपकरण वितरण शिविर नहीं है। सामान्यतः पहले लाभार्थियों का आकलन किया जाता है, फिर उनका माप लिया जाता है, उसके बाद कृत्रिम अंग तैयार होकर कई सप्ताह या महीनों बाद वितरित किए जाते हैं। लेकिन इस शिविर में “असेसमेंट” और “फिटमेंट” दोनों कार्य एक ही मंच पर किए जा रहे हैं। यह चण्डीगढ़ में अपनी तरह का एक अनूठा प्रयास है, जहाँ दिव्यांगजन को एक ही स्थान पर जांच, माप, निर्माण और फिटमेंट की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। इससे लाभार्थियों का समय भी बचेगा और उन्हें शीघ्र सहायता प्राप्त होगी।
देवियो और सज्जनो,
हमारे महान राष्ट्र भारत की आत्मा सदैव “देने”, “बाँटने” और “सेवा” की भावना से ओत-प्रोत रही है। यह वह पुण्यभूमि है जहाँ परोपकार को सबसे बड़ा धर्म माना गया है और जरूरतमंद की सहायता को मानव जीवन का सर्वोच्च कर्तव्य समझा गया है।
यह वह पावन भूमि है जहाँ तप, त्याग और परोपकार कभी किताबों के निर्जीव आदर्श नहीं रहे, बल्कि ये हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा और हमारी सांसों में बसे रहे हैं। याद कीजिए उस महान इतिहास को, जहाँ महर्षि दधीचि ने समाज की रक्षा के लिए हंसते-हंसते अपनी अस्थियों का दान कर दिया था। जहाँ कर्ण ने अपना अभेद्य कवच-कुंडल दान कर दिया। हमारे ऋषियों ने बिना किसी स्वार्थ के दुनिया को आयुर्वेद, योग और वेदों का ज्ञान दिया; हमारे गुरुओं ने इंसानियत की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया; और हमारे संतों ने अपने प्रेम से इस बंटे हुए समाज को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया।
भारत ने पूरी दुनिया को अहिंसा, करुणा और “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश दिया। हमने मानवता को यह सीख दी कि सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है और समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति की चिंता करना ही सच्ची सभ्यता का परिचायक है।
हमारी संस्कृति कहती है कि जो धन कमाया जाए, वह केवल अपने सुख के लिए नहीं; जो ज्ञान प्राप्त हो, वह केवल अपने तक सीमित न रहे; और जो सामर्थ्य मिले, वह समाज और राष्ट्र के कल्याण में लगे। यही कारण है कि हमारे यहाँ दान, सेवा, लंगर, अन्नक्षेत्र और लोककल्याण की परंपराएँ सदियों से जीवित हैं।
इसी “देने की संस्कृति” ने भारत को केवल एक भौगोलिक राष्ट्र नहीं, बल्कि मानवता, नैतिक मूल्यों और सह-अस्तित्व का जीवंत प्रतीक बनाया है। आज आवश्यकता है कि हम इन महान परंपराओं को आगे बढ़ाते हुए सेवा, सहयोग और संवेदनशीलता को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएं।
साथियो,
एक समय था जब समाज में शारीरिक अक्षमता को एक अभिशाप या कमजोरी माना जाता था। लेकिन हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने अपनी दूरदर्शी सोच से इस पूरे दृष्टिकोण को ही बदल कर रख दिया। प्रधानमंत्री जी ने ही देश को ‘विकलांग’ की जगह ‘दिव्यांग’ शब्द दिया। यह केवल एक शब्द नहीं है, यह एक सम्मान है। यह इस बात की स्वीकृति है कि यदि ईश्वर किसी व्यक्ति के शरीर में कोई एक कमी करता है, तो वह उसे किसी अन्य रूप में एक ‘दिव्य’ या असाधारण क्षमता भी प्रदान करता है।
सरकार का स्पष्ट मानना है कि ‘दिव्यांगता’ शरीर में नहीं, बल्कि अवसरों की कमी और समाज की सोच में होती है। इसी सोच के साथ, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने दिव्यांगजनों के जीवन को सुगम और सम्मानजनक बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
चाहे वह ‘सुगम्य भारत अभियान’ हो, जिसके तहत सार्वजनिक स्थानों को दिव्यांग-सुलभ बनाया जा रहा है, या फिर ‘एडिप योजना’ (ADIP Scheme & Assistance to Persons with Disabilities for Purchase/Fitting of Aids/Appliances) जिसके अंतर्गत दिव्यांगजनों को उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप सहायक उपकरण प्रदान किए जा रहे हैं। इन सभी पहलों के माध्यम से सरकार की संवेदनशीलता, प्रतिबद्धता और समावेशी विकास की सोच स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।
दिव्यांगजनों के अधिकारों को सशक्त बनाने की दिशा में ‘दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016’ एक ऐतिहासिक कदम है। 19 अप्रैल 2017 से लागू इस कानून ने 1995 के अधिनियम का स्थान लेते हुए दिव्यांगता की श्रेणियों को बढ़ाकर 21 किया, जिससे अधिक लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
साथ ही, विशिष्ट दिव्यांगजन पहचान पत्र (Unique Disability ID)परियोजना एक क्रांतिकारी पहल है जिसने दिव्यांगजनों को बार-बार प्रमाण पत्र बनवाने की परेशानी से मुक्त कर दिया है।
‘‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’’ के मंत्र से प्रेरित होकर मोदी सरकार ने 2014 से अब तक देशभर में 32 लाख से अधिक दिव्यांगजनों को सहायक उपकरण एंव यंत्र उपलब्ध करवाए हैं, जबकि लगभग 1 हजार दिव्यांगजनों को सूक्ष्म उद्यमों और आजीविका संबंधी गतिविधियों के विस्तार के लिए 18 करोड़ रूपये से अधिक के ऋण उपलब्ध करवाए गए।
इसके अतिरिक्त, दिव्यांगजनों की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पेंशन योजनाएँ, स्वास्थ्य बीमा और पुनर्वास केंद्रों का भी विस्तार किया गया है।
शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्र में भी, सरकार ने दिव्यांग छात्रों के लिए छात्रवृत्ति की राशि और दायरा दोनों बढ़ाए हैं। ‘स्किल इंडिया’ मिशन के तहत दिव्यांगजनों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, ताकि वे रोजगार प्राप्त कर सकें और ‘जॉब सीकर’ की बजाय ‘जॉब क्रिएटर’ बन सकें।
चंडीगढ़ प्रशासन भी इन सभी योजनाओं को पूरी संवेदनशीलता के साथ जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए पूर्णतः प्रतिबद्ध है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम “दया” नहीं, बल्कि “सम्मान और अवसर” की भावना से कार्य करें। हमें ऐसा वातावरण बनाना होगा जहाँ दिव्यांगजन बिना किसी बाधा के शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जीवन में भाग ले सकें।
साथियो,
दिव्यांगजन हमारे समाज का अभिन्न, सम्मानित और सशक्त अंग हैं। वे किसी भी दृष्टि से समाज से अलग या कम नहीं हैं, बल्कि अपनी विशिष्ट क्षमताओं, दृढ़ इच्छाशक्ति और रचनात्मक सोच के माध्यम से समाज को समृद्ध करने वाले नागरिक हैं।
जब हम दिव्यांगजन सशक्तिकरण की बात करते हैं, तो अनेक प्रेरक उदाहरण सामने आते हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि शारीरिक सीमाएँ कभी भी हौसलों की उड़ान को रोक नहीं सकतीं। आज भारत के दिव्यांगजन हर क्षेत्र में देश का गौरव बढ़ा रहे हैं।
खेल जगत में जम्मू-कश्मीर की शीतल देवी ने बिना हाथों के पैरों से तीर चलाकर एशियन पैरा गेम्स में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा। देवेंद्र झाझरिया ने पैरालंपिक में दो स्वर्ण और एक रजत पदक जीतकर देश का मान बढ़ाया।
इसी क्रम में अवनि लेखरा ने टोक्यो 2020 में स्वर्ण व कांस्य तथा पेरिस 2024 में पुनः स्वर्ण पदक जीतकर अदम्य साहस और संकल्प का उदाहरण प्रस्तुत किया। जबकि 2025 में भारत की दृष्टिबाधित महिला टीम ने भी टी-20 विश्व कप का खिताब जीतकर भारत की खेल-शक्ति का नया आयाम प्रस्तुत किया।
प्रशासनिक सेवाओं में इरा सिंघल ने 2014 में यू.पी.एस.सी. में प्रथम स्थान प्राप्त कर यह दिखाया कि शारीरिक चुनौती बुद्धिमत्ता और नेतृत्व को सीमित नहीं कर सकती। साहस की मिसाल अरुणिमा सिन्हा हैं, जिन्होंने कृत्रिम पैर के सहारे माउंट एवरेस्ट फतह किया। उद्यमिता में श्रीकांत बोला ने दृष्टिबाधा के बावजूद ‘बोलंट इंडस्ट्रीज’ की स्थापना कर सैकड़ों दिव्यांगजनों को रोजगार दिया।
कला के क्षेत्र में रविंद्र जैन जी ने जन्म से दृष्टिबाधित होते हुए भी भारतीय संगीत को अमर कृतियाँ दीं, जबकि सुधा चंद्रन ने कृत्रिम पैर के साथ नृत्य में नई ऊँचाइयाँ छूकर यह सिद्ध किया कि आत्म-अभिव्यक्ति पर कोई सीमा लागू नहीं होती।
ये सभी उदाहरण हमें सिखाते हैं कि अवसर, विश्वास और समर्थन मिले तो दिव्यांगजन असंभव को भी संभव बना सकते हैं।
मैं सभी विभागों, संस्थाओं, स्वयंसेवी संगठनों एवं समाज के लोगों से आग्रह करता हूँ कि वे दिव्यांगजनों के प्रति संवेदनशीलता और सहयोग की भावना को और मजबूत करें, ताकि हम मिलकर एक समावेशी और सुलभ समाज का निर्माण कर सकें।
अंत में, मैं यही कहना चाहूँगा कि किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति इस बात से तय होती है कि वह अपने जरूरतमंद और कमजोर वर्गों के प्रति कितना संवेदनशील और सहयोगी है।
आइए, हम सभी मिलकर प्रत्येक दिव्यांगजन के सम्मान, समान अवसर और आत्मनिर्भरता के लिए कार्य करने का संकल्प लें।
मैं एक बार पुनः समाज कल्याण विभाग एवं भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति (जयपुर फुट) को इस उत्कृष्ट पहल के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ तथा इस शिविर की सफलता के लिए अपनी शुभकामनाएँ देता हूँ।
बहुत-बहुत धन्यवाद।
जय हिन्द! जय भारत!