SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF THE GRAND CONSECRATION CEREMONY OF SHRI MUNSUVRATRA SWAMI JINALAYA AND SHRI MANIDHARI DADABARI AT CHHATTISGARH ON MAY 14, 2026.
- by Admin
- 2026-05-14 10:10
श्री मुनिसुव्रत स्वामी जिनालय एवं श्री मणिधारी दादाबाड़ी के गरिमामय प्रतिष्ठा कार्यक्रम के अवसर पर माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 14.05.2026, गुरूवार समयः सुबह 08:15 बजे स्थानः रायपुर, छत्तीसगढ़
ओम अर्हम्! जय जिनेन्द्र!
मंच पर विराजमान, त्याग और तपस्या की प्रतिमूर्ति, छत्तीसगढ़ शृंगार, परम पूज्य खरतरगच्छाचार्य श्री जिन पीयूषसागर सूरीश्वर जी म.सा. व नूतन आचार्य परम पूज्य श्री सम्यक रत्न सागर जी म.सा. के पावन चरणों में मेरा शत-शत नमन और भावपूर्ण वंदन!
इस भव्य जिनालय के निर्माण की प्रेरणा दात्री, परम पूज्य स्नेहयशा श्री जी म.सा. के श्री चरणों में मैं अपनी गहरी श्रद्धा और नमन अर्पित करता हूँ। यहाँ उपस्थित धर्मप्रेमी बंधुओं, माताओं, बहनों, इस गरिमामय आयोजन के लाभार्थी परिवारों, और रायपुर, छत्तीसगढ़ की इस पावन धरा के सभी सुधी नागरिकों, आप सभी को मेरा आदरपूर्ण नमस्कार!
आज जब मैं पंजाब से चलकर छत्तीसगढ़ की इस धर्मनगरी रायपुर में आया हूँ, तो पंजाब के राज्यपाल के रूप में मेरा हृदय जितना हर्षित है, उससे कहीं अधिक आनंदित मेरे भीतर का वह ‘श्रावक’ है, जिसे आज प्रभु के दरबार में और गुरु भगवंतों की छत्रछाया में बैठने का यह परम सौभाग्य मिला है। एक जैन होने के नाते, मेरे लिए यह क्षण केवल एक औपचारिक उपस्थिति नहीं है, बल्कि यह मेरी आत्मा, मेरे संस्कारों और मेरी आस्था का उत्सव है।
साधर्मिक भक्ति की शुरुआत में आज ‘श्री मुनिसुव्रत स्वामी जिनालय’ एवं ‘श्री मणिधारी दादाबाड़ी’ के इस गरिमामय एवं ऐतिहासिक प्रतिष्ठा कार्यक्रम में मुझे सम्मिलित होने का जो यह सुअवसर प्राप्त हुआ है, उसे मैं अपने जीवन के महान पुण्यों का फल मानता हूँ।
लगभग 10 हजार वर्गफुट के विशाल और पवित्र परिसर में निर्मित यह भव्य जिनालय एवं दादाबाड़ी केवल ईंट-पत्थरों की संरचना नहीं है, बल्कि यह हमारी आस्था और वीतरागता का एक जागृत केंद्र है। मुझे यह देखकर अत्यंत प्रसन्नता हुई कि इस परिसर में प्रभु की भक्ति के साथ-साथ, ज्ञान व साधना के लिए ‘उपासरा’ और साधर्मिक वात्सल्य के लिए ‘भोजनालय’ का भी अत्यंत सुंदर निर्माण किया गया है, जो हमारी श्रमण संस्कृति की सर्वांगीण और सर्व-समावेशी सोच को दर्शाता है।
बंधुओं,
हम अक्सर भव्य मंदिरों और जिनालयों का निर्माण देखते हैं, जो हमारी आस्था के केंद्र होते हैं। लेकिन आज का यह आयोजन अत्यंत ही प्रशंसा एवं अनुमोदना का विषय इसलिए है क्योंकि इस जिनालय निर्माण की प्रेरणा का उद्देश्य अत्यंत ही सारगर्भित और मानवता को दिशा देने वाला है।
मुझे यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता हुई कि इस जिनालय और दादाबाड़ी के ठीक सामने 60 हजार वर्गफुट की विशाल भूमि पर एक अभूतपूर्व प्रकल्प आकार ले रहा है। वहाँ 250 फ्लैटों की व्यवस्था की जा रही है, जहाँ हमारे जैन समुदाय के 250 साधर्मिक परिवारों को निःशुल्क सर्वसुविधायुक्त आवास उपलब्ध करवाए जाएंगे।
मैं समझता हूँ कि यह केवल एक ‘आवासीय योजना’ नहीं है; यह जैन दर्शन के मूल मंत्र ‘साधर्मिक वात्सल्य’ का सबसे उत्कृष्ट और जीवंत उदाहरण है। जब हमारे ये 250 परिवार समाज की मुख्यधारा के बीच और प्रभु के चरणों की छांव में एक साथ रहेंगे, तो निश्चित रूप से वे न केवल आर्थिक रूप से सुरक्षित और सशक्त होंगे, बल्कि धार्मिक व आध्यात्मिक रूप से भी अत्यंत समृद्ध बनेंगे। एक मजबूत, एकजुट और सुसंस्कृत समाज के निर्माण की दिशा में उठाया गया आपका यह भगीरथ कदम पूरे देश के लिए एक बहुत बड़ी प्रेरणा है।
जब हम किसी कमजोर भाई का हाथ पकड़कर उसे सहारा देते हैं, तो हम केवल उसे एक छत नहीं देते, बल्कि हम उसे वह संबल देते हैं जिससे वह धार्मिक व आर्थिक रूप से संपन्न हो सके और समाज की मुख्यधारा के साथ पूरे स्वाभिमान से कदम मिलाकर चल सके। यह प्रकल्प ‘नर सेवा ही नारायण सेवा है’ का सबसे बड़ा और जीवंत उदाहरण है।
इस महान धर्म प्रभावना के कार्य में, ध्वजा वाहक के रूप में श्री विवेक डागा परिवार ने जो उदारता दिखाई है, मैं उसकी बारम्बार अनुमोदना करता हूँ। लक्ष्मी तो बहुतों के पास होती है, लेकिन उस लक्ष्मी का सदुपयोग करने की सुबुद्धि प्रभु उसी को देते हैं, जिस पर उनकी विशेष कृपा होती है। डागा परिवार ने अपने धन को ‘सुधन’ बना लिया है।
साथ ही, उनके इस महान कार्य में एक मजबूत सहयोगी के रूप में श्रीमती कमला बाई चोपड़ा जी के योगदान की भी मैं भूरि-भूरि सराहना करता हूँ। मातृशक्ति जब धर्म के कार्यों में आगे आती है, तो पूरा समाज संस्कारवान बनता है।
इस अवसर पर, मैं विशेष रूप से श्री लाभचंद बाफना जी को भी अपनी शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ। राजनीति के साथ-साथ सामाजिक एवं धार्मिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाले और लाभार्थी परिवार को इस पुनीत कार्य के लिए प्रोत्साहित करने वाले बाफना जी जैसे कर्मयोगी ही समाज को एक नई दिशा देते हैं। आप सभी का यह सामूहिक प्रयास पूरे देश के लिए एक प्रेरणा है।
प्रिय बंधुओ,
जब हम इस सृष्टि की रचना को गहराई से देखते हैं, तो पाते हैं कि प्रकृति का कण-कण हमें केवल एक ही संदेश देता है, ‘परोपकार’। वृक्ष कभी अपना फल स्वयं नहीं खाते, नदियां कभी अपना जल स्वयं नहीं पीतीं, और सूर्य कभी अपने प्रकाश को अपने लिए बचा कर नहीं रखता। उनका अस्तित्व ही दूसरों के लिए है। हमारे शास्त्रों में महर्षि वेदव्यास जी ने 18 पुराणों का सार केवल इन दो पंक्तियों में कह दिया थाः
‘अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।।’
अर्थात, दूसरों की भलाई करना ही सबसे बड़ा पुण्य है, और दूसरों को पीड़ा पहुँचाना ही सबसे बड़ा पाप है। इंसान होने की हमारी सबसे बड़ी सार्थकता इसी बात में है कि हम केवल अपने लिए न जिएं, बल्कि किसी रोते हुए को हंसाएं, किसी गिरते हुए को उठाएं और किसी असहाय का संबल बनें।
मित्रो, धन-दौलत, पद और प्रतिष्ठा, ये सब भौतिक चीजें हैं, जो समय के साथ यहीं इसी दुनिया में छूट जाएंगी। सिकंदर भी जब इस दुनिया से गया था, तो उसके दोनों हाथ खाली थे। लेकिन जो चीज इंसान को अमर बनाती है, वह है उसका ‘परोपकार’। जब आप किसी भूखे को भोजन कराते हैं, किसी गरीब बच्चे की शिक्षा का प्रबंध करते हैं, या किसी बीमार का इलाज करवाते हैं, तो उस समय आप केवल उस व्यक्ति की मदद नहीं कर रहे होते, बल्कि आप उस परमपिता परमात्मा की सबसे सच्ची इबादत कर रहे होते हैं।
आज के इस भौतिकवादी युग में, जहाँ हर व्यक्ति केवल अपनी तरक्की और अपने बैंक बैलेंस की चिंता में दौड़ रहा है, वहाँ हमें यह याद रखना होगा कि सच्ची शांति और असीम आनंद किसी मॉल में या किसी महंगी कार में नहीं मिलता। वह आनंद तब मिलता है, जब आपके किसी छोटे से प्रयास से किसी जरूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान आती है।
परोपकार कोई दिखावा नहीं है; यह हमारी आत्मा का मूल स्वभाव है। जो समाज एक-दूसरे के प्रति करुणा और परोपकार की भावना रखता है, वह समाज न केवल सुरक्षित रहता है, बल्कि ईश्वर भी उस समाज पर अपनी विशेष कृपा बनाए रखता है।
इसलिए मैं चाहता हूं कि आज हम यह संकल्प लें कि हम अपने जीवन का कुछ हिस्सा, अपनी कमाई का कुछ अंश और अपने समय के कुछ पल, निस्वार्थ भाव से समाज और मानवता की सेवा में समर्पित करेंगे। क्योंकि अंततः, हमारी पहचान इस बात से नहीं होगी कि हमने क्या ‘पाया’, बल्कि इस बात से होगी कि हमने इस दुनिया को क्या ‘दिया’।
उपस्थित साधर्मिक बंधुओं,
आज जब हम दुनिया की ओर देखते हैं, तो पाते हैं कि सर्वत्र अशांति, युद्ध, तनाव और भौतिकता की अंधी दौड़ मची हुई है। ऐसे कठिन समय में भगवान महावीर का दर्शन और जैन धर्म के सिद्धांत पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक और आवश्यक हो गए हैं।
जैन धर्म केवल एक पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक जीवन शैली है। भगवान महावीर स्वामी ने हमें अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के जो ‘पंच महाव्रत’ का मार्ग दिखाया, वह वास्तव में मानवता के आध्यात्मिक और सामाजिक कल्याण का सबसे सटीक ब्लूप्रिंट है। हमारे तीर्थंकरों ने दुनिया को मुख्य रूप से तीन सबसे बड़े और शाश्वत मंत्र दिए हैं:
पहला है ‘अहिंसा’। ‘अहिंसा परमो धर्मः’ का उद्घोष हमें बताता है कि असली शूरवीर वह है जो किसी को मन, वचन और कर्म से कष्ट नहीं पहुँचाता। ‘जियो और जीने दो’ का यह महान संदेश आज ग्लोबल वार्मिंग से लेकर वैश्विक युद्धों तक, हर समस्या का अचूक समाधान है।
दूसरा महत्वपूर्ण स्तंभ ‘अपरिग्रह’ है, जिसका अर्थ है अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखकर, शेष संसाधनों को स्वेच्छा से समाज के हित में बांट देना। आज श्री विवेक डागा परिवार और श्रीमती कमला बाई चोपड़ा जी ने निःशुल्क आवास का जो यह अद्भुत प्रकल्प खड़ा किया है, वह वास्तव में इसी अपरिग्रह और दान-धर्म का एक जीवंत तथा अनुकरणीय उदाहरण है। संसाधनों पर कब्जा करने के बजाय, उन्हें परमार्थ के लिए छोड़ देना ही सच्चा सुख है।
और तीसरा शाश्वत मंत्र है ‘अनेकांतवाद’। आज समाज में वैचारिक असहिष्णुता लगातार बढ़ रही है और लोग केवल अपनी ही बात को सत्य मानते हैं। ऐसे अशांत माहौल में, अनेकांतवाद हमें दूसरों के विचारों का हृदय से सम्मान करना सिखाता है। अगर आज की दुनिया केवल इस सिद्धांत को अपना ले, तो विश्व के सारे वैचारिक और साम्प्रदायिक तनाव आज ही समाप्त हो जाएं।
प्रिय भक्तजनो,
भगवान महावीर के ये उपदेश केवल जैन समाज तक सीमित नहीं हैं; ये संपूर्ण मानव जाति के लिए एक मार्गदर्शक हैं। आज के समय में जब हिंसा और स्वार्थ चारों ओर व्याप्त है, तब जैन धर्म की यह शिक्षा कि ‘हमारे कर्म ही हमारे भविष्य को तय करते हैं’, हमें शांति और संतुलन की ओर ले जाती है।
आज विशेष रूप से हमारी युवा पीढ़ी को भगवान महावीर के आदर्शों से सीख लेकर अपने जीवन को सकारात्मक दिशा में मोड़ने की आवश्यकता है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यदि हम अपनी युवा शक्ति को सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह और करुणा की भावना से प्रेरित करें, तो हम निश्चित रूप से एक सशक्त, आत्मनिर्भर और विकसित भारत के निर्माण की दिशा में तेजी से आगे बढ़ेंगे।
मैं आज के युवाओं से विशेष आग्रह करता हूँ कि भगवान महावीर का जीवन केवल इतिहास नहीं है, वह प्रेरणा है, दर्शन है, और दिशा है। आज हमें आवश्यकता है कि हम टेक्नोलॉजी के साथ साथ अध्यात्म को भी अपनाएं, ताकि हमारा विकास पूर्ण और संतुलित हो सके।
महावीर के सिद्धांतों को आधुनिक संदर्भों में समझना और उन्हें आचरण में उतारना ही उनकी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
आज इस शुभ अवसर पर, मैं विशेष रूप से हमारे युवाओं से कहना चाहता हूँ कि वे अपने इन महान संस्कारों से जुड़ें। आप चाहे कितनी भी उच्च शिक्षा प्राप्त कर लें, कितने भी बड़े व्यवसायी बन जाएं, लेकिन अपने गुरुओं के प्रति विनय, अपने जिनालयों के प्रति भक्ति और अपने कमजोर साधर्मिक भाइयों के प्रति करुणा का भाव कभी मत छोड़ना। यही संस्कार आपको जीवन के हर संकट में खड़ा रखेंगे।
आज श्री मुनिसुव्रत स्वामी जिनालय के शिखरों पर जो यह धर्म की ध्वजा फहरा रही है, वह हमें निरंतर यह याद दिलाती रहेगी कि जीवन का अंतिम लक्ष्य आत्मा का कल्याण है।
मैं एक बार फिर, पूज्य गुरु भगवंतों के चरणों में अपनी वंदना अर्पित करता हूँ। छत्तीसगढ़ की इस धर्मप्राण जनता, आयोजकों और रायपुर के समाज को इस अद्भुत और ऐतिहासिक कार्य के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूँ।
ईश्वर करे, आपके द्वारा जलाया गया सेवा और साधर्मिक वात्सल्य का यह दीपक पूरे भारतवर्ष में ऐसे ही प्रकाश फैलाता रहे।
जय जिनेन्द्र!
आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद ।
जय हिंद! जय भारत!