SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF CHANDIGARH SAHITYA AKADEMI AWARD CEREMONY AT CHANDIGARH ON MAY 22, 2026.
- by Admin
- 2026-05-22 20:25
चंडीगढ़ साहित्य अकादमी के ‘वार्षिक सम्मान समारोह’ पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 22.05.2026, शुक्रवार समयः शाम 6:00 बजे स्थानः चंडीगढ़
नमस्कार!
आज सिटी ब्यूटीफुल, चंडीगढ़ की इस सांस्कृतिक और बौद्धिक शाम में, चंडीगढ़ साहित्य अकादमी के ‘वार्षिक सम्मान समारोह’ के इस गरिमामयी मंच पर आपके बीच उपस्थित होना मेरे लिए अत्यंत गौरव और हर्ष का विषय है। मैं इस बेहद सुरुचिपूर्ण और सफल आयोजन के लिए चंडीगढ़ साहित्य अकादमी को हृदय से बधाई देता हूँ।
जब हम इस भव्य आयोजन को देखते हैं, तो हमारे लिए चंडीगढ़ साहित्य अकादमी के गौरवशाली इतिहास और उसकी गौरवमयी यात्रा को जानना बेहद जरूरी है। संस्कृति विभाग, चंडीगढ़ प्रशासन के कुशल मार्गदर्शन में वर्ष 1980 में स्थापित यह अकादमी पिछले साढ़े चार दशकों से हमारे केंद्र शासित प्रदेश और इसके आसपास के क्षेत्रों में साहित्यिक गतिविधियों की मुख्य धुरी रही है।
यह अकादमी केवल एक संस्था नहीं, बल्कि हमारी भाषाई चेतना का जीवित प्रतीक है। इसका मुख्य उद्देश्य साहित्य के क्षेत्र में अध्ययन और अनुसंधान को बढ़ावा देना, साहित्यकारों और साहित्यिक संस्थाओं के बीच समन्वय स्थापित करना, और उत्कृष्ट रचनाओं, पत्रिकाओं व शोध-ग्रंथों का प्रकाशन करना है।
यह संस्था एक समृद्ध पुस्तकालय का रखरखाव करने के साथ-साथ योग्य साहित्यकारों को छात्रवृत्तियां और पुरस्कार प्रदान करती है। उत्कृष्ट उपलब्धियों के लिए कवियों, लेखकों और नाटककारों को सम्मानित करना, क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य का विकास करना और हिंदी, पंजाबी, उर्दू, संस्कृत व अंग्रेजी भाषाओं को जन-जन तक लोकप्रिय बनाना इसके मूल संकल्पों में शामिल है।
इतना ही नहीं, यह अकादमी स्थानीय भाषाओं से अंग्रेजी में और अंग्रेजी से स्थानीय भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्यिक कृतियों के अनुवाद को प्रोत्साहित करती है। यह भाषाई और साहित्यिक विषयों पर सेमिनार और संगोष्ठी आयोजित करके राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने का एक साझा मंच प्रदान करती है।
हर्ष का विषय है कि चण्डीगढ़ साहित्य अकादमी शहर के विभिन्न शिक्षण संस्थाओं, कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर हर आयु-वर्ग के युवाओं को अपने साहित्य एवं संस्कृति से जोड़ने में सफल रही है।
केंद्रीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली और हमारे पड़ोसी राज्यों की साहित्यिक संस्थाओं के साथ निरंतर जीवंत संपर्क बनाए रखकर, चंडीगढ़ साहित्य अकादमी हमारे समाज के बौद्धिक और सांस्कृतिक उत्थान के लिए निरंतर क्रियाशील है। मैं इस महान संस्था के इस भगीरथ प्रयास की खुले दिल से सराहना करता हूँ।
देवियो और सज्जनो,
आज जिन विभिन्न श्रेणियों में पुरस्कार प्रदान किए गए हैं, उनमें प्रथम श्रेणी में वरिष्ठ रचनाकारों को दिया जाने वाला "Award of Recognition" विशेष रूप से उल्लेखनीय है। हिंदी, पंजाबी, संस्कृत, उर्दू तथा अंग्रेज़ी के पाँचों विद्वानों को सम्मानित करते हुए मुझे विशेष गौरव की अनुभूति हुई है। आजीवन साहित्य साधना करने वाले लेखकों का सम्मान कर प्रशासन स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करता है।
दूसरी श्रेणी में "Best Book of the Year"पुरस्कार प्राप्त करने वाले 10 लेखकों को भी मैं हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ तथा उनसे आग्रह करता हूँ कि वे भारतीय संस्कृति एवं जीवन-मूल्यों को अपनी रचनाओं के केंद्र में स्थान दें। भारतीय जीवन-मूल्यों के संरक्षण और संवर्धन का दायित्व नई पीढ़ी के कंधों पर है।
तीसरी श्रेणी में युवा पुरस्कार प्राप्त करने वाली लेखिका को भी मैं बधाई देता हूँ। अकादमी द्वारा पहली बार इस पुरस्कार की शुरुआत किया जाना एक सराहनीय पहल है।
चौथी श्रेणी बाल पुरस्कार की है, जिसमें 15 बच्चों को सम्मानित किया गया है। पहली बार बाल पुरस्कार प्रारंभ करने के लिए मैं अकादमी को विशेष बधाई देता हूँ।
चण्डीगढ़ साहित्य अकादमी रचनाकारों को पुस्तक प्रकाशन हेतु अनुदान भी प्रदान करती है। नए लेखकों, कवियों तथा साहित्यकारों के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण सुविधा है।
मैं अनुदान प्राप्त करने वाले सभी रचनाकारों को भी बधाई देता हूँ तथा कामना करता हूँ कि उनकी आगामी पुस्तकें समाज में विशिष्ट स्थान प्राप्त करें।
मैं आज सम्मानित होने वाले सभी विद्वतजनों और साहित्यकारों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं देता हूँ।
देवियो और सज्जनो,
आज का यह समारोह केवल पुरस्कार बांटने का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह इंसानी जज्बातों, विचारों, शब्दों और हमारी समृद्ध भाषाई विरासत का उत्सव है।
जैसा कि हम देख पा रहे हैं कि आज के इस समारोह की सबसे खूबसूरत बात इसकी बहुभाषी और समावेशी प्रकृति है। भारत की असली ताकत हमारी भाषाई विविधता में है, और आज का यह मंच उस विविधता का साक्षात प्रतीक है।
चाहे वह देववाणी संस्कृत की प्राचीन और शाश्वत ज्ञान परंपरा हो, हिंदी की राष्ट्रव्यापी मिठास हो, पंजाबी का जीवंत और ओजस्वी स्वर हो, उर्दू की तहज़ीब और नफ़ासत हो, या फिर अंग्रेज़ी की वैश्विक अभिव्यक्ति हो, इन सभी भाषाओं के वरिष्ठ रचनाकारों ने अपनी लेखनी से चंडीगढ़ के साहित्यिक क्षितिज को वैश्विक पहचान दी है। आपकी रचनाओं ने समाज में विभिन्न विधाओं में उत्कृष्टता के नए प्रतिमान स्थापित किए हैं।
मित्रों,
शब्द और भाषा मानव इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी आविष्कार हैं। यदि भाषा हमारे संस्कारों और संस्कृति की वाहक है, तो साहित्य हमारे समाज की विचार-परंपरा का सच्चा संवाहक होता है। इतिहास साक्षी है कि जो समाज जितना अधिक जागृत और संवेदनशील होगा, उसका साहित्य भी उतना ही समृद्ध और व्यापक होगा।
कोई भी राष्ट्र मात्र धन-धान्य, गगनचुंबी इमारतों या आर्थिक आंकड़ों से महान और समृद्ध नहीं बनता; एक राष्ट्र अपनी वैचारिक गहराई, अपने नैतिक संस्कारों, अपने साहित्य और अपनी अनूठी सृजनशीलता से समृद्ध बनता है।
हम अक्सर सुनते हैं कि ‘साहित्य समाज का दर्पण होता है’, जो समाज की समकालीन स्थिति को हुबहू दिखाता है। लेकिन मेरा मानना है कि साहित्य केवल दर्पण नहीं है, बल्कि साहित्य समाज का वह प्रज्वलित ‘दीपक’ भी है, जो अज्ञानता और कुरीतियों के घने अंधेरे को चीरकर समाज को सही और न्यायपूर्ण रास्ता दिखाता है।
जब दुनिया सभ्यता के शुरुआती दौर में थी, तब हमारे ऋषियों ने वेदों और उपनिषदों के रूप में सर्वोच्च दर्शन की रचना की। आदिगुरु महर्षि वाल्मीकि की ‘रामायण’ और महर्षि वेदव्यास का ‘महाभारत’ केवल महाकाव्य नहीं हैं, बल्कि वे जीवन जीने के संपूर्ण विज्ञान हैं। इसके बाद महाकवि कालिदास ने ‘अभिज्ञानशाकुंतलम’ और ‘मेघदूत’ से कलात्मकता के वो शिखर छुए जो आज भी अद्वितीय हैं। आचार्य चाणक्य का ‘अर्थशास्त्र’ राजनीतिक और रणनीतिक दर्शन का वैश्विक प्रमाण है, तो विष्णु शर्मा का ‘पंचतंत्र’ सदियों से नीतिशास्त्र की पहली पाठशाला रहा है।
मध्यकाल में जब समाज निराशा में डूबा था, तब संत कबीर, गोस्वामी तुलसीदास, मीराबाई और पंजाब की पावन धरती पर गुरु नानक देव जी तथा अन्य गुरु साहिबान की वाणी ने समाज को पाखंडों से मुक्त कर मानवता, समानता और प्रेम के धागे में पिरोया। ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब’ दर्शन, अध्यात्म और काव्य का ऐसा विश्वस्तरीय ग्रंथ है जो सार्वभौमिक शांति का संदेश देता है।
आधुनिक युग में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने ‘गीतांजलि’ के माध्यम से भारतीय साहित्य को वैश्विक पटल पर स्थापित किया और वे नोबेल पुरस्कार से सम्मानित होने वाले पहले गैर-यूरोपीय बने। मुंशी प्रेमचंद ने शोषितों और किसानों की पीड़ा को अपनी कहानियों में जीवंत किया। वहीं, महाकवि सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ और पंजाब के अपने लाडले कवि भाई वीर सिंह, अमृता प्रीतम व प्रोफेसर पूरन सिंह और शिव कुमार बटालवी जैसी विभूतियों ने अपनी लेखनी से भारतीय चेतना और राष्ट्रीय स्वाभिमान को जगाने का ऐतिहासिक कार्य किया।
तभी तो हमारे बुजुर्गों ने बिल्कुल सच कहा है कि "The Pen is mightier than the Sword" यानी कलम की ताकत तलवार से कहीं अधिक होती है।
इसलिए, यह पूरे समाज का परम कर्तव्य है कि वह इन कलम के सिपाहियों और उनकी निस्वार्थ भावना का हृदय से उचित सम्मान करे।
लेकिन इसके साथ ही, मैं आज इस मंच से एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील बात आप सभी के सम्मुख रखना चाहता हूँ। हमारे महान संविधान ने हम सभी को ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ का मौलिक अधिकार दिया है। परंतु, इस अधिकार के साथ एक गहरी नैतिक जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है।
यह अपेक्षित है कि हम इस आज़ादी का उपयोग अत्यंत जिम्मेदारी से करें, न कि किसी की आस्था, विश्वास या व्यक्तिगत संवेदनाओं को आहत करने के लिए। अपनी वैचारिक स्वतंत्रता और अधिकारों का प्रयोग शब्दों की मर्यादा, भाषा के उच्च संस्कारों और अनुशासन के दायरे में रहकर भी बेहद खूबसूरती से किया जा सकता है।
आज के इस बदलते दौर में, हमारे युवा लेखकों द्वारा नए संदर्भों में, समकालीन विषयों पर बेहतरीन पुस्तकें लिखी जा रही हैं, तकनीक के साथ नए-नए प्रयोग किए जा रहे हैं। एक परिवर्तनशील समाज के बदलते सरोकारों और समसामयिक चुनौतियों पर हमारे प्रबुद्ध वर्ग की बेबाक टिप्पणी स्वाभाविक भी है और लोकतंत्र के लिए जरूरी भी है।
लेकिन, शब्दों के इन शिल्पकारों और लेखकों से समाज को यह बड़ी अपेक्षा रहती है कि उनकी लेखनी और टिप्पणी समाज में एक स्वस्थ, रचनात्मक और सौहार्दपूर्ण बौद्धिक विमर्श को जन्म दे, न कि समाज को बांटने वाले किसी अनावश्यक विवाद को। आपकी कलम जोड़ने वाली होनी चाहिए, तोड़ने वाली नहीं।
देवियो और सज्जनो,
हमारे दार्शनिकों ने सदैव साहित्य को समाज का मार्गदर्शक माना है। मुंशी प्रेमचंद जी ने कहा था, ‘‘साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।’’
जब समाज में नैतिक मूल्यों की क्षति होने लगती है, जब चारों ओर भौतिकता की अंधी दौड़ शुरू हो जाती है, तब एक साहित्यकार की कलम ही समाज को रुककर सोचने पर मजबूर करती है।
‘‘शब्द कभी मरते नहीं हैं, वे विचार बनकर इतिहास बदलते हैं।’’
एक अच्छा निबंध, एक मर्मस्पर्शी कविता, या एक संवेदनशील कहानी समाज की सोच को बदल सकती है। इतिहास गवाह है कि दुनिया की बड़ी से बड़ी क्रांतियों के पीछे किसी न किसी लेखक, कवि या विचारक के शब्द ही थे, जिन्होंने जनमानस की चेतना को जगाने का काम किया।
माननीय प्रधानमंत्री जी के ‘विकसित भारत 2047’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के विजन में केवल आर्थिक या तकनीकी प्रगति ही शामिल नहीं है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और भाषाई आत्मनिर्भरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। अपनी भाषाओं पर गर्व करना और उनके साहित्य को सहेजना हमारी राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा है।
चंडीगढ़ प्रशासन कला, संस्कृति और साहित्य के संरक्षण के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। हमारी यह निरंतर कोशिश रहती है कि हम नवोदित लेखकों और युवाओं को एक ऐसा मंच प्रदान करें जहाँ वे अपनी रचनात्मकता को खुलकर व्यक्त कर सकें।
डिजिटल युग के इस दौर में, जहाँ हमारी युवा पीढ़ी किताबों से दूर होकर स्क्रीन्स पर सिमटती जा रही है, वहाँ साहित्य अकादमियों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। हमें ऐसे कार्यक्रम और बुक-फेस्ट आयोजित करने होंगे जो युवाओं में दोबारा ‘रीडिंग कल्चर’ (पढ़ने की संस्कृति) को जीवित कर सकें।
मैं आज इस मंच पर उपस्थित हमारे सभी वरिष्ठ और युवा रचनाकारों से एक विशेष आग्रह करना चाहता हूँ। आज का युग तीव्र बदलाव का युग है। इस बदलते दौर में मानवीय संवेदनाओं को बचाए रखना आपकी लेखनी का सबसे बड़ा दायित्व है। आप अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण चेतना और नैतिक मूल्यों पर और अधिक ध्यान केंद्रित करें।
और हमारे प्यारे युवाओं से मैं यही कहूँगा कि सोशल मीडिया के दौर में ‘शॉर्ट्स’ और ‘रील्स’ के सतही ज्ञान से बाहर निकलिए। हमारे इन वरिष्ठ लेखकों के उपन्यासों, कविताओं और ग्रंथों को पढ़िए। इनमें जीवन का वह अथाह अनुभव छिपा है, जो आपको दुनिया के किसी सर्च इंजन पर नहीं मिल सकता।
अंत में, मैं एक बार फिर चंडीगढ़ साहित्य अकादमी को इस भव्य और प्रेरक आयोजन के लिए साधुवाद देता हूँ। सभी सम्मानित पुरस्कार विजेताओं को सादर नमन करता हूँ। आपकी लेखनी का यह सफर अविरल चलता रहे और आप इसी तरह समाज का मार्गदर्शन करते रहें, यही ईश्वर से कामना है।
आइए, हम सब मिलकर अपनी भाषाओं का सम्मान करें, साहित्य का उत्सव मनाएं और एक वैचारिक रूप से समृद्ध, सुशिक्षित और सुसंस्कृत समाज का निर्माण करें।
आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद,
जय हिन्द!
जय भारत!