SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF VALEDICTORY CEREMONY OF CULTURAL CARAVAN:HERITAGE 2026 OGgANISED AT TAGORE THEATRE SECTOR 18 CHANDIGARH ON MAY 25, 2026.
- by Admin
- 2026-05-25 20:45
‘कल्चरल कारवां’ कार्यक्रम के अवसर पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 25.05.2026, सोमवार समयः शाम 6:30 बजे स्थानः चंडीगढ़
नमस्कार!
आज “कल्चरल कारवां” के इस भव्य, बहुरंगी एवं सांस्कृतिक चेतना से ओत-प्रोत आयोजन में आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता और गौरव की अनुभूति हो रही है। यह आयोजन केवल कला, संगीत और साहित्य का उत्सव नहीं है, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिक चेतना, साहित्यिक परंपरा और सामाजिक समरसता का जीवंत उत्सव है।
मैं इस दो दिवसीय भव्य आयोजन के लिए ‘जश्न-ए-अदब: साहित्योत्सव’ के समर्पित आयोजकों को हार्दिक बधाई देता हूँ, जिन्होंने शास्त्रीय संगीत, ग़ज़ल गायन, पैनल चर्चा, काव्य गोष्ठी, हिंदुस्तानी हास्य, वाद्य संगीत, कव्वाली, मुशायरा, कवि सम्मेलन, सूफी एवं लोक संगीत जैसी विविध कलाओं को एक मंच पर लाकर भारतीय संस्कृति की बहुरंगी छटा को अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। वास्तव में यह आयोजन भारतीय कला, साहित्य और संगीत का एक सतरंगी इंद्रधनुष प्रतीत होता है, जिसमें हमारी सांस्कृतिक विविधता की अद्भुत झलक दिखाई देती है।
मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि ‘जश्न-ए-अदब: साहित्योत्सव’ की स्थापना वर्ष 2012 में श्री कुंवर रंजीत चौहान जी द्वारा इस उद्देश्य के साथ की गई थी कि भारत की विविधताओं से समृद्ध संस्कृति, साहित्य और कलाओं को देश के प्रत्येक नागरिक तक पहुँचाया जा सके। यह केवल एक सांस्कृतिक मंच नहीं, बल्कि भारतीयता की आत्मा को जन-जन से जोड़ने का एक सशक्त अभियान बन चुका है।
कुंवर रंजीत चौहान जी के दूरदर्शी नेतृत्व तथा इसके अध्यक्ष, पूर्व आई.आर.एस. अधिकारी श्री नवनीत सोनी जी के मार्गदर्शन में यह सांस्कृतिक यात्रा आज एक विराट स्वरूप धारण कर चुकी है। मुंबई, दिल्ली, पुणे, लखनऊ, अहमदाबाद, श्रीनगर, पटना, भोपाल, जयपुर, गुरुग्राम और नोएडा सहित देश के अनेक शहरों में आयोजित होकर यह “कल्चरल कारवां” भारतीय संस्कृति, साहित्य और कला के विविध आयामों को जन-जन तक पहुँचाने का सराहनीय कार्य कर रहा है।
मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि पूर्व में इस मंच पर अमिताभ बच्चन, पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, गुलज़ार, स्वर्गीय शारदा सिन्हा तथा पंडित छन्नूलाल मिश्र जैसे महान कलाकार अपनी प्रस्तुतियां दे चुके हैं।
इसके साथ ही, इस संस्था के संरक्षकों में पद्म विभूषण सोनल मानसिंह, पद्म भूषण पंडित साजन मिश्रा, पद्मश्री अशोक चक्रधर, पद्मश्री यश गुलाटी तथा पद्मश्री पंडित रोनू मजूमदार जैसी साहित्य, संगीत और कला जगत की प्रतिष्ठित विभूतियाँ जुड़ी रही हैं।
‘जश्न-ए-अदब: साहित्योत्सव’ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह भारत की बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक परंपरा को एक साझा मंच प्रदान करता है। यहाँ हिंदी, उर्दू, पंजाबी, मराठी, गुजराती, बंगाली सहित अनेक भाषाओं के साहित्यकार, कवि, कलाकार और चिंतक एकत्र होकर अपनी रचनात्मकता के माध्यम से “विविधता में एकता” की भारतीय भावना को साकार करते हैं।
“कल्चरल कारवां” केवल काव्य-पाठ या संगीत प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कथा-वाचन, कहानी-प्रस्तुति, शास्त्रीय संगीत, कवि सम्मेलन, मुशायरे, सूफी गायन और अन्य कलात्मक विधाओं का ऐसा समन्वित संगम है, जो भारतीय सांस्कृतिक विरासत के व्यापक स्वरूप को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। यह आयोजन न केवल कला के विभिन्न रूपों को मंच देता है, बल्कि समाज को संवेदनशीलता, संवाद, सौहार्द और सांस्कृतिक चेतना से भी जोड़ता है।
साथियो,
भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की सांस्कृतिक चेतना का प्रवाह है। यहाँ की संस्कृति विविधताओं में एकता का अनुपम उदाहरण है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक और कच्छ से कामाख्या तक, भाषा बदलती है, वेशभूषा बदलती है, लोक परंपराएँ बदलती हैं, लेकिन प्रेम, करुणा, सह-अस्तित्व और आध्यात्मिक चेतना से ओत-प्रोत भारत की आत्मा सदैव एक ही रहती है।
हमारी सांस्कृतिक परंपराएँ केवल मंचों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे हमारे जीवन, व्यवहार, उत्सवों, साहित्य, संगीत और लोक स्मृतियों में जीवित हैं। भारतीय संगीत की स्वर लहरियाँ, सूफी कव्वालियों की आध्यात्मिकता, ग़ज़लों की संवेदनशीलता, कवि सम्मेलनों की ओजस्विता और लोकगीतों की मिट्टी की महक, ये सभी मिलकर भारत की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर विशिष्ट बनाते हैं।
जब हम शास्त्रीय संगीत की बात करते हैं, तो हमारे मन में पंडित भीमसेन जोशी, एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी, पंडित रवि शंकर और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ जैसी महान विभूतियों की स्मृतियाँ स्वतः जागृत हो जाती हैं। इन कलाकारों ने अपनी साधना से भारतीय संगीत को विश्व पटल पर प्रतिष्ठा दिलाई।
इसी प्रकार ग़ज़ल और सूफी संगीत की दुनिया में जगजीत सिंह, मेहदी हसन, भूपिंदर सिंह, बेगम अख़्तर और पंकज उधास जैसे महान कलाकारों ने प्रेम, इंसानियत और आध्यात्मिकता का संदेश जन-जन तक पहुँचाया।
साहित्य और कविता के क्षेत्र में हरिवंश राय बच्चन, रामधारी सिंह दिनकर, मिर्ज़ा ग़ालिब, अमृता प्रीतम तथा शिव कुमार बटालवी जैसे साहित्यकारों ने शब्दों के माध्यम से समाज को दिशा देने का कार्य किया।
इन महान कलाकारों ने जो ‘सांस्कृतिक कारवां’ शुरू किया था, उसे आज आप जैसे कलाकार आगे बढ़ा रहे हैं, जो वास्तव में एक पुनीत कार्य है।
साथियो,
जब हम भारतीय संस्कृति की विविधता और “अनेकता में एकता” की बात करते हैं, तो उसका मूल भाव राष्ट्रीय एकात्मता ही होता है। हमारी भाषाएँ, वेशभूषाएँ, लोक परंपराएँ और जीवन-शैलियाँ भले अलग हों, किन्तु यही विविधताएँ भारत की मूल एकता को इंद्रधुषी सुंदरता प्रदान करती हैं। हम चाहे वनवासी हों, ग्रामवासी हों या नगरवासी, सबसे पहले हम भारतीय हैं। यही भावना हमें हर परिस्थिति में एक सूत्र में बाँधे रखती है।
इतिहास में अनेक बार हमारे समाज को बाँटने और कमजोर करने के प्रयास हुए, किन्तु भारतीयता की भावना से ओत-प्रोत संतों, कवियों और स्वतंत्रता सेनानियों ने सदैव राष्ट्रीय एकता की मशाल जलाए रखी। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक भारत की भावनात्मक एकता को सुदृढ़ करने में हमारी सांस्कृतिक परंपराओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति, दर्शन, योग, आयुर्वेद, कला, संगीत और साहित्य का प्रभाव विश्वभर में रहा है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसे भारतीय जीवन मूल्यों ने पूरी मानवता को सह-अस्तित्व और करुणा का संदेश दिया है। इस गौरवशाली विरासत को सहेजना और आगे बढ़ाना हम सभी का दायित्व है।
सदियों की पराधीनता के दौरान विदेशी शक्तियों ने न केवल भारत का आर्थिक शोषण किया, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना और आत्मविश्वास को भी कमजोर करने का प्रयास किया। आज विकसित भारत के निर्माण के लिए आवश्यक है कि हम “राष्ट्र सर्वोपरि” की भावना को और अधिक मजबूत करें।
मुझे प्रसन्नता है कि आज देश में औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति की दिशा में अनेक सकारात्मक प्रयास किए जा रहे हैं। 19वीं सदी के कानूनों की जगह अब भारतीय न्याय व्यवस्था में भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम जैसे नए प्रावधान लागू किए गए हैं। “राजपथ” का नाम बदलकर “कर्तव्य पथ” किया गया है तथा राष्ट्रपति भवन के “दरबार हॉल” को “गणतंत्र मंडप” नाम दिया गया है। ये परिवर्तन केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि भारतीय आत्मगौरव और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के प्रतीक हैं।
हाल ही में उच्चतम न्यायालय में स्थापित नई “लेडी जस्टिस” प्रतिमा, जिसकी आँखों पर पट्टी नहीं है, यह संदेश देती है कि भारतीय न्याय व्यवस्था सत्य, संवेदनशीलता और न्यायपूर्ण दृष्टि पर आधारित है। ऐसे सभी प्रयास भारत को उसकी सांस्कृतिक चेतना, आत्मसम्मान और राष्ट्रीय गौरव से पुनः जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
देवियो और सज्जनो,
कला और संस्कृति को संरक्षित करना केवल कलाकारों या साहित्यकारों का दायित्व नहीं, बल्कि एक राष्ट्र के रूप में हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। किसी भी देश की वास्तविक पहचान उसकी सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं, भाषाओं, लोक कलाओं और आध्यात्मिक मूल्यों से होती है।
भारत सरकार भी हमारी प्राचीन एवं समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण, संवर्धन और वैश्विक प्रचार-प्रसार के लिए निरंतर प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रही है। “एक भारत श्रेष्ठ भारत” जैसी पहल के माध्यम से विभिन्न राज्यों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे देश की विविधता में एकता और अधिक सशक्त हो सके।
इसी प्रकार अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से जुड़ी योजनाओं के माध्यम से दुर्लभ लोक कलाओं, लोक नृत्यों, मौखिक परंपराओं और विलुप्त होती सांस्कृतिक विधाओं को संरक्षित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया जा रहा है।
“गुरु-शिष्य परंपरा” जैसी योजनाएँ नई पीढ़ी के कलाकारों को महान गुरुओं के सानिध्य में कला सीखने का अवसर प्रदान कर रही हैं, ताकि हमारी पारंपरिक कलाओं की निरंतरता बनी रहे।
वहीं “प्रशाद” (PRASHAD - Pilgrimage Rejuvenation and Spiritual, Heritage Augmentation Drive) और “हृदय” (HRIDAY – Heritage City Development And Augmentation Yojna) जैसी योजनाओं द्वारा देश के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक स्थलों का संरक्षण एवं पुनर्विकास किया जा रहा है, जिससे हमारी सांस्कृतिक और स्थापत्य विरासत सुरक्षित रह सके।
सरकार द्वारा नाटक, लोक कला, संगीत, साहित्य और सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े संगठनों को वित्तीय सहायता एवं प्रोत्साहन भी प्रदान किया जा रहा है, ताकि ऐसे “कल्चरल कारवां” निरंतर आगे बढ़ते रहें और भारतीय संस्कृति की ज्योति पीढ़ी दर पीढ़ी प्रज्ज्वलित होती रहे।
साथियो,
पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत की सांस्कृतिक यात्रा रंगोली की तरह निखरी है। हम्पी के कालातीत मंदिरों से लेकर शास्त्रीय संगीत और नृत्य की जीवंत परंपराओं तक, सरकार ने मूर्त और अमूर्त दोनों तरह की विरासत को नई ऊर्जा दी है। भूले-बिसरे नायकों को याद किया गया है और आधुनिक साधनों के माध्यम से प्राचीन ज्ञान को संरक्षित किया गया है।
भव्य काशी विश्वनाथ कॉरिडोर से लेकर अयोध्या में राम लला की दिव्य उपस्थिति तक, सरकार विरासत को संरक्षित कर रही है और सांस्कृतिक जड़ों को गहरा कर रही है।
देश की खोई हुई सांस्कृतिक विरासत को वापस लाना भी वर्तमान सरकार की महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में शामिल रहा है। वर्ष 2013 से पहले विदेशों से भारत को केवल 13 चोरी की गई प्राचीन वस्तुएँ ही वापस प्राप्त हो सकी थीं। किन्तु वर्ष 2014 के बाद इस दिशा में व्यापक और गंभीर प्रयास किए गए, जिसके परिणामस्वरूप अब तक 642 चोरी की गई प्राचीन वस्तुओं का पता लगाया जा चुका है तथा उन्हें विभिन्न चरणों में भारत वापस लाने की प्रक्रिया जारी है।
वर्ष 2016 से अब तक केवल अमेरिका से ही भारत को लौटाई गई सांस्कृतिक कलाकृतियों की कुल संख्या 578 तक पहुँच चुकी है, जो किसी भी एक देश द्वारा भारत को वापस की गई सांस्कृतिक धरोहरों की सर्वाधिक संख्या है।
साथियो,
हम सभी का दायित्व है कि हम अपनी सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति सजग रहें और आने वाली पीढ़ियों को भारत की इस गौरवशाली विरासत से जोड़ें।
मैं आज इस सभागार में उपस्थित युवाओं से विशेष रूप से कुछ कहना चाहता हूँ। हम 21वीं सदी के तकनीकी युग में जी रहे हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सोशल मीडिया के इस दौर में आधुनिक होना बहुत जरूरी है, लेकिन अपनी जड़ों को भूलकर नहीं।
याद रखिए, ‘‘एक पेड़ चाहे कितना भी ऊंचा क्यों न हो जाए, अगर उसकी जड़ें जमीन से कट जाएं, तो उसका पतन निश्चित है।’’
आप दुनिया की हर तकनीक सीखें, पश्चिमी देशों के विकास का अध्ययन करें, लेकिन जब बात पहचान की हो, तो अपने लोक-गीतों को, अपनी मातृभाषा को, और अपने महान साहित्य को कभी न छोड़ें। तकनीक आपको दुनिया से जोड़ेगी, लेकिन आपकी संस्कृति आपको खुद से जोड़ेगी। आप ही हमारे सांस्कृतिक राजदूत हैं, और इस विरासत की मशाल अब आपके हाथों में है।
अंत में, मैं इस शानदार ‘सांस्कृतिक कारवां’ के सफल आयोजन के लिए ‘जश्न-ए-अदब: साहित्योत्सव’ की पूरी टीम की प्रशंसा करता हूँ। यह कोई सामान्य कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज को जोड़ने वाला एक वैचारिक और आध्यात्मिक अनुष्ठान है।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि यहाँ गूंजने वाले सुर, यहाँ पढ़ी जाने वाली कविताएं, और हास्य-व्यंग्य के ठहाके हमें जीवन की एक नई ऊर्जा से भर देंगे।
मैं सभी कलाकारों का एक बार फिर सम्मान करता हूँ और आप सभी दर्शकों व श्रोताओं के सुखद अनुभव की कामना करता हूँ। यह कारवां यूँ ही निरंतर चलता रहे और हमारी संस्कृति की खुशबू पूरे विश्व में फैलती रहे, यही मेरी शुभकामना है।
‘‘रौशन रहे यह महफ़िल, यूं ही सजे ये मंच, संस्कृति की यह गंगा, बहती रहे अनंत।’’
बहुत-बहुत धन्यवाद।
जय हिंद! जय भारत!