SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF RELEASING THE BOOK ATAL SANSMARAN AT PUNJAB LOK BHAVAN ON MAY 27, 2026.

‘‘अटल संस्मरण’’ पुस्तक के लोकार्पण कार्यक्रम के अवसर पर

राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 27.05.2026,  बुधवारसमयः सुबह 10:00 बजेस्थानः पंजाब लोक भवन

         

नमस्कार!

आज का दिन मेरे लिए अत्यंत भावुक और गौरवपूर्ण है। आज हम यहाँ उस महामानव, भारतीय राजनीति के अजातशत्रु और हमारे प्रेरणास्रोत, भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी के जन्म शताब्दी वर्ष में एकत्र हुए हैं। इस ऐतिहासिक वर्ष में, उनके विराट व्यक्तित्व को समेटे हुए इस बहुमूल्य पुस्तक ‘अटल संस्मरण’ का विमोचन करते हुए मुझे जो आत्मिक संतोष और हर्ष हो रहा है, उसे शब्दों में बाँधना अत्यंत कठिन है।

मैं इस अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक की रचना के लिए इसके लेखक, वरिष्ठ पत्रकार श्री अशोक टंडन जी को हार्दिक बधाई और साधुवाद देता हूँ। अशोक टंडन जी का पत्रकारिता और सार्वजनिक जीवन में जो सुदीर्घ योगदान रहा है, वह अत्यंत उल्लेखनीय है। पूर्व में प्रधानमंत्री कार्यालय में मीडिया सलाहकार के रूप में कार्य करते हुए, उन्हें श्रद्धेय अटल जी को अत्यंत निकट से देखने, समझने और उनके सानिध्य में काम करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यही कारण है कि यह पुस्तक केवल कुछ संस्मरणों का साधारण संग्रह नहीं है, बल्कि यह भारतीय राजनीति के एक स्वर्णिम अध्याय का जीता-जागता दस्तावेज़ है।

मुझे यह जानकर भी अत्यंत प्रसन्नता है कि श्री अशोक टंडन जी वर्तमान में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा गठित ‘अटल बिहारी वाजपेयी जन्म शताब्दी समारोह समिति’ के एक सम्मानित सदस्य भी हैं। इस प्रामाणिक पुस्तक के माध्यम से उन्होंने अटल जी के महान विचारों, उनके विराट व्यक्तित्व और उनके राष्ट्र-समर्पण को जन-जन तक पहुँचाने का जो सराहनीय और पुनीत कार्य किया है, वह वंदनीय है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि उनके प्रत्यक्ष अनुभवों से रची गई यह पुस्तक हमारी आने वाली पीढ़ियों और शोधकर्ताओं के लिए एक अत्यंत मूल्यवान और प्रेरणादायी धरोहर सिद्ध होगी।

देवियो और सज्जनो,

जब हम अटल जी के जीवन पर दृष्टि डालते हैं, तो हमें एक ऐसे राष्ट्रभक्त के दर्शन होते हैं जिसने अपना सम्पूर्ण जीवन माँ भारती के चरणों में समर्पित कर दिया।

25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक साधारण शिक्षक परिवार में जन्मे अटल जी ने अपने जीवन के शुरुआती दिनों से ही राष्ट्र-सेवा का व्रत ले लिया था। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में एक किशोर के रूप में उनकी भागीदारी उनके भीतर धधकती देशभक्ति की ज्वाला का प्रमाण थी।

राष्ट्रधर्म, पंचजन्य और वीर अर्जुन जैसे पत्रों के सफल संपादन के माध्यम से उन्होंने अपनी प्रखर वैचारिक चेतना को समाज तक पहुँचाया। श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी के सानिध्य में भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य के रूप में उन्होंने जो राजनीतिक यात्रा आरंभ की, वह दशकों तक संसद के दोनों सदनों में गूंजती रही।

दशकों तक विपक्ष में रहने के बावजूद, उनका संसदीय आचरण इतना मर्यादित और उच्च कोटि का था कि उनके घोर राजनीतिक विरोधी भी उनके विचारों को पूरी तन्मयता से सुनते थे। वे भारत के पहले ऐसे गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने, जिन्होंने अपना कार्यकाल सफलतापूर्वक पूर्ण किया।

बंधुओं, 

आज जब हम ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘विकसित भारत 2047’ के महान संकल्प को लेकर आगे बढ़ रहे हैं, तो हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि 21वीं सदी के उस सशक्त और आधुनिक भारत की मजबूत आधारशिला अटल जी ने ही अपने हाथों से रखी थी।

उनके प्रधानमंत्रित्व काल के कुछ निर्णय तो भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज हैं। पूरी दुनिया और महाशक्तियों के दबाव को दरकिनार करते हुए, अटल जी ने मई 1998 में पोखरण में परमाणु परीक्षण कर भारत को एक परमाणु संपन्न राष्ट्र घोषित किया। लाल बहादुर शास्त्री जी के ‘जय जवान, जय किसान’ के नारे में अटल जी ने ‘जय विज्ञान’ जोड़कर देश की वैज्ञानिक मेधा को जो सम्मान दिया, वह अद्भुत था।

अटल बिहारी वाजपेयी जी ने आर्थिक सुधारों को सदैव सर्वोच्च प्राथमिकता दी। चाहे वह चार महानगरों को जोड़ने वाली ‘स्वर्णिम चतुर्भुज योजना’ हो, या देश के हर छोटे गाँव को पक्की सड़क से जोड़ने वाली ‘प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना’, ये अटल जी की ही दूरदृष्टि थी जिसने भारत की अर्थव्यवस्था को एक नई गति प्रदान की।

उनके नेतृत्व में विनिवेश मंत्रालय का गठन इस बात का प्रमाण था कि वे भारत की अर्थव्यवस्था को अधिक सशक्त, पारदर्शी और आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे। उनके कार्यकाल में लागू किया गया “राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम” वित्तीय अनुशासन स्थापित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था, जिसका उद्देश्य सरकारी व्यय को नियंत्रित करना और राजकोषीय घाटे को सीमित करना था। इसके साथ ही विद्युत सुधार, दूरसंचार क्रांति, रेल एवं हवाई संपर्क का विस्तार आदि जैसे महत्वपूर्ण कदमों ने देश के विकास को नई ऊर्जा प्रदान की।

आज भारत जिस डिजिटल और टेलीकॉम क्रांति का अनुभव कर रहा है, उसकी नीतियां अटल जी के समय में ही बनी थीं। ‘सर्व शिक्षा अभियान’ के माध्यम से उन्होंने देश के हर बच्चे के हाथों में कलम थमाने का जो भगीरथ प्रयास किया, वह अविस्मरणीय है।

‘कारगिल युद्ध’ के दौरान उनके कुशल नेतृत्व ने जहाँ भारतीय सेना के शौर्य को शिखर पर पहुँचाया, वहीं ‘लाहौर बस यात्रा’ के जरिए उन्होंने पूरी दुनिया को यह भी दिखा दिया कि भारत शांति का पैरोकार है, लेकिन अपनी संप्रभुता से कोई समझौता नहीं कर सकता।

साथियो,

राजनीति के उस कठोर और कोलाहल भरे धरातल पर अटल जी के भीतर का कवि कभी नहीं मरा। उनकी कविताएं उनके मन का दर्पण थीं, जिनमें राष्ट्रप्रेम, मानवीय संवेदनाएं, और कभी न हार मानने का अदम्य साहस झलकता था।

जब भी देश के सामने कोई संकट आया, या वे स्वयं किसी राजनीतिक चक्रव्यूह में घिरे, तो उनकी कलम ने पूरे राष्ट्र को ऊर्जा दी। उनकी ये पंक्तियाँ आज भी हमारे रगों में जोश भर देती हैं:

‘‘बाधाएँ आती हैं आएँ, घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,

पावों के नीचे अंगारे, सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,

निज हाथों में हँसते-हँसते, आग लगाकर जलना होगा।

क़दम मिलाकर चलना होगा।’’

जीवन के हर संघर्ष और राजनीतिक उतार-चढ़ाव को उन्होंने एक संत की भांति स्वीकार किया और पूरी दुनिया को संदेश दियाः

‘‘क्या हार में क्या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं,

कर्तव्य पथ पर जो मिला, यह भी सही, वह भी सही।’’

और उनका वह अमर आत्मविश्वास, जो हमें हर नई चुनौती से लड़ने की प्रेरणा देता हैः

‘‘टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी,

अंतर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी,

हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा,

काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ,

गीत नया गाता हूँ.......’’

आज के हमारे युवाओं को अटल जी की इन पंक्तियों को अपने जीवन में उतार लेना चाहिए। ये पंक्तियाँ हमें सिखाती हैं कि सफलता का मार्ग कभी भी सीधा नहीं होता, लेकिन परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, हमें हार स्वीकार करने के बजाय, एक नए संकल्प और नई ऊर्जा के साथ हर बार फिर से उठ खड़ा होना चाहिए। 

साथियो,

1957 में पहली बार संसद में कदम रखने के बाद से, उन्होंने विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करते हुए सार्वजनिक जीवन और देश के विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया। अटल जी देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री थे, जिनके पास लगभग 40 वर्षों का सुदीर्घ और गहन संसदीय अनुभव था।

एक उत्कृष्ट सांसद के रूप में, अटल जी ने अपने वैचारिक दृढ़ विश्वास, भाषा के अद्भुत प्रवाह, अपनी हाज़िरजवाबी और अपनी अनूठी काव्यात्मक अभिव्यक्तियों से संसदीय बहसों को अत्यंत समृद्ध किया। उनकी इस ओजस्वी वक्तृत्व कला और प्रभावी तर्कों से तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय पंडित जवाहरलाल नेहरू भी अत्यंत प्रभावित हुए थे।

आज हम भौतिक रूप से उनकी उपस्थिति को बहुत याद करते हैं, लेकिन उनका विराट व्यक्तित्व सदैव हमारा मार्गदर्शन करता है। यह भी एक अटल सत्य है कि उनकी उस सौम्य मुस्कान के पीछे फौलाद सा एक दृढ़ संकल्प छिपा था, जो सदैव उनके हर शब्द और हर कर्म का आधार बना।

पहली बार 13 दिनों के लिए उनका प्रधानमंत्री बनना, उसके बाद 13 महीने का दूसरा कार्यकाल और तत्पश्चात प्रधानमंत्री के रूप में उनका पूर्ण पांच वर्षीय कार्यकाल, यह इस देश में राष्ट्रवाद की एक नई भावना के उदय और उसके सुदृढ़ीकरण का स्पष्ट संकेत था। 

देवियो और सज्जनो,

अटल जी सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों और मर्यादाओं के प्रबल पक्षधर थे। वे मानते थे कि राजनीति केवल सत्ता का माध्यम नहीं, बल्कि जनसेवा और राष्ट्रनिर्माण का पवित्र दायित्व है। आज सार्वजनिक जीवन, विशेषकर राजनीति और मीडिया में मूल्यों के क्षरण को लेकर जो चिंता दिखाई देती है, उस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। यदि राजनीति में शुचिता, पारदर्शिता और नैतिकता नहीं रहेगी, तो जनता का विश्वास भी कमजोर होगा।

अटल जी का मानना था कि सभी राजनीतिक दलों का दायित्व है कि वे अपने कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों में नैतिक आचरण, अनुशासन और लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा दें। वे युवाओं को संविधान सभा की बहसों और वरिष्ठ सांसदों के भाषणों का अध्ययन करने के लिए प्रेरित करते थे, ताकि लोकतांत्रिक परंपराओं की गरिमा को समझा जा सके।

वे सदैव कहते थे कि लोकतंत्र में “3डी” यानी Discuss, Debate और Decide अर्थात चर्चा करो, बहस करो और निर्णय लो की भावना होनी चाहिए, न कि चौथे “डी” अर्थात Disrupt यानी व्यवधान उत्पन्न करने की प्रवृत्ति। यह संदेश आज भी भारतीय लोकतंत्र के लिए अत्यंत प्रासंगिक और प्रेरणादायी है।

आज मूल्याधारित राजनीति का अभाव, वैचारिक प्रतिबद्धता में कमी, सत्ता की अंधी दौड़, धनबल और बाहुबल का बढ़ता प्रभाव तथा आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों का राजनीति में प्रवेश लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। इन प्रवृत्तियों के कारण राजनीतिक वातावरण में कटुता, असहिष्णुता और हिंसक प्रवृत्तियों का विस्तार हो रहा है, जिससे राजनीति की गरिमा और जनविश्वास दोनों प्रभावित हो रहे हैं।

यदि समय रहते इन अवांछनीय प्रवृत्तियों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह स्थिति देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और राजनीतिक संस्कृति को दीर्घकालिक एवं अपूरणीय क्षति पहुँचा सकती है। ऐसे समय में अटल बिहारी वाजपेयी जी का आदर्शवादी, मर्यादित और मूल्यनिष्ठ राजनीतिक जीवन हम सभी के लिए प्रेरणा का महत्वपूर्ण स्रोत है।

देवियो और सज्जनो,

आज की युवा पीढ़ी को भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी के जीवन और व्यक्तित्व से बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है। अटल जी का सम्पूर्ण सार्वजनिक जीवन लोकतांत्रिक मूल्यों, संवाद की मर्यादा, राष्ट्र प्रथम की भावना तथा राजनीति में शुचिता का प्रेरणादायी उदाहरण रहा है। उन्होंने सिद्ध किया कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि जनसेवा, सहमति और राष्ट्रनिर्माण का एक पवित्र दायित्व है।

अटल जी ने सदैव लोकतांत्रिक मूल्यों, संसदीय परंपराओं और संविधान की गरिमा का सम्मान किया। राजनीतिक मतभेद होने के बावजूद उन्होंने कभी व्यक्तिगत कटुता को स्थान नहीं दिया। आज जब सार्वजनिक जीवन में भाषा और संवाद का स्तर चिंता का विषय बनता जा रहा है, तब अटल जी का जीवन हमें संयमित वाणी, शालीन संवाद और परस्पर सम्मान की प्रेरणा देता है। वे मानते थे कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति चर्चा, विचार-विमर्श और सहमति निर्माण में निहित होती है। उनकी राजनीति विरोध की नहीं, बल्कि वैचारिक विमर्श और राष्ट्रीय सहमति की राजनीति थी।

अटल जी के जीवन का सबसे बड़ा संदेश था, “राष्ट्र प्रथम”। उन्होंने दल, पद और व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर सदैव राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा। चाहे राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न हो, विकास का विषय हो अथवा अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की प्रतिष्ठा, उन्होंने हर निर्णय राष्ट्रहित को केंद्र में रखकर लिया।

उन्होंने राजनीति में शुचिता, पारदर्शिता और नैतिक मूल्यों की एक उच्च परंपरा स्थापित की। उनका व्यक्तित्व यह प्रमाणित करता है कि विनम्रता, सहिष्णुता और आदर्शवाद के साथ भी सफल नेतृत्व किया जा सकता है। आज आवश्यकता है कि हमारी युवा पीढ़ी अटल जी के विचारों को केवल पढ़े ही नहीं, बल्कि उन्हें अपने जीवन और सार्वजनिक आचरण में भी उतारे। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

देवियो और सज्जनो,

पंजाब केवल एक राज्य नहीं, बल्कि भारत की देशभक्ति, वीरता, त्याग और राष्ट्रीय चेतना का जीवंत प्रतीक है। गुरु परंपरा से लेकर स्वतंत्रता संग्राम तक, और सीमाओं की सुरक्षा से लेकर राष्ट्र निर्माण तक, पंजाब का योगदान सदैव अग्रणी रहा है। सीमावर्ती राज्य होने के कारण पंजाब की भूमिका राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। 

सीमा पार से होने वाली चुनौतियों का सामना करने में हमारे सैनिक, अर्धसैनिक बल, सीमा सुरक्षा बल और पंजाब पुलिस निरंतर साहस और समर्पण के साथ कार्य कर रहे हैं। राष्ट्र की सुरक्षा और शांति बनाए रखने में उनका योगदान अत्यंत प्रेरणादायी है।

भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी का पंजाब और पंजाबी समाज के प्रति विशेष स्नेह और सम्मान था। वे पंजाब की बहादुरी, उदारता, जीवटता और भाईचारे की भावना की सदैव प्रशंसा करते थे। अटल जी मानते थे कि पंजाब भारत की शक्ति, ऊर्जा और राष्ट्रीय एकता का महत्वपूर्ण स्तंभ है।

अटल जी की ऐतिहासिक लाहौर बस यात्रा भी पंजाब की पावन धरती अमृतसर से प्रारम्भ हुई थी। वह यात्रा केवल एक राजनयिक पहल नहीं थी, बल्कि शांति, संवाद और विश्वास का ऐतिहासिक संदेश थी। अटल जी ने यह सिद्ध किया कि एक सशक्त राष्ट्र आत्मविश्वास और गरिमा के साथ शांति की पहल भी कर सकता है। उनकी सोच थी कि राष्ट्रीय सुरक्षा और शांति - दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।

पंजाब की वीरता, सेवा, सौहार्द और राष्ट्रीय समर्पण की परंपरा अटल जी के विचारों और व्यक्तित्व से पूर्णतः मेल खाती है। जिस प्रकार पंजाब ने हर चुनौती के समय राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा, उसी प्रकार अटल जी ने भी अपने सम्पूर्ण सार्वजनिक जीवन में “राष्ट्र प्रथम” की भावना को सर्वोच्च स्थान दिया।

आज जब हम अटल जी को स्मरण कर रहे हैं, तब पंजाब की यह पावन धरती उनके आदर्शों को और अधिक सशक्त रूप से प्रतिबिंबित करती दिखाई देती है।

मैं इस गरिमामय आयोजन के लिए आयोजकों को हार्दिक बधाई देता हूँ और विश्वास व्यक्त करता हूँ कि “अटल संस्मरण” देशभर के पाठकों तक पहुँचकर नई पीढ़ी को प्रेरित करेगी।

अटल जी आज भले ही हमारे बीच शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, किन्तु उनके विचार, आदर्श और शब्द सदैव भारत का मार्गदर्शन करते रहेंगे। उनका जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि राष्ट्रहित सर्वोपरि है और लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति संवाद, संवेदनशीलता तथा समावेशी दृष्टि में निहित है।

भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए मैं विश्वास व्यक्त करता हूँ कि “अटल संस्मरण” आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का एक महत्वपूर्ण स्रोत बनेगी। अटल जी का व्यक्तित्व और कृतित्व भारत की लोकतांत्रिक चेतना में सदैव अमर रहेगा।

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद।

जय हिंद!जय भारत!