SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF 13th maa samman samaroh at Chandigarh on may 19, 2026.
- by Admin
- 2026-05-19 16:05
‘मां सम्मान समारोह’ के अवसर पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 19.05.2026, मंगलवार समयः दोपहर 12:30 बजे स्थानः मोहाली
नमस्कार!
आज मानव मंगल स्मार्ट स्कूल के इस परिसर में, जहाँ शिक्षा और संस्कारों का संगम हो रहा है, ‘माँ सम्मान समारोह’ के इस अत्यंत भावुक और गरिमामयी उत्सव में आपके बीच उपस्थित होना मेरे लिए किसी सौभाग्य से कम नहीं है।
संसार में वैसे तो कई रिश्ते होते हैं, जो समय के साथ बनते और बदलते हैं। लेकिन ‘माँ’ का रिश्ता वह अनूठा और शाश्वत रिश्ता है जो हमारे अस्तित्व के आने से पहले ही शुरू हो जाता है। मैं इस बेहद संवेदनशील और पुनीत आयोजन के लिए डॉ. जी.सी. मिश्रा मेमोरियल एजुकेशनल एंड चैरिटेबल ट्रस्ट और मानव मंगल स्मार्ट स्कूल को इस 13वें माँ सम्मान समारोह के आयोजन के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ।
मुझे बताया गया है कि ‘डॉ. जी.सी. मिश्रा मेमोरियल एजुकेशनल एंड चैरिटेबल ट्रस्ट’ की स्थापना वर्ष 2011 में वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध लेखक श्री मयंक मिश्रा जी द्वारा अपने पिता स्वर्गीय डॉ. गिरीश चंद्र मिश्रा की स्मृति में की गई थी जो एक उत्कृष्ट शिक्षक, प्रख्यात शिक्षाविद् और केमिकल इंजीनियरिंग के क्षेत्र में प्रतिष्ठित नाम थे।
अत्यंत हर्ष और गर्व का विषय है कि ट्रस्ट द्वारा समय-समय पर रक्तदान शिविर, टीचर्स एक्सीलेंस अवॉर्ड और बेटी सम्मान समारोह जैसे आयोजन भी किए जाते हैं, जो सामाजिक सरोकार और जनकल्याण की दिशा में उल्लेखनीय प्रयास हैं।
यदि हम मानव मंगल संस्था की इस अद्भुत विकास यात्रा को देखें, तो वर्ष 1968 में एक बेहद छोटे से प्रयास से शुरू हुई इस संस्था की शुरुआत मात्र एक शाखा, 40 विद्यार्थियों और 14 समर्पित शिक्षकों के साथ हुई थी। लेकिन आज अपनी इस विनम्र शुरुआत से आगे बढ़ते हुए यह संस्थान एक विशाल वटवृक्ष के रूप में हमारे सामने खड़ा है।
आज 6 समृद्ध और आधुनिक परिसरों, 12 हजार से अधिक जिज्ञासु विद्यार्थियों और 500 से ज्यादा निष्ठावान शिक्षकों के साथ यह संस्थान अपनी नैतिकताओं और मूल्यों की मजबूत नींव पर अडिग रहते हुए निरंतर उत्कृष्टता की ओर बढ़ रहा है।
देवियो और सज्जनो,
जैसा कि आप सभी जानते हैं, आज का यह ‘माँ सम्मान समारोह’ मूलतः मदर्स डे के अवसर पर आयोजित किया जाना था, परन्तु कुछ कारणों से मेरी अनुपस्थिति के चलते यह कार्यक्रम उस दिन संपन्न नहीं हो सका। इसलिए, आज यह आयोजन उसी भावना और श्रद्धा के साथ किया जा रहा है, जिससे हम मातृशक्ति को सम्मानित कर सकें और उनके त्याग, संघर्ष एवं स्नेह को नमन कर सकें।
मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि डॉ. जीसी मिश्रा मेमोरियल एजुकेशनल एंड चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा मानव मंगल स्मार्ट स्कूल के सहयोग से पिछले 13 वर्षों से मदर्स डे पर ऐसी माताओं को सम्मानित किया जाता है जो असाधारण हैं।
ये वे माताएँ हैं जिन्होंने विषम परिस्थितियों के बावजूद अपने बच्चों के सपनों को साकार करने हेतु स्वयं को समर्पित कर दिया और मातृत्व के आदर्श को एक नई ऊँचाई प्रदान की।
मैं आज इस मंच पर सम्मानित सभी 10 माताओं को हृदय से बधाई और श्रद्धा-सहित नमन करता हूँ। आप न केवल अपने परिवार के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं, बल्कि आपने पूरे समाज के लिए भी आदर्श प्रस्तुत किया है।
आज जिन माताओं को सम्मानित किया गया, उनके जीवन-संघर्ष किसी एक कथा तक सीमित नहीं, बल्कि प्रेरणा के अनेक अध्यायों से सजी जीवंत गाथाएँ हैं, जहाँ हर पन्ना त्याग, साहस और अटूट संकल्प की सुगंध से महकता है।
कहीं जीवन की विषम परिस्थितियों से जूझते हुए एक माँ ने अपने पुत्र को डॉक्टर बनाकर समाज-सेवा के मार्ग पर अग्रसर किया, तो कहीं एक माँ ने अपनी पुत्री के आईएएस बनने के स्वप्न को साकार करने हेतु हर चुनौती को मुस्कान और धैर्य के साथ स्वीकार किया। किसी ने संघर्षों के बीच अपनी बेटियों के लिए प्रोफेसर बनने का स्वर्णिम मार्ग प्रशस्त किया, तो किसी ने अनाथ बच्चों को अपनाकर उन्हें स्नेह, सहारा और दिशा का आंचल देकर उनके जीवन को नई उड़ान और नई पहचान प्रदान की।
आपके त्याग, समर्पण और अथक परिश्रम ने यह सिद्ध कर दिया है कि एक माँ की ममता में वह शक्ति होती है, जो असंभव को भी संभव बना सकती है।
देवियों और सज्जनों,
यदि हम भारतीय संस्कृति के मूल दर्शन को समझें, तो यहाँ ‘माँ’ केवल एक मानवीय रिश्ता नहीं है, बल्कि वह इस चराचर जगत की परम चेतना और आदि-शक्ति का साक्षात् स्वरूप है। हमारी संस्कृति दुनिया की इकलौती ऐसी संस्कृति है जहाँ ईश्वर को भी ‘माता’ के रूप में पुकारा गया है, ‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव’।
सनातन काल से ही भारत में शक्ति, समृद्धि और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवियों के रूप में माँ दुर्गा, माँ लक्ष्मी और माँ सरस्वती की आराधना की जाती रही है। पाश्चात्य संस्कृति जहाँ राष्ट्र को ‘फादरलैंड’ कहती है, वहीं हमारी गौरवशाली परंपरा हमें अपनी माटी को ‘भारत माता’ कहकर उसका वंदन करना सिखाती है। भारतीय चिंतन में एक स्त्री का ‘माँ’ बनना उसके जीवन की पूर्णता और इस सृष्टि के निरंतर प्रवाह की सबसे पवित्र घटना माना गया है।
जब हम ‘मातृशक्ति’ शब्द का उच्चारण करते हैं, तो हमारे भीतर असीम ऊर्जा, करुणा और साहस का संचार होने लगता है। मातृशक्ति का अर्थ है, वह शक्ति जो सृजन भी करती है, पोषण भी करती है और आवश्यकता पड़ने पर समाज व राष्ट्र की रक्षा के लिए ढाल बनकर खड़ी भी हो जाती है। माँ के भीतर सहनशीलता का हिमालय होता है, तो उसकी ममता में वात्सल्य का समंदर बहता है।
एक माँ अपने बच्चे के लिए दुनिया की हर विपत्ति से लड़ सकती है। वह बिना किसी स्वार्थ के अपना सर्वस्व न्योछावर करने की क्षमता रखती है। सच तो यह है कि दुनिया की कोई भी भाषा, कोई भी शब्दकोश और कोई भी ग्रंथ मातृशक्ति के इस विराट स्वरूप और उसके ऋण की व्याख्या करने में पूरी तरह असमर्थ है।
प्यारे बच्चों,
यदि हम एक माँ की भूमिकाओं को देखें, तो वह एक बच्चे के जीवन की प्रथम गुरु, प्रथम मित्र और प्रथम मार्गदर्शक होती है।
विद्यालय तो हमें अक्षर-ज्ञान और डिग्रियां देते हैं, लेकिन जीवन की विपरीत परिस्थितियों से लड़ना, सत्य के मार्ग पर चलना, दूसरों का आदर करना और राष्ट्र के प्रति वफादार रहना, ये वो संस्कार हैं जो बच्चा अपनी माँ की लोरी और उसकी गोद में सीखता है।
वह पूरे परिवार को एक सूत्र में पिरोकर रखने वाली सबसे मजबूत कड़ी है। वह घर के वित्तीय प्रबंधन से लेकर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य तक, हर मोर्चे पर एक कुशल प्रबंधक की भूमिका निभाती है।
आज के इस आधुनिक युग में हमारी माताएं न केवल घर की चारदीवारी को महका रही हैं, बल्कि कामकाजी होकर देश की अर्थव्यवस्था और प्रगति में भी कंधे से कंधा मिलाकर योगदान दे रही हैं। एक संस्कारी माँ ही एक संस्कारी नागरिक को जन्म देती है, और संस्कारी नागरिक ही एक सशक्त समाज और महान राष्ट्र का निर्माण करते हैं।
स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था, “जिस राष्ट्र ने अपनी महिलाओं का सम्मान करना सीख लिया, वही राष्ट्र महान बनता है।” वास्तव में, किसी भी समाज की प्रगति का सबसे बड़ा मापदंड उसकी महिलाओं की स्थिति और सम्मान होता है।
साथियो,
हमारे शास्त्रों और मनीषियों ने माँ को ईश्वर से भी ऊँचा स्थान दिया है। श्री गुरू नानक देव जी ने नारी के सम्मान में कहा था, ‘‘सो क्यों मंदा आखिए, जित जम्मे राजान।’’ अर्थात् उस नारी को मंद या तुच्छ कैसे कहा जा सकता है, जिसके गर्भ से राजा जन्म लेते हैं। यह पंक्ति केवल नारी सम्मान की नहीं, बल्कि उसके सृजनात्मक, सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व की गूढ़ अभिव्यक्ति है।
रामायण में भगवान श्री राम ने लक्ष्मण से लंका विजय के बाद जो कहा था, वह आज भी हर भारतीय के दिल में गूंजता है, ‘‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।’’ अर्थात, जननी और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी बढ़कर है। माँ केवल एक व्यक्ति नहीं है, माँ एक संस्था है, माँ सुरक्षा का घेरा है, माँ क्षमा का सागर है और माँ बच्चे की पहली गुरु है।
जब हम मातृत्व की बात करते हैं, तो भारत का इतिहास और विशेषकर पंजाब की यह वीर भूमि ऐसी महान माताओं के उदाहरणों से भरी पड़ी है, जिन्होंने अपने संस्कारों से पूरे राष्ट्र की नियति बदल दी।
पंजाब की इस पावन धरती पर माता तृप्ता जी ने गुरु नानक देव जी को वह संस्कार दिए जिन्होंने पूरी मानवता को प्रेम और समानता का मार्ग दिखाया। वहीं, माता गुजरी जी के महान मातृत्व को कौन भूल सकता है? उन्होंने अपने पोतों (चार साहिबजादों) को धर्म और सत्य के मार्ग पर अडिग रहने की ऐसी शिक्षा दी कि उन्होंने हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दे दी, लेकिन अत्याचार के सामने सिर नहीं झुकाया। यह पंजाब की माताओं का जज्बा है।
यदि हम भारत के अन्य भागों की ओर देखें, तो छत्रपति शिवाजी महाराज की माता जीजाबाई का योगदान अद्वितीय है। उन्होंने केवल एक पुत्र का पालन-पोषण नहीं किया, बल्कि एक ऐसे महान राष्ट्रनायक का निर्माण किया, जिसने भारत के स्वाभिमान की रक्षा की।
महाभारत में माता कुंती का धैर्य और त्याग, रामायण में माता कौशल्या का स्नेह और मर्यादा, तथा झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की मातृशक्ति और वीरता आज भी भारतीय नारी की शक्ति का प्रतीक हैं।
भारतीय इतिहास ऐसी ही अनेकों माताओं के त्याग, शौर्य, विदुषिता और अद्वितीय संस्कारों के उदाहरणों से भरा पड़ा है, जिनका एक समय पर उल्लेख करना असंभव है। हमारी यह पावन धरा सदियों से उस मातृशक्ति की गवाह रही है जिसने अपनी कोख से वीर योद्धाओं, महान संतों, वैज्ञानिकों और राष्ट्र-नायकों को जन्म दिया।
देवियो और सज्जनो,
आज का भारत बदल रहा है, और इस बदलते भारत की सबसे मजबूत रीढ़ हमारी नारी शक्ति है। प्राचीन काल में जहाँ गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषियों ने ज्ञान के शिखर को छुआ, वहीं आज की आधुनिक भारतीय महिलाएं अंतरिक्ष से लेकर ओलंपिक के मैदान तक और सीमाओं की सुरक्षा से लेकर कॉर्पोरेट जगत के बोर्डरूम तक अपनी सफलता का परचम लहरा रही हैं।
जब हम वर्ष 2047 तक एक आत्मनिर्भर और ‘विकसित भारत’ के निर्माण का संकल्प लेते हैं, तो वह संकल्प हमारी माताओं-बहनों के सक्रिय योगदान के बिना अधूरा है।
कानून और नीतियां समाज को सुव्यवस्थित कर सकती हैं, लेकिन समाज को संवेदनशील और नशामुक्त केवल एक माँ के संस्कार ही बना सकते हैं।
आज पंजाब के सामने जो सामाजिक चुनौतियां हैं, विशेषकर युवाओं को सही दिशा दिखाने की, उसमें हमारी माताओं की भूमिका सबसे बड़ी है। एक माँ जब अपने बच्चे को ‘चढ़दी कला’ और ईमानदारी का पाठ पढ़ाती है, तो वह एक बेहतर नागरिक का निर्माण करती है।
आज इस सभागार में उपस्थित बच्चों से मैं केवल एक ही बात कहना चाहता हूँ, ‘‘जिंदगी की पहली शिक्षक माँ होती है, और जिंदगी की आखिरी उम्मीद भी माँ होती है।’’
आप जीवन में चाहे कितने भी बड़े अधिकारी, डॉक्टर, इंजीनियर या नेता बन जाएं, अपनी माँ की आँखों में कभी आंसू मत आने देना। दुनिया के सारे तीर्थ, सारे गुरु और सारी सफलताएं माँ के चरणों के आशीर्वाद के सामने छोटी हैं। रोज़ सुबह उठकर अपनी माँ का आशीर्वाद लें, क्योंकि उनके आशीर्वाद में वह शक्ति है जो आपकी किस्मत की लकीरों को बदल सकती है।
मैं इस मंच से सभी शिक्षण संस्थानों, सामाजिक संगठनों और परिवारों से अपील करता हूँ कि वे महिलाओं को समान अवसर, सम्मान और सहयोग दें, ताकि वे अपने स्वप्नों को साकार कर सकें। जब हम माँ का सम्मान करते हैं, तब हम मानवता, सृजन और जीवन का सम्मान करते हैं।
मैं एक बार फिर डॉ. जी.सी. मिश्रा मेमोरियल एजुकेशनल एंड चैरिटेबल ट्रस्ट और मानव मंगल स्मार्ट स्कूल के प्रबंधन को इस अद्भुत और हृदय को छू लेने वाले ‘माँ सम्मान समारोह’ के लिए साधुवाद देता हूँ। आपने समाज को उसकी सबसे बड़ी शक्ति से रूबरू कराने का यह जो प्रयास किया है, वह अनुकरणीय है।
यहाँ उपस्थित सभी माताओं को मैं पुनः नमन करता हूँ और ईश्वर से आपके उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करता हूँ।
आइए, हम सब मिलकर अपनी मातृशक्ति का सम्मान करें और इस देश को एक महान और संस्कारी राष्ट्र बनाएं।
आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद,
जय हिन्द!
जय भारत!