SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF WORLD MUSIC DAY 2026 AT CHANDIGARH ON JUNE 20, 2026.
- by Admin
- 2026-06-20 21:35
‘विश्व संगीत दिवस 2026’ के अवसर पर माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 20.06.2026, शनिवार समयः शाम 7:00 बजे स्थानः चंडीगढ़
नमस्कार!
आज सेक्टर-17 प्लाज़ा में विश्व संगीत दिवस 2026 से जुड़े इस आनंदमय अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता और गर्व की अनुभूति हो रही है। मैं पर्यटन विभाग, चंडीगढ़ प्रशासन को इस सुंदर आयोजन के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ।
सेक्टर-17 प्लाज़ा चंडीगढ़ की पहचान है। यह केवल एक सार्वजनिक स्थल नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक धड़कन है। वर्षों से यह स्थान उत्सवों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और जनभागीदारी का केंद्र रहा है। आज संगीत और संस्कृति के माध्यम से एक बार फिर यह प्लाज़ा लोगों को एक साथ जोड़ रहा है।
चंडीगढ़ देश के सबसे सुंदर, सुव्यवस्थित और प्रगतिशील शहरों में से एक है। शिक्षा, खेल, नवाचार, स्वच्छता और बेहतर जीवन गुणवत्ता के क्षेत्र में इस शहर ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। हमारी सबसे बड़ी ताकत यहां के नागरिक और विशेष रूप से हमारी युवा शक्ति है।
मुझे विश्वास है कि इस प्रकार के आयोजन न केवल हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, बल्कि युवा पीढ़ी को भारतीय संगीत की गौरवशाली परंपरा से जोड़ने तथा कला और संस्कृति के प्रति उनकी रुचि को और अधिक प्रगाढ़ बनाने में भी सहायक सिद्ध होते हैं। ऐसे प्रयास चंडीगढ़ को एक जीवंत सांस्कृतिक केंद्र के रूप में स्थापित करने के साथ-साथ पर्यटन, रचनात्मकता और सामाजिक समरसता को भी नई दिशा प्रदान करते हैं।
आज हमारे बीच पंजाब की लोक-सांस्कृतिक विरासत के महान प्रतिनिधि, सुप्रसिद्ध लोक गायक श्री गुरदास मान जी उपस्थित हैं। दशकों से उन्होंने अपनी मधुर आवाज़ और सार्थक गीतों के माध्यम से समाज को प्रेरित किया है। उनके गीत पंजाब की मिट्टी की खुशबू, मानवीय संवेदनाओं और जीवन मूल्यों को दुनिया तक पहुंचाते हैं।
मैं गुरदास मान जी का चंडीगढ़ में हार्दिक स्वागत करता हूँ।
देवियो और सज्जनो,
आज का दिन केवल संगीत का उत्सव नहीं है, बल्कि मानवता को जोड़ने वाली उस सार्वभौमिक भाषा का उत्सव है, जो शब्दों, सीमाओं, भाषाओं और संस्कृतियों से परे जाकर सीधे हृदय से संवाद करती है। संगीत वह शक्ति है जो मन को शांति देती है, भावनाओं को अभिव्यक्ति देती है और समाज को एक सूत्र में बाँधने का कार्य करती है।
कहा जाता है, “जहाँ शब्द समाप्त हो जाते हैं, वहाँ से संगीत प्रारम्भ होता है।” यह कथन संगीत की आत्मा को अभिव्यक्त करता है। संगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह संवेदनाओं, संस्कृति, आध्यात्मिकता और मानवीय मूल्यों का जीवंत स्वरूप है।
देवियो और सज्जनो,
विश्व संगीत दिवस के इतिहास की बात करें तो इसकी शुरुआत वर्ष 1982 में फ्रांस से हुई थी। उस समय यह विचार रखा गया कि संगीत केवल मंचों और सभागारों तक सीमित न रहे, बल्कि आम लोगों तक पहुँचे और जीवन का हिस्सा बने। आज यह दिवस दुनिया के 120 से अधिक देशों में उत्साहपूर्वक मनाया जाता है और संगीत के माध्यम से वैश्विक एकता, सांस्कृतिक संवाद और रचनात्मक अभिव्यक्ति का संदेश देता है।
भारत के लिए संगीत केवल कला नहीं, बल्कि साधना है। हमारी प्राचीन परंपरा में संगीत को ईश्वर तक पहुँचने का माध्यम माना गया है। सामवेद को भारतीय संगीत का आधार माना जाता है। हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले ही यह समझ लिया था कि ध्वनि केवल सुनने की वस्तु नहीं, बल्कि चेतना को जागृत करने वाली शक्ति है।
भारतीय दर्शन में कहा गया है, “नाद ब्रह्म” अर्थात सम्पूर्ण सृष्टि ध्वनि से उत्पन्न हुई है और ध्वनि ही ब्रह्म का स्वरूप है। इसी नाद परंपरा ने आगे चलकर भारतीय शास्त्रीय संगीत को जन्म दिया। राग, ताल, स्वर और लय की हमारी परंपरा विश्व की सबसे समृद्ध संगीत परंपराओं में से एक है।
साथियो,
हमारे देश की मिट्टी से निकला संगीत केवल आनंद ही नहीं देता, बल्कि मन और आत्मा को भी गहराई से छूता है। भारतीय संगीत में ऐसी सहज शक्ति है जो सुनने वाले को शांति, सुकून और आंतरिक संतुलन प्रदान करती है। शास्त्रीय संगीत की किसी भी शैली को यदि मन से सुना जाए, तो भले ही उसके राग, ताल और तकनीकी पक्ष पूरी तरह समझ में न आएँ, फिर भी उसकी ध्वनि, लय और भाव हमें गहन शांति का अनुभव कराते हैं।
भारतीय संगीत हिमालय की ऊँचाइयों की तरह आत्मा को उठाता है, गंगा की गहराई की तरह हृदय को छूता है, अजंता-एलोरा की सुंदरता की तरह सौंदर्य भरता है, ब्रह्मपुत्र की विशालता की तरह अंतरात्मा को फैलाता है, और समुद्र की लहरों की तरह आत्मा को अनंत लय में डुबो देता है। यह संगीत भारतीय समाज के आध्यात्मिक जीवन का प्रतिबिंब है, जहाँ जीवन और धर्म संगीत के माध्यम से एक हो जाते हैं।
भारतीय लोक संगीत हो, शास्त्रीय संगीत हो या फिल्म संगीत हो, उसने हमेशा देश और समाज को जोड़ने का ही काम किया है। यह भक्ति आंदोलन का आधार बना, सूफी परंपरा का स्वर बना, और लोकजीवन का अभिन्न अंग रहा। शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत, भजन, कीर्तन, कव्वाली, सभी ने सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ किया।
मित्रो,
भारत की सांस्कृतिक विविधता का सबसे सुंदर रूप उसके लोक संगीत में दिखाई देता है। राजस्थान के मांगणियारों से लेकर बंगाल के बाउल गायकों तक, दक्षिण भारत के कर्नाटक संगीत से लेकर हिमालयी लोकधुनों तक, संगीत ने हमारी सांस्कृतिक एकता को सशक्त बनाया है।
और जब संगीत की बात होती है, तो पंजाब का उल्लेख विशेष रूप से आवश्यक हो जाता है।
पंजाब की धरती संगीत, लोककला और जीवंत सांस्कृतिक परंपराओं की भूमि है। यहाँ का संगीत खेतों की मिट्टी की खुशबू, पाँच नदियों की धारा, लोकजीवन की ऊर्जा और मानवीय भावनाओं की गहराई को अभिव्यक्त करता है।
भांगड़ा, गिद्धा, काफियाँ और सूफी गायन जैसी विधाओं ने पंजाब को विश्वभर में विशिष्ट पहचान दिलाई है। गुरबाणी की मधुर परंपरा ने आध्यात्मिक संगीत को नई ऊँचाइयाँ प्रदान की हैं।
श्री गुरु ग्रंथ साहिब में अनेक रागों का समावेश इस बात का प्रमाण है कि हमारे गुरु साहिबान संगीत की आध्यात्मिक शक्ति को भली-भाँति समझते थे। गुरबाणी कीर्तन केवल गायन नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और ईश्वर से जुड़ने का माध्यम है।
पंजाब ने आधुनिक युग में भी अनेक महान कलाकार दिए हैं। मोहम्मद रफ़ी, सुरिंदर कौर, गुरदास मान, हंस राज हंस जैसे अनेक समकालीन कलाकारों ने पंजाब की संस्कृति और भाषा को विश्वभर में पहुँचाया है।
आज पंजाबी संगीत विश्व के सबसे लोकप्रिय संगीत रूपों में से एक बन चुका है। कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के अनेक देशों में पंजाबी गीतों की लोकप्रियता यह सिद्ध करती है कि संगीत वास्तव में सीमाओं से परे है।
देवियो और सज्जनो,
संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक परिवर्तन का भी सशक्त माध्यम है। आधुनिक शोध बताते हैं कि संगीत तनाव कम करता है, चिंता और अवसाद को घटाता है तथा मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
आज जब पूरी दुनिया मानसिक तनाव, सामाजिक अलगाव और जीवनशैली से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब संगीत लोगों को भावनात्मक संतुलन और मानसिक शांति प्रदान कर रहा है।
विशेष रूप से मैं युवाओं से कहना चाहूँगा कि संगीत उनकी रचनात्मक ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।
प्रिय युवा साथियो,
भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है। विकसित भारत 2047 के निर्माण में युवाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। हमारे युवाओं के सपने, उनका परिश्रम और उनका चरित्र ही राष्ट्र की दिशा तय करेगा।
इसी संदर्भ में मैं एक ऐसे विषय का उल्लेख करना चाहता हूँ जो हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी से जुड़ा हुआ है।
नशा केवल किसी एक व्यक्ति की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे समाज के सामने खड़ी एक चुनौती है। यह व्यक्ति की क्षमता को कमजोर करता है, परिवारों को प्रभावित करता है और समाज की ऊर्जा को नुकसान पहुंचाता है। इसलिए नशे के विरुद्ध लड़ाई केवल कानून की नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की भी लड़ाई है।
युवाओं को नशे से दूर रखने का सबसे प्रभावी माध्यम है, शिक्षा, खेल, संस्कृति, कौशल और रचनात्मक गतिविधियां। आज का यह कार्यक्रम भी उसी सकारात्मक सोच का प्रतीक है।
संगीत व्यक्ति को जोड़ता है, जबकि नशा व्यक्ति को तोड़ता है। संगीत जीवन में आशा जगाता है, जबकि नशा जीवन को अंधकार की ओर ले जाता है। संगीत रचनात्मकता को जन्म देता है, जबकि नशा व्यक्ति की क्षमता और व्यक्तित्व दोनों को नष्ट कर देता है। इसलिए हमें संगीत, कला और संस्कृति को नशा-मुक्त समाज के निर्माण के प्रभावी साधन के रूप में देखना चाहिए।
मैं कलाकारों, संगीत संस्थाओं, विद्यालयों और युवाओं से आग्रह करता हूँ कि वे नशा मुक्ति के संदेश को संगीत के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाएँ। यदि एक गीत समाज में सकारात्मक सोच पैदा कर सकता है, तो वह अनेक जीवन भी बदल सकता है।
मैं युवाओं से कहना चाहता हूँ कि यदि कोई नशा करना ही है, तो सफलता का नशा कीजिए, ज्ञान का नशा कीजिए, खेल के मैदान में पदक जीतने का नशा कीजिए, अपने माता-पिता और देश का नाम रोशन करने का नशा कीजिए।
हम ऐसा भारत और ऐसा चंडीगढ़ बनाना चाहते हैं जहाँ युवाओं के हाथों में नशा नहीं, बल्कि किताबें हों, लैपटॉप हों, संगीत के वाद्य यंत्र हों और खेलों में जीते हुए मेडल हों।
मित्रो,
नशा मुक्त समाज का निर्माण केवल सरकार के प्रयासों से संभव नहीं है। इसमें परिवारों, शिक्षण संस्थानों, सामाजिक संगठनों, कलाकारों और प्रत्येक जागरूक नागरिक की भूमिका महत्वपूर्ण है। जब समाज एकजुट होकर संकल्प लेता है, तब कोई भी चुनौती बड़ी नहीं रहती।
मुझे विश्वास है कि चंडीगढ़ की जागरूक जनता और ऊर्जावान युवा इस दिशा में उदाहरण प्रस्तुत करेंगे।
अंत में, मैं एक बार फिर पर्यटन विभाग, सभी आयोजकों तथा गुरदास मान जी को इस यादगार संगीतमय संध्या के लिए बधाई देता हूँ।
आइए, संगीत का आनंद लेते हुए हम एक स्वस्थ, जागरूक, प्रगतिशील और नशामुक्त समाज के निर्माण का संकल्प भी लें।
बहुत-बहुत धन्यवाद।
जय हिंद!
जय भारत!