SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF BHAVAN’S HEALTH CARE ON WHEELS’ AT AMRITSAR ON 12.06.2026.

‘‘भवन्स हेल्थ केयर ऑन व्हील्स’’ के शुभारंभ के अवसर पर

राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 12.07.2026,  रविवारसमयः दोपहर 3:30 बजेस्थानः अमृतसर

         

नमस्कार!

आज गुरु नगरी अमृतसर की इस पवित्र और ऐतिहासिक धरती पर, भारतीय विद्या भवन अमृतसर द्वारा शुरू किए जा रहे एक अत्यंत पुनीत, संवेदनशील और अनूठे सेवा प्रोजेक्ट ‘‘भवन्स हेल्थ केयर ऑन व्हील्स’’ का शुभारंभ करते हुए मुझे आंतरिक संतोष और गर्व का अनुभव हो रहा है।

दीक्षांत समारोहों और अकादमिक मंचों पर तो हम अक्सर मिलते हैं, लेकिन जब कोई संस्थान शिक्षा के साथ-साथ समाज के सबसे वंचित और निर्धन वर्ग के स्वास्थ्य की चिंता करते हुए ज़मीनी धरातल पर उतरता है, तो वह आयोजन केवल एक कार्यक्रम नहीं रह जाता, बल्कि वह ‘नर सेवा ही नारायण सेवा’ का एक जीवंत अनुष्ठान बन जाता है।

जब हम इस महान संस्थान के नाम को देखते हैं, तो हमारे मन में भारतीयता और उच्च मूल्यों के प्रति आदर का भाव स्वतः जागृत हो जाता है। सन 1938 में, जब देश स्वाधीनता के संघर्ष से गुज़र रहा था, तब महान दूरदर्शी, स्वतंत्रता सेनानी और प्रखर मनीषी डॉ. कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (कुलपति मुंशी जी) ने महात्मा गांधी के आशीर्वाद से भारतीय विद्या भवन की नींव रखी थी।

मुंशी जी का स्पष्ट मानना था कि भारत को यदि आगे बढ़ना है, तो उसे आधुनिक ज्ञान के साथ-साथ अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत और नैतिक मूल्यों को भी सहेजना होगा। ऋग्वेद का एक अमर वाक्य इस संस्थान का मूल मंत्र है, ‘‘आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः’’ अर्थात हमारे पास चारों ओर से ऐसे कल्याणकारी विचार आएं जो किसी से दबे नहीं, उन्हें कहीं से बाधित न किया जा सके। भवन का आदर्श वाक्य है, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ अर्थात यह संपूर्ण विश्व ही हमारा परिवार है।

मुंशी जी के विनम्र प्रयासों से शुरू हुई यह यात्रा आज एक विशाल नेटवर्क का रूप ले चुकी है, जिसके तहत भारत में 114 केंद्र और विदेशों में 7 अंतरराष्ट्रीय केंद्र पूरी निष्ठा से कार्यरत हैं। 

संस्थान की विचार-यात्रा और निस्वार्थ सेवा को देखते हुए, वर्ष 2002 में भारत के माननीय राष्ट्रपति महोदय द्वारा भारतीय विद्या भवन को देश के सबसे प्रतिष्ठित ‘गांधी शांति पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था। साथ ही, भारत सरकार ने इसे ‘राष्ट्रीय उत्कृष्टता संस्थान’ के रूप में भी मान्यता प्रदान की है।

भारतीय विद्या भवन के बुनियादी उद्देश्यों में ‘इंडोलॉजी’ (भारतविद्या) की सभी शाखाओं पर व्यवस्थित और गहन शोध करना शामिल है, जो इसके मूल संकल्पों में रचित-बसा है। मुझे यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता है कि भारतीय विद्या भवन के दिल्ली केंद्र ने ‘सेंटर ऑफ इंडोलॉजी’ (भारतविद्या केंद्र) की शुरुआत करके एक अनुकरणीय पहल की है। 

यह केंद्र भारत के इतिहास, यहाँ की समृद्ध भाषाओं, साहित्य, संस्कृति, धर्म और दर्शन के व्यवस्थित अध्ययन, अध्यापन और अनुसंधान को समर्पित है। यह प्रयास भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान की दिशा में एक बड़ा कदम है और भारतीय विद्या भवन के संस्थापक, डॉ. के.एम. मुंशी जी के प्रति एक वैचारिक और सच्ची श्रद्धांजलि है।

देवियो और सज्जनो,

मुझे यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता है कि भारतीय विद्या भवन, अमृतसर, पंजाब में भारतीय विद्या भवन, मुंबई का एकमात्र केंद्र है। यह केंद्र वर्ष 1991 में भारतीय विद्या भवन के तत्कालीन भवन्स के उपाध्यक्ष एवं पंजाब के राज्यपाल श्री जैसुखलाल हाथी जी के आशीर्वाद से स्थापित हुआ।

इस केंद्र का उद्देश्य केवल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों, अनुशासन, सेवा, त्याग और राष्ट्रभक्ति के संस्कार विकसित करना है। इसी उद्देश्य से यह दो नियमित विद्यालयों के साथ-साथ आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए दो निःशुल्क विद्यालयों का सफल संचालन कर रहा है। शिक्षा, खेल और सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों में इसकी निरंतर उत्कृष्ट उपलब्धियाँ तथा शिक्षकों और विद्यार्थियों को प्राप्त राज्य एवं राष्ट्रीय सम्मान इसकी गुणवत्ता के प्रमाण हैं। विशेष गर्व का विषय है कि पिछले 12 वर्षों में यहाँ के शिक्षकों ने उत्तर भारत में सर्वाधिक ‘सीबीएसई बेस्ट टीचर अवॉर्ड’ प्राप्त किए हैं।

 

शिक्षा के साथ-साथ भारतीय विद्या भवन, अमृतसर समाज सेवा के क्षेत्र में भी अनुकरणीय कार्य कर रहा है। ‘भवन्स आश्रय’ के माध्यम से वरिष्ठ नागरिकों के लिए अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त 50 कमरों वाला आवास संचालित किया जा रहा है। वहीं ‘भवन्स सक्षम’ पंजाब का अपनी तरह का एक विशिष्ट केंद्र है, जहाँ मानसिक दिव्यांग युवाओं को प्रशिक्षण, पुनर्वास और कौशल विकास के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है। 

वास्तव में, भारतीय विद्या भवन, अमृतसर शिक्षा, सेवा और संस्कार के अद्भुत समन्वय का जीवंत उदाहरण है। यह संस्था भारतीय संस्कृति के उस आदर्श को साकार कर रही है, जिसमें विद्या केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की सेवा का माध्यम मानी गई है।

देवियों और सज्जनों,

आज चिकित्सा विज्ञान ने अभूतपूर्व प्रगति की है। हमारे पास बड़े-बड़े मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल हैं, बेहतरीन तकनीक है। लेकिन इस कड़वी सच्चाई से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि आज भी समाज का एक ऐसा वर्ग है, जो इतना निर्धन है कि वह अस्पताल तक पहुँचने के लिए एक रिक्शे का किराया भी वहन नहीं कर सकता। बीमारी की हालत में तड़पना और पैसे की कमी के कारण इलाज न करा पाना, किसी भी सभ्य समाज के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है।

ऐसे समय में, भारतीय विद्या भवन का ‘‘भवन्स हेल्थ केयर ऑन व्हील्स’’ प्रोजेक्ट एक मसीहा बनकर सामने आया है। यह केवल एक वातानुकूलित मोबाइल वैन नहीं है, बल्कि यह गरीबों के घर तक पहुँचने वाली ‘उम्मीद की किरण’ है। इस मोबाइल वैन की विशेषताएं सचमुच अनुकरणीय हैं।

मुझे बताया गया है कि इस आधुनिक वैन में दो सुसज्जित चैम्बर्स बनाए गए हैं, जिसमें एक जनरल फिजिशियन और एक डेंटिस्ट के लिए अत्याधुनिक डेंटल चेयर की व्यवस्था की गई है।

यह वैन शहर के तीन चिन्हित स्लम क्षेत्रों का सप्ताह में दो बार दौरा करेगी। इसका समय सुबह 10:00 बजे से दोपहर 2:00 बजे तक रहेगा, ताकि दैनिक कामगार और महिलाएं आसानी से अपनी जांच करा सकें। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यहाँ केवल प्राथमिक जांच ही नहीं होगी, बल्कि डॉक्टरों द्वारा मरीजों को निःशुल्क आवश्यक दवाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी।

यह इस दूरगामी परियोजना की पहली बस है। और मुझे यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता हुई कि आने वाले समय में, लोगों की आवश्यकताओं और सुझावों के आधार पर ऐसी और भी मोबाइल वैन इस सेवा कार्य से जोड़ी जाएंगी। यह इस बात का प्रमाण है कि संस्थान की दृष्टि केवल तात्कालिक राहत देने की नहीं, बल्कि एक स्थायी और सुदृढ़ हेल्थकेयर डिलीवरी सिस्टम बनाने की है।

साथियो,

मैं इस अवसर पर उन डॉक्टरों और चिकित्सा कर्मियों को विशेष रूप से सलाम करता हूँ, जो इस वैन के माध्यम से अपनी सेवाएं देंगे। स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ‘‘यदि आप किसी भूखे, बीमार या असहाय व्यक्ति की सेवा करते हैं, तो आप साक्षात ईश्वर की पूजा कर रहे होते हैं।’’

चिकित्सा का पेशा कोई व्यापार नहीं, एक पवित्र व्रत है। जब आप इन स्लम क्षेत्रों में जाकर एक असहाय वृद्ध, एक लाचार माँ या एक कुपोषित बच्चे का इलाज करेंगे, तो उनके चेहरों पर आने वाली मुस्कान और उनकी आँखों से निकलने वाले असीम आशीर्वाद की तुलना संसार के किसी भी धन-दौलत से नहीं की जा सकती।

मैं समाज के संपन्न वर्ग, उद्योगपतियों और दानदाताओं से भी यह आह्वाहन करता हूँ कि वे भारतीय विद्या भवन की इस अनूठी पहल में बढ़-चढ़कर अपना योगदान दें। जब तक हम अपने समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को स्वस्थ, सुरक्षित और सशक्त नहीं बनाएंगे, तब तक एक समग्र राष्ट्र के रूप में हमारी प्रगति अधूरी रहेगी।

देवियो और सज्जनो,

भारतीय संस्कृति में दान, सेवा और परोपकार को केवल एक सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि जीवन का सर्वोच्च धर्म माना गया है। हमारे सनातन दर्शन में कहा गया है, ‘‘अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्। परोपकारः पुण्याय, पापाय परपीडनम्’’ अर्थात् महर्षि वेदव्यास ने अठारहों पुराणों का सार केवल दो वचनों में समेट दिया, परोपकार सबसे बड़ा पुण्य है और दूसरों को कष्ट पहुँचाना सबसे बड़ा पाप।

हमारी संस्कृति त्याग, करुणा और लोकमंगल की संस्कृति है। यही कारण है कि हमारे इतिहास और पुराण ऐसे असंख्य प्रेरक चरित्रों से भरे पड़े हैं जिन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख से ऊपर समाज और मानवता के कल्याण को स्थान दिया। राजा रंतिदेव ने स्वयं भूखे रहकर अतिथि और जरूरतमंदों का पेट भरा तथा प्रार्थना की कि उन्हें न स्वर्ग चाहिए, न मोक्ष, बल्कि केवल इतना वरदान मिले कि वे दूसरों के दुःख दूर कर सकें। 

महर्षि दधीचि ने देवताओं और समस्त मानवता की रक्षा के लिए अपनी अस्थियाँ तक दान कर दीं, जिनसे वज्र का निर्माण हुआ और अधर्म पर धर्म की विजय सुनिश्चित हुई। दानवीर कर्ण ने जीवनभर बिना किसी भेदभाव के दान दिया और अंतिम क्षण तक अपनी उदारता एवं वचनबद्धता का परिचय दिया। ये उदाहरण हमें बताते हैं कि सच्ची महानता संपत्ति के संग्रह में नहीं, बल्कि उसके सदुपयोग और लोककल्याण में निहित है।

इसी महान परंपरा ने भारत को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ और ‘नर सेवा ही नारायण सेवा है’ जैसे सार्वभौमिक आदर्श दिए। यही कारण है कि भारत में सेवा केवल एक कार्य नहीं, बल्कि साधना मानी गई है; दान केवल संसाधनों का वितरण नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, करुणा और सामाजिक उत्तरदायित्व की अभिव्यक्ति है। 

पंजाब की यह पावन धरती तो स्वयं श्री गुरु नानक देव जी के ‘वंड छको’ और ‘सरबत दा भला’ के अमर संदेश से अनुप्राणित रही है। गुरु साहिब ने हमें सिखाया कि ईश्वर की सच्ची उपासना केवल प्रार्थना में नहीं, बल्कि अपनी कमाई को ज़रूरतमंदों के साथ बाँटने और मानवता की निस्वार्थ सेवा करने में है। 

‘सच्चा सौदा’ की प्रेरक घटना, जब गुरु नानक देव जी ने अपने पिता द्वारा दिए गए 20 रुपये भूखे और जरूरतमंद लोगों की सेवा में लगाकर मानवता को सर्वोच्च धर्म बताया, आज भी सेवा और करुणा का अनुपम आदर्श है। उसी भावना से प्रारम्भ हुई लंगर की परंपरा आज जाति, धर्म, भाषा और सीमाओं से ऊपर उठकर पूरी दुनिया में समानता, सेवा और मानवता का प्रतीक बन चुकी है। 

मुझे प्रसन्नता है कि भारतीय विद्या भवन का यह प्रोजेक्ट भी ‘सरबत दा भला’ की इसी शाश्वत भावना का आधुनिक, नवाचारी और तकनीक-संचालित स्वरूप है।

देवियो और सज्जनो,

आधुनिक भारत में भी अनेक महापुरुषों ने सेवा और परोपकार की परंपरा को नई ऊँचाइयाँ प्रदान की हैं। मदर टेरेसा ने अपना संपूर्ण जीवन निर्धनों, रोगियों, अनाथों और समाज के सबसे वंचित लोगों की सेवा में समर्पित कर दिया। उन्होंने हमें यह संदेश दिया कि मानवता की सबसे बड़ी सेवा वही है, जो बिना किसी भेदभाव और बिना किसी अपेक्षा के की जाए।

इसी प्रकार महान समाजसेवी और स्वतंत्रता सेनानी बाबा आम्टे ने कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों के प्रति समाज में व्याप्त उपेक्षा और भेदभाव को चुनौती देते हुए अपना पूरा जीवन उनके सम्मानपूर्ण पुनर्वास के लिए समर्पित किया। उन्होंने ‘आनंदवन’ की स्थापना कर यह सिद्ध किया कि प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान, अवसर और आत्मनिर्भरता का अधिकार है। 

आधुनिक भारत में उद्योग जगत ने भी परोपकार की इस परंपरा को आगे बढ़ाया है। स्व. रतन टाटा ने सदैव यह विश्वास व्यक्त किया कि किसी उद्योग की सफलता का वास्तविक मूल्य समाज को लौटाने में है। शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान, कौशल विकास, ग्रामीण विकास और आपदा राहत के क्षेत्रों में टाटा ट्रस्ट्स द्वारा किए गए कार्य आज देश के लिए प्रेरणा हैं।

इसी प्रकार प्रमुख भारतीय व्यवसायी अज़ीम प्रेमजी ने अपनी अधिकांश निजी संपत्ति समाज के कल्याण के लिए समर्पित कर शिक्षा सुधार, शिक्षक प्रशिक्षण और सामाजिक विकास के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया है। उन्हें विश्व के सबसे बड़े परोपकारियों में गिना जाता है।

सेवा की यह भावना केवल बड़े उद्योगपतियों तक सीमित नहीं है। भारतीय शिक्षिका और लेखिका सुधा मूर्ति ने शिक्षा, ग्रामीण विकास, पुस्तकालयों, छात्रवृत्तियों, महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य सेवाओं और आपदा राहत के माध्यम से लाखों लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाया है। 

इन सभी महान व्यक्तित्वों का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि समाज का वास्तविक विकास केवल सरकारों के प्रयासों से नहीं, बल्कि प्रत्येक जागरूक नागरिक, सामाजिक संस्था, उद्योग और शिक्षण संस्थान की सक्रिय भागीदारी से संभव होता है। जब ज्ञान, संसाधन और संवेदनशीलता एक साथ जुड़ते हैं, तभी सेवा एक आंदोलन बनती है और राष्ट्र प्रगति के नए शिखरों को स्पर्श करता है।

देवियो और सज्जनो,

आज हमारा देश ‘विकसित भारत’ के एक महान संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। एक विकसित राष्ट्र का निर्माण केवल बड़ी इमारतों, सड़कों या उद्योगों से नहीं होता, बल्कि एक स्वस्थ, शिक्षित और संवेदनशील समाज से होता है। ‘‘भवन्स हेल्थ केयर ऑन व्हील्स’’ जैसी योजनाएं हमारे इस राष्ट्रीय संकल्प को धरातल पर साकार करने का माध्यम बनती हैं।

मैं एक बार फिर भारतीय विद्या भवन अमृतसर केंद्र के चेयरमैन, प्रबंधन समिति, आयोजन से जुड़े सभी कर्मठ सदस्यों और इस एम्बुलेंस सेवा को हरी झंडी दिखाने में सहयोग करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इस अत्यंत मानवीय और संवेदनशील प्रयास के लिए बधाई देता हूँ।

ईश्वर से प्रार्थना है कि यह मोबाइल वैन हज़ारों-लाखों चेहरों पर स्वास्थ्य और खुशहाली बिखेरने में सफल हो। आइए, हम सब मिलकर गुरु साहिब के ‘सरबत दा भला’ के संदेश को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं और समाज सेवा के इस महायज्ञ में अपनी आहुति दें।

इन्हीं शब्दों के साथ, इस पुनीत कार्य की सफलता के लिए मेरी अनेक-अनेक शुभकामनाएँ।

बहुत-बहुत धन्यवाद,

जय हिंद! 

जय भारत!