SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF LAUNCHING OF THE WHEELCHAIR CRICKET CHAMPIONSHIP 2026 AT CHANDIGARH ON JULY 18, 2026.

‘व्हीलचेयर क्रिकेट चैंपियनशिप 2026’ के शुभारंभ के अवसर पर

राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 18.07.2026,  शनिवारसमयः शाम 4:00 बजेस्थानः चंडीगढ़

         

नमस्कार!

आज पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ के क्रिकेट मैदान में आयोजित छठी डब्ल्यू.सी.एफ.आई. व्हीलचेयर क्रिकेट चैम्पियनशिप-2026 में आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है।

सबसे पहले, मैं व्हीलचेयर क्रिकेट फेडरेशन ऑफ इंडिया (WCFI), एसोसिएशन ऑफ प्रोफेशनल सोशल वर्कर्स एंड डेवलपमेंट प्रैक्टिशनर्स (APSWDP), राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान (RGNIYD), पंजाब विश्वविद्यालय तथा इस प्रेरणादायी आयोजन से जुड़े सभी सहयोगी संस्थानों एवं भागीदारों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ देता हूँ, जिन्होंने मिलकर इस उत्कृष्ट आयोजन को संभव बनाया है।

मुझे यह जानकर विशेष प्रसन्नता हुई कि यह दो दिवसीय राष्ट्रीय आयोजन "Inclusive India through Sports: Capacity Building and Leadership Development of Persons with Disabilities for Sustainable Futures" विषय पर आधारित है, जिसमें देशभर से 45 दिव्यांग खिलाड़ी एवं युवा नेतृत्वकर्ता भाग ले रहे हैं। यह आयोजन खेल, नेतृत्व, आत्मविश्वास और सामाजिक समावेशन का अद्भुत संगम है।

यह कार्यक्रम दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016, संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों, फिट इंडिया मूवमेंट, मिशन लाइफ (Mission LiFE) तथा विकसित भारत 2047 के राष्ट्रीय संकल्प के अनुरूप आयोजित किया गया है। 

मुझे यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता हुई कि वर्ष 2017 में विकलांगता के क्षेत्र में विकास कार्य करने वाली और एक सामाजिक कार्यकर्ता स्वर्गीय रेखा त्रिवेदी जी ने इस व्हीलचेयर क्रिकेट चैम्पियनशिप की शुरुआत की थी। वे भली-भाँति समझती थीं कि दिव्यांगजनों को सहानुभूति की नहीं, बल्कि अवसर, विश्वास और अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने के लिए उपयुक्त मंच की आवश्यकता होती है।

उनकी विरासत हमें यह सिखाती है कि सच्ची समाज सेवा केवल बड़े-बड़े आयोजनों या घोषणाओं से नहीं होती। अनेक बार वह एक सरल किन्तु दूरगामी विचार से प्रारम्भ होती है, किसी को अवसर देना, उसके भीतर छिपी क्षमता पर विश्वास करना और उसे आगे बढ़ने के लिए एक सशक्त मंच उपलब्ध कराना। आज की यह चैम्पियनशिप उसी प्रेरणादायी संकल्प का सशक्त विस्तार है।

मैं व्हीलचेयर क्रिकेट फेडरेशन ऑफ इंडिया की अध्यक्षा श्रीमती कविता रावत एवं उनकी समर्पित टीम की भी विशेष सराहना करता हूँ। उनके नेतृत्व में फेडरेशन ने व्हीलचेयर क्रिकेट को संगठित स्वरूप प्रदान करने, खिलाड़ियों को निरंतर प्रोत्साहन देने तथा देशभर में समावेशी खेल संस्कृति को बढ़ावा देने की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है।

इसने व्हीलचेयर क्रिकेट को एक सुव्यवस्थित, सम्मानजनक और प्रतिस्पर्धात्मक खेल के रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। फेडरेशन खिलाड़ियों को तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण, खेल संबंधी विशेषज्ञता, सुरक्षा संबंधी आवश्यक परामर्श तथा प्रतियोगिताओं के सुचारु संचालन में निरंतर सहयोग प्रदान करता रहा है। इस कार्यक्रम में भी फेडरेशन तकनीकी खेल सहयोगी के रूप में महत्वपूर्ण दायित्व निभा रहा है।

मैं व्हीलचेयर क्रिकेट फेडरेशन ऑफ इंडिया की पूरी टीम को समावेशी खेल संस्कृति को सुदृढ़ बनाने तथा दिव्यांग खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने के लिए एक सशक्त राष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराने हेतु हार्दिक बधाई देता हूँ।

मैं इस अवसर पर एसोसिएशन ऑफ प्रोफेशनल सोशल वर्कर्स एंड डेवलपमेंट प्रैक्टिशनर्स (APSWDP) की महत्त्वपूर्ण भूमिका का विशेष उल्लेख करना चाहूँगा। सामाजिक विकास, सामुदायिक सहभागिता, दिव्यांगजन समावेशन तथा क्षमता निर्माण के क्षेत्र में यह संस्था लंबे समय से सराहनीय कार्य कर रही है। इस कार्यक्रम में भी प्रतिभागियों के समन्वय, जन-जागरूकता, खेल गतिविधियों के संचालन तथा विभिन्न हितधारकों के बीच प्रभावी सहयोग स्थापित करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

मैं राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान (RGNIYD)] क्षेत्रीय केन्द्र, चण्डीगढ़ की भी सराहना करता हूँ, जिसने इस कार्यक्रम के आयोजन में प्रशिक्षण, आवासीय व्यवस्था, शैक्षणिक समन्वय तथा अन्य आवश्यक संसाधनों के माध्यम से महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया है। साथ ही, मैं पंजाब विश्वविद्यालय का भी आभार व्यक्त करता हूँ, जिसने इस राष्ट्रीय आयोजन के लिए अपना क्रिकेट मैदान तथा आवश्यक अवसंरचनात्मक सहयोग उपलब्ध कराया। समावेशी खेलों के विकास के लिए ऐसी संस्थागत सहभागिता अत्यंत आवश्यक है।

यह आयोजन इस बात का उत्तम उदाहरण है कि राष्ट्र निर्माण में गैर-सरकारी संगठनों और नागरिक समाज की भूमिका कितनी महत्त्वपूर्ण है। सरकार नीतियाँ और योजनाएँ बनाती है, किन्तु उन्हें समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने में ऐसे संगठन एक सशक्त सेतु का कार्य करते हैं। 

 

विशेष रूप से दिव्यांगजन समावेशन के क्षेत्र में वे न केवल सुविधाएँ उपलब्ध कराने का कार्य करते हैं, बल्कि समाज की सोच में सकारात्मक परिवर्तन लाने का भी महत्वपूर्ण दायित्व निभाते हैं। 

मैं इस आयोजन से जुड़े सभी अन्य सहयोगी संस्थानों एवं साझेदार संगठनों को भी हार्दिक बधाई देता हूँ। यह आयोजन प्रेरणादायी उदाहरण है कि जब विभिन्न संस्थाएँ एक साझा उद्देश्य के साथ मिलकर कार्य करती हैं, तब समाज में सकारात्मक और दूरगामी परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त होता है।

साथियो,

भारत में खेलों का इतिहास केवल कुछ दशकों या सदियों पुराना नहीं है, बल्कि यह हमारी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति की जड़ों में बहुत गहराई तक बसा हुआ है। हमारे वेद, उपनिषद और महाकाव्य इस बात के प्रत्यक्ष साक्षी हैं कि प्राचीन भारत में शारीरिक तंदुरूस्ती और खेल-कूद को जीवन का एक अनिवार्य और पवित्र हिस्सा माना जाता था। 

प्राचीन काल के गुरुकुलों में शिक्षा व्यवस्था केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं थी। वहां ‘मल्लयुद्ध’ (कुश्ती), ‘धनुर्विद्या’ (तीरंदाजी), ‘रथ दौड़’, और ‘शस्त्र विद्या’ जैसे खेलों और कलाओं पर विशेष बल दिया जाता था। रामायण में भगवान राम की अद्भुत धनुर्विद्या हो या महाभारत में भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध, और अर्जुन का अचूक निशाना, ये सभी हमारे प्राचीन खेल कौशल और शारीरिक क्षमता के सर्वोच्च उदाहरण हैं। 

हमारे ऋषि-मुनियों का स्पष्ट मानना था कि ‘‘शरीरमाद्यम खलु धर्मसाधनम्’’ अर्थात् यह शरीर ही सभी कर्तव्यों और धर्मों के पालन का प्रथम और प्रमुख साधन है। शारीरिक बल के बिना कोई भी महान लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता।

देवियो और सज्जनो,

हमारे देश के जनजीवन में खेलों का हमेशा से एक विशेष स्थान रहा है। और भारत में, क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं है, बल्कि एक गहरी भावना है। यह भाषा, क्षेत्र, समुदाय और पीढ़ियों की दीवारों को तोड़कर लोगों को आपस में जोड़ता है। जब भी क्रिकेट का कोई मैच खेला जाता है, तो पूरा देश खुद को एक सूत्र में बंधा हुआ महसूस करता है।

लेकिन आज, इस मैदान पर जो क्रिकेट खेला जा रहा है, उसके मायने कहीं ज्यादा गहरे हैं। व्हीलचेयर क्रिकेट सिर्फ रन बनाने, विकेट लेने या ट्रॉफी जीतने तक सीमित नहीं है। यह समाज की रूढ़ियों और बाधाओं को तोड़ने के बारे में है। यह लोगों की सोच को बदलने के बारे में है। 

यह साबित करने के बारे में है कि इंसान का हौसला, उसके सामने आने वाली किसी भी मुश्किल से कहीं ज्यादा बड़ा और मज़बूत होता है। यह हमारे समाज को यह दिखाने का जरिया है कि किसी भी तरह की शारीरिक अक्षमता किसी व्यक्ति की छिपी हुई प्रतिभा या उसकी असीमित क्षमता को कम नहीं कर सकती।

जब हमारे ये व्हीलचेयर क्रिकेट खिलाड़ी मैदान पर उतरते हैं, तो वे पूरी दुनिया को एक बहुत ही दमदार और मज़बूत संदेश देते हैं कि हमें हमारी सीमाओं से मत आंकिए, बल्कि हमारी पहचान हमारे साहस, हमारे हुनर और हमारे जीतने के पक्के इरादे से कीजिए। यह संदेश न केवल खेल के मैदान के लिए, बल्कि हमारे पूरे समाज के निर्माण के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

मेरे युवा खिलाड़ियों, 

जब भी मैं दिव्यांगजनों के अदम्य साहस को देखता हूँ, तो मुझे लगता है कि ‘विकलांगता’ केवल शरीर की एक अवस्था हो सकती है, लेकिन अगर इरादों में जान हो, तो इंसान पूरी दुनिया जीत सकता है।

हमारा इतिहास और वर्तमान ऐसे अनगिनत ‘दिव्यांग अचीवर्स’ से भरा पड़ा है, जिन्होंने दुनिया को हैरान किया है। याद कीजिए दीपा मलिक जी को, जिन्होंने कमर के नीचे लकवाग्रस्त होने के बावजूद पैरालंपिक खेलों में भारत के लिए मेडल जीतकर इतिहास रच दिया।

याद कीजिए भारत की अवनि लेखरा को, जिन्होंने व्हीलचेयर पर बैठकर शूटिंग में पैरालंपिक गोल्ड मेडल जीतकर तिरंगे की शान बढ़ाई। आप सभी ने कश्मीर की उस 16 वर्षीय बेटी शीतल देवी को देखा होगा, जिसके दोनों हाथ नहीं हैं, लेकिन उसने अपने पैरों से तीरंदाजी करके एशियन पैरा गेम्स में दो स्वर्ण पदक जीते और पूरी दुनिया को अचंभित कर दिया।

अरुणिमा सिन्हा, जिन्होंने एक दुर्घटना में अपना पैर खो दिया, लेकिन हार नहीं मानी और कृत्रिम पैर के सहारे माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली विश्व की पहली महिला दिव्यांग पर्वतारोही बनीं। देवेंद्र झाझरिया, जिन्होंने एक हाथ से दो बार पैरालंपिक में स्वर्ण पदक जीतकर विश्व रिकॉर्ड स्थापित किया। सुमित अंतिल ने भाला फेंक प्रतियोगिता में विश्व रिकॉर्ड के साथ पैरालंपिक स्वर्ण जीतकर यह सिद्ध किया कि दृढ़ निश्चय के सामने कोई बाधा टिक नहीं सकती।

और कौन भूल सकता है हमारे पहले पैरालंपिक स्वर्ण पदक विजेता मुरलीकांत पेटकर जी और बैडमिंटन कोर्ट पर अपनी रफ़्तार से दुनिया को मात देने वाले आईएएस अधिकारी सुहास यथिराज को। 

इन सभी ने यह साबित किया है कि शारीरिक सीमाएं, मानसिक दृढ़ता के सामने घुटने टेक देती हैं। आप 45 खिलाड़ी भी उन्हीं की तरह भारत के प्रेरणास्रोत हैं।

आज मैं आप सभी खिलाड़ियों से कहना चाहता हूँ कि क्रिकेट के इस मैदान पर हार-जीत से कहीं ज्यादा अहम आपका यहाँ होना है। आपकी व्हीलचेयर आपकी कमज़ोरी नहीं, बल्कि आपके उस जज़्बे का रथ है जो हर चुनौती को कुचलते हुए आगे बढ़ता है।

मुझे एक बहुत ही सुंदर पंक्ति याद आती है, ‘‘मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।’’

आज आप क्रिकेट खेलने नहीं, बल्कि पूरे समाज की सोच बदलने के लिए मैदान में उतरे हैं। आपका प्रत्येक रन, प्रत्येक कैच, प्रत्येक विकेट और प्रत्येक संघर्ष लाखों लोगों को यह संदेश देगा कि अवसर मिलने पर दिव्यांगजन किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकते हैं। 

प्रिय खिलाड़ियों,

मैं आप सबसे केवल एक बात कहना चाहता हूँ कि आज जीतने की कोशिश अवश्य कीजिए, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि खेल भावना कभी न हारिए। याद रखिए, पदक खिलाड़ी को महान नहीं बनाते, बल्कि खिलाड़ी अपने चरित्र, अनुशासन और संघर्ष से पदकों को महान बनाते हैं।

स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ‘‘उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।’’ यह संदेश आप सभी खिलाड़ियों के जीवन पर पूरी तरह लागू होता है।

महात्मा गांधी ने कहा था, ‘‘शक्ति शारीरिक क्षमता से नहीं, अदम्य इच्छाशक्ति से आती है।’’ आप सभी इस विचार के सजीव उदाहरण हैं।

मैं यहाँ उपस्थित हर एक खिलाड़ी से यह कहना चाहता हूँ कि आप यहाँ किसी की सहानुभूति या दया की वजह से नहीं हैं। आप यहाँ अपने हुनर और अपनी काबिलियत के दम पर हैं। आप यहाँ अपनी अटूट लगन और मेहनत की बदौलत हैं। आप यहाँ इसलिए हैं क्योंकि आप पूरी तरह से इस मंच के हक़दार हैं।

मुझे पूरा विश्वास है कि आपको खेलते हुए देखकर देश के अनगिनत दिव्यांग बच्चे और युवा पूरे आत्मविश्वास के साथ यही कहेंगे, ‘‘अगर ये कर सकते हैं, तो मैं भी कर सकता हूँ।’’ और सच कहूँ तो, यही खेलों की असली ताकत है।

प्रिय युवा साथियो,

मैं समाज से भी एक आग्रह करना चाहता हूँ। दिव्यांगजनों को सहानुभूति की नहीं, समान अवसरों की आवश्यकता है। उन्हें दया नहीं, गरिमा चाहिए। उन्हें अलग पहचान नहीं, समान भागीदारी चाहिए।

यदि हम अपने विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, खेल परिसरों, कार्यालयों और सार्वजनिक स्थानों को पूर्णतः सुलभ बना दें, तो हमारे लाखों दिव्यांग युवा अपनी प्रतिभा से देश को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा सकते हैं।

आज आवश्यकता Inclusive Infrastructure, Inclusive Education, Inclusive Sports और Inclusive Employment की है। यही विकसित भारत की पहचान होगी।

देवियो और सज्जनो,

भारत सरकार ने वर्ष 2016 में ‘दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम’ लागू कर दिव्यांगजनों के अधिकारों को और अधिक सशक्त बनाया। ‘विकलांग’ के स्थान पर ‘दिव्यांग’ शब्द का व्यापक उपयोग भी इसी सकारात्मक सोच का प्रतीक है। यह परिवर्तन केवल शब्दों का नहीं, बल्कि दृष्टिकोण का परिवर्तन है। 

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में दिव्यांगजनों के सशक्तिकरण को सुशासन की एक महत्वपूर्ण प्राथमिकता बनाया गया है। ‘सुगम्य भारत अभियान’ के माध्यम से सार्वजनिक भवनों, परिवहन व्यवस्था और डिजिटल सेवाओं को अधिक सुलभ बनाया जा रहा है। यूनीक डिसएबिलिटी आईडी परियोजना ने दिव्यांगजनों को एकीकृत पहचान प्रदान कर सरकारी योजनाओं एवं सेवाओं तक उनकी पहुँच को सरल बनाया है। ‘दीनदयाल दिव्यांग पुनर्वास योजना’, ADIP (Assistance to Disabled Persons) योजना के अंतर्गत सहायक उपकरणों के वितरण, ‘राष्ट्रीय वयोश्री योजना’ के माध्यम से वरिष्ठ दिव्यांगजनों को सहायता उपकरण उपलब्ध कराने तथा ‘प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना’ के अंतर्गत विशेष कौशल प्रशिक्षण जैसी पहलों ने दिव्यांगजनों को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में नई शक्ति प्रदान की है।

शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में भी अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020’ समावेशी शिक्षा पर विशेष बल देती है, जबकि ‘दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016’ ने शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास और सार्वजनिक जीवन में दिव्यांगजनों के अधिकारों को और अधिक सुदृढ़ किया है। ‘खेलो इंडिया’, पैरा स्पोर्ट्स को बढ़ावा, तथा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पैरा खिलाड़ियों को बेहतर प्रशिक्षण, सुविधाएँ और प्रोत्साहन देकर भारत ने खेलों में भी नई पहचान बनाई है। 

इन सभी प्रयासों का मूल उद्देश्य यही है कि दिव्यांगजन कल्याण के पात्र नहीं, बल्कि विकास के साझेदार बनें। आज भारत एक ऐसे समावेशी समाज के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जहाँ प्रत्येक नागरिक को उसकी क्षमता के अनुरूप अवसर, सम्मान और समान भागीदारी सुनिश्चित हो सके।

देवियो और सज्जनो,

मुझे विश्वास है कि यह टूर्नामेंट केवल दो दिनों का खेल आयोजन बनकर नहीं रहेगा, बल्कि समाज में जागरूकता, संवेदनशीलता और समावेशिता का एक नया संदेश लेकर जाएगा। यहाँ उपस्थित प्रत्येक खिलाड़ी, प्रत्येक प्रशिक्षक और प्रत्येक स्वयंसेवक समावेशी भारत का ब्रांड एम्बेसडर है।

आपका संघर्ष आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करेगा। आपकी सफलता अनेक परिवारों की सोच बदलेगी। और आपका आत्मविश्वास पूरे समाज को नई दिशा देगा।

अंत में, मैं सभी आयोजकों, प्रशिक्षकों, स्वयंसेवकों और इस आयोजन को सफल बनाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को हार्दिक बधाई देता हूँ।

मैं सभी खिलाड़ियों को अपनी शुभकामनाएँ देता हूँ। आप खेल भावना, अनुशासन और उत्कृष्ट प्रदर्शन के साथ इस प्रतियोगिता में भाग लें तथा अपने जीवन से यह सिद्ध करें कि साहस ही सबसे बड़ी शक्ति है और संकल्प ही सबसे बड़ी विजय।

आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम ऐसा भारत बनाएँगे जहाँ किसी व्यक्ति की पहचान उसकी सीमाओं से नहीं, बल्कि उसकी क्षमताओं से होगी; जहाँ प्रत्येक नागरिक को समान अवसर मिलेगा; और जहाँ समावेशन केवल नीति नहीं, बल्कि हमारी जीवनशैली बनेगा।

इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ मैं इस राष्ट्रीय व्हीलचेयर क्रिकेट टूर्नामेंट के सफल आयोजन एवं सभी खिलाड़ियों के उज्ज्वल भविष्य की हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।

बहुत-बहुत धन्यवाद,

जय हिन्द!

जय भारत!