SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF COOPERATIVE SEMINAR AT CHANDIGARH ON JULY 19, 2026.
- by Admin
- 2026-07-19 15:35
‘सहकारिता संगोष्ठी’ के अवसर पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 19.07.2026, रविवार समयः दोपहर 1:00 बजे स्थानः चंडीगढ़
नमस्कार!
आज इस महत्वपूर्ण सहकारिता संगोष्ठी में उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। मैं सहकार भारती, चंडीगढ़ तथा सहकारिता विभाग, यू.टी. चंडीगढ़ को इस आयोजन के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ।
यह संगोष्ठी ऐसे समय में आयोजित हो रही है जब भारत में सहकारिता क्षेत्र एक नए युग में प्रवेश कर रहा है। सहकारिता केवल एक आर्थिक व्यवस्था नहीं, बल्कि सहयोग, सहभागिता, सामाजिक समरसता, सामूहिक उत्तरदायित्व और समावेशी विकास का सशक्त माध्यम है। भारत की सांस्कृतिक परंपरा में सहयोग, सहभागिता और सामूहिक उन्नति के जो मूल्य सदियों से विद्यमान रहे हैं, सहकारिता उन्हीं मूल्यों का आधुनिक स्वरूप है।
आज जब हम यहाँ सहकारिता पर चर्चा कर रहे हैं, तो ‘सहकार भारती’ के अमूल्य योगदान को याद करना अत्यंत आवश्यक है। सहकार भारती आज देश भर में सहकारिता आंदोलन का सबसे बड़ा और प्रामाणिक गैर-सरकारी संगठन बन चुका है।
इस महान संस्था की नींव 11 जनवरी 1978 को पुणे (महाराष्ट्र) में महान विचारक और समाज सेवक, स्वर्गीय लक्ष्मणराव इनामदार जी (जिन्हें हम आदर से ‘वकील साहब’ कहते हैं) द्वारा रखी गई थी। उन्होंने सहकारिता को केवल आर्थिक गतिविधि के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का माध्यम माना।
उनका विश्वास था कि सहकारिता का आधार केवल पूंजी नहीं, बल्कि विश्वास, संस्कार और सामाजिक उत्तरदायित्व होना चाहिए। इसी विचार से सहकार भारती का ध्येय वाक्य बना, “बिना संस्कार नहीं सहकार, बिना सहकार नहीं उद्धार।” यह नारा नहीं, बल्कि सहकारिता की आत्मा है। सहकारी संस्थाओं की सफलता का आधार आर्थिक संसाधनों से अधिक नैतिक मूल्य, पारदर्शिता, लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली और सेवा की भावना होती है।
आज हमारे देश में ‘सहकारिता’ खेती-किसानी, लोन, बैंकिंग, घर-मकान, डेयरी और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने जैसे कई क्षेत्रों में बहुत बड़ा काम कर रही है। आपको जानकर खुशी होगी कि पूरी दुनिया की एक-चौथाई (25 प्रतिशत) से ज्यादा सहकारी संस्थाएं केवल भारत में ही हैं।
दिसंबर 2025 के आंकड़ों के अनुसार, हमारे देश में 8 लाख 50 हजार से ज्यादा सहकारी समितियां रजिस्टर्ड हैं, जिनमें से करीब 6 लाख 60 हजार समितियां कार्यशील हैं। इनमें से लगभग 2 लाख 60 हजार शहरी और लगभग 4 लाख ग्रामीण समितियां हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इनकी पहुँच देश के 98 प्रतिशत गाँवों तक हो चुकी है और ये 30 अलग-अलग क्षेत्रों में लगभग 32 करोड़ सदस्यों को अपनी सेवाएँ दे रही हैं।
इसी सहकारिता की बदौलत आज हमारे किसान, दूध का काम करने वाले, कारीगर, मछुआरे, व्यापारी और मजदूर सीधे बड़े बाजारों से जुड़ पा रहे हैं। इसके अलावा, महिला स्वयं सहायता समूहों की मदद से लगभग 10 करोड़ महिलाओं को भी इस अभियान से जोड़कर उन्हें सशक्त बनाया गया है।
जहाँ तक हमारे केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ का प्रश्न है, मुझे यह साझा करते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है कि वर्तमान में यहाँ 195 सहकारी समितियां सक्रिय रूप से कार्यशील हैं। इन समितियों के माध्यम से 24 हजार 848 सदस्य एक मज़बूत परिवार की तरह सहकारिता आंदोलन से जुड़े हैं।
यदि भारत की दुग्ध क्रांति का उल्लेख किया जाए, तो अमूल इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। डॉ. वर्गीज़ कुरियन के नेतृत्व में सहकारिता के माध्यम से गुजरात के छोटे-छोटे दुग्ध उत्पादकों ने विश्व की सबसे बड़ी डेयरी सहकारी संस्था का निर्माण किया। यह केवल एक व्यावसायिक सफलता नहीं थी, बल्कि करोड़ों किसानों की आर्थिक स्वतंत्रता का अभियान था।
इसी प्रकार इफको (IFFCO), कृभको (KRIBHCO), नैफेड ; (NAFED), विभिन्न राज्य सहकारी बैंक तथा प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ आज भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनी हुई हैं।
सहकारिता के वैश्विक महत्व को स्वीकार करते हुए, संयुक्त राष्ट्र ने 19 जून 2024 को एक ऐतिहासिक घोषणा की थी। संयुक्त राष्ट्र ने ‘सहकारिता से बेहतर विश्व का निर्माण’ की थीम के साथ, वर्ष 2025 को ‘अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष’ के रूप में घोषित किया है।
इस ‘अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष 2025’ के माध्यम से, संयुक्त राष्ट्र का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर एक नई जन-चेतना और गतिशीलता पैदा करना है। इसके तहत विश्व भर की सरकारों, संस्थाओं और नागरिकों को यह स्पष्ट प्रेरणा दी जा रही है कि वे एक अधिक टिकाऊ और न्यायसंगत भविष्य के निर्माण के लिए सहकारी उद्यमों को और अधिक सशक्त व मजबूत बनाएं।
देवियो और सज्जनो,
भारत की संस्कृति में सहकारिता कोई नई अवधारणा नहीं है। यह हमारी सभ्यता के मूल में विद्यमान रही है। हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही हमें यह संदेश दिया था, ‘‘संगच्छध्वम संवदध्वम सम वो मनांसि जानताम्।’’ अर्थात् हम साथ चलें, साथ सोचें और मिलकर आगे बढ़ें।
इसी भावना को हमारे उपनिषदों ने ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ के रूप में अभिव्यक्त किया और भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में लोकसंग्रह अर्थात समाज के सामूहिक कल्याण को श्रेष्ठ कर्म बताया। यही सहकारिता का वास्तविक दर्शन है, ‘मैं’ नहीं, ‘हम’; प्रतिस्पर्धा नहीं, सहभागिता; स्वार्थ नहीं, सामूहिक समृद्धि।
महात्मा गांधी कहा करते थे, ‘‘भारत की आत्मा उसके गाँवों में बसती है।’’ यदि हमें अपने गाँवों को समृद्ध बनाना है, किसानों को सशक्त बनाना है, महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है और युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराना है, तो सहकारिता सबसे प्रभावी माध्यमों में से एक है।
साथियो,
माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत सरकार ने सहकारिता क्षेत्र को नई ऊर्जा और नई दिशा प्रदान की है। वर्ष 2021 में देश में पहली बार सहकारिता मंत्रालय का गठन किया गया। यह ऐतिहासिक निर्णय इस बात का प्रमाण है कि सरकार सहकारिता को भारत की विकास यात्रा का एक महत्वपूर्ण स्तंभ मानती है।
सहकारिता मंत्रालय, नाबार्ड, एनडीडीबी, एनएफडीबी और राज्य सरकारों के साथ मिलकर भारत में सहकारिता आंदोलन को मजबूत करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहा है।
माननीय केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह जी के नेतृत्व में “सहकार से समृद्धि” के लक्ष्य को लेकर अनेक पहलें की गई हैं। डिजिटल तकनीक, पारदर्शी प्रबंधन, कंप्यूटरीकरण, बहुउद्देशीय प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ, कृषि अवसंरचना, भंडारण, मूल्य संवर्धन, जैविक खेती, प्राकृतिक खेती तथा ग्रामीण उद्यमिता के साथ सहकारिता का नया युग शुरू हो रहा है।
सरकार ने प्राथमिक कृषि ऋण समितियों के कंप्यूटरीकरण, नई बहुउद्देशीय प्राथमिक कृषि ऋण समितियों के गठन, राष्ट्रीय सहकारी डाटाबेस, सहकारी संस्थाओं के डिजिटलीकरण तथा सहकारी संस्थाओं के लिए अनेक कर सुधार जैसे महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। यह परिवर्तन ग्रामीण भारत को आर्थिक रूप से अधिक सशक्त बना रहा है।
भारत सरकार की नीतियों का मूल उद्देश्य यह है कि सहकारिता को देश के आर्थिक विकास का प्रमुख स्तंभ बनाया जाए तथा समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुँचाया जाए। विकसित भारत के निर्माण में सहकारिता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
प्रिय साथियो,
मुझे प्रसन्नता है कि चंडीगढ़ सहकारिता विभाग भी इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर रहा है। चंडीगढ़ जैसे आधुनिक, शिक्षित और सुव्यवस्थित शहर में सहकारिता की अपार संभावनाएँ हैं। यहाँ सहकारी हाउसिंग सोसायटियों, उपभोक्ता सहकारी संस्थाओं तथा अन्य सहकारी संगठनों के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों को लाभ पहुँचाया जा रहा है।
चंडीगढ़ प्रशासन और सहकारिता विभाग द्वारा पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और सुशासन की दिशा में किए जा रहे प्रयास सराहनीय हैं। मैं आशा करता हूँ कि विभाग भविष्य में डिजिटलीकरण, प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण तथा नई सहकारी समितियों के गठन पर और अधिक ध्यान देगा।
विशेष रूप से युवाओं और महिलाओं की सहकारिता में भागीदारी बढ़ाना समय की आवश्यकता है। यदि हम सहकारिता को नई पीढ़ी से जोड़ने में सफल होते हैं, तो यह आंदोलन और अधिक व्यापक तथा प्रभावी बनेगा।
देवियो और सज्जनो,
सहकारिता केवल किसानों तक सीमित नहीं है। आज महिलाओं की स्वयं सहायता समूहों, दुग्ध समितियों, हस्तशिल्प समूहों, शहरी सहकारी समितियों, आवास समितियों, उपभोक्ता समितियों तथा स्टार्टअप आधारित उत्पादक समूहों में भी सहकारिता नई संभावनाएँ पैदा कर रही है।
यदि महिलाएँ सहकारिता से जुड़ती हैं तो पूरा परिवार आत्मनिर्भर बनता है। यदि युवा सहकारिता से जुड़ते हैं तो रोजगार माँगने वाले नहीं, बल्कि रोजगार देने वाले बनते हैं। यदि किसान सहकारिता से जुड़ते हैं तो उनकी आय बढ़ती है और लागत घटती है। और यदि समाज सहकारिता से जुड़ता है तो राष्ट्र अधिक समृद्ध, आत्मनिर्भर और अधिक संवेदनशील बनता है।
देवियो और सज्जनो,
आज के समय में सहकारिता की आवश्यकता केवल आर्थिक कारणों से नहीं, बल्कि सामाजिक कारणों से भी है। आज दुनिया अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, व्यक्तिवाद और सामाजिक विखंडन की चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे समय में सहकारिता हमें यह सिखाती है कि साझा प्रयास, साझा जिम्मेदारी और साझा सफलता ही स्थायी विकास का आधार हैं।
स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ‘‘एक विचार को अपना जीवन बना लो, उसी के बारे में सोचो, उसी का स्वप्न देखो और उसी के लिए जीओ।’’ यदि हम इस विचार को ‘सहकारिता’ से जोड़ दें, तो भारत का ग्रामीण और सामाजिक विकास नई ऊँचाइयों को प्राप्त कर सकता है।
पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी कहा करते थे, ‘‘छोटे-छोटे प्रयास मिलकर बड़े परिवर्तन का आधार बनते हैं।’’ सहकारिता इसी सामूहिक प्रयास की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति है।
साथियो,
मैं इस मंच से विशेष रूप से युवाओं से कहना चाहता हूँ कि भविष्य केवल नौकरी खोजने वालों का नहीं, बल्कि अवसर निर्माण करने वालों का होगा। आप कृषि आधारित स्टार्टअप, किसान उत्पादक संगठन, डेयरी, डिजिटल मार्केटिंग, खाद्य प्रसंस्करण, जैविक उत्पाद, ग्रामीण पर्यटन, हस्तशिल्प और सामाजिक उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में सहकारिता के माध्यम से नए आयाम स्थापित कर सकते हैं।
नई शिक्षा नीति-2020 भी उद्यमिता, कौशल विकास और सामुदायिक सहभागिता पर विशेष बल देती है। इसलिए आज का युवा सहकारिता आंदोलन का स्वाभाविक नेतृत्वकर्ता बन सकता है।
मैं महिलाओं से भी आग्रह करता हूँ कि वे स्वयं सहायता समूहों और सहकारी संस्थाओं के माध्यम से आर्थिक सशक्तिकरण की इस यात्रा में अग्रणी भूमिका निभाएँ।
चण्डीगढ़ जैसे आधुनिक और योजनाबद्ध शहर में भी सहकारिता की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। आवास, उपभोक्ता सेवाओं, शहरी आजीविका, कौशल विकास, महिला उद्यमिता, पर्यावरण संरक्षण, अपशिष्ट प्रबंधन तथा सामुदायिक विकास जैसे क्षेत्रों में यह उत्कृष्ट परिणाम दे सकता है।
मुझे विश्वास है कि सहकारिता विभाग, यू.टी. चण्डीगढ़ तथा सहकार भारती मिलकर इस दिशा में और अधिक प्रभावी पहल करेंगे।
साथियो,
आज आवश्यकता है कि हम सहकारिता को केवल ग्रामीण क्षेत्र तक सीमित न रखें, बल्कि शहरी जीवन की आवश्यकताओं के अनुरूप नए क्षेत्रों में भी विकसित करें। हाउसिंग, उपभोक्ता सेवाएँ, स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास, महिला उद्यमिता तथा युवा स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों में सहकारी मॉडल नई संभावनाएँ प्रस्तुत कर सकता है।
इस अवसर पर सहकारिता आंदोलन को और अधिक सशक्त बनाने के लिए मैं आपके समक्ष कुछ महत्वपूर्ण सुझाव रखना चाहूँगा। मेरा मानना है कि चंडीगढ़ में व्यापक स्तर पर सहकारिता जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए और विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में इस विषय पर नियमित कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए, ताकि हमारी युवा पीढ़ी इसके महत्व को गहराई से समझ सके।
इसके साथ ही, महिलाओं एवं युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए विशेष सहकारी योजनाएँ विकसित की जानी चाहिए। आज के तकनीकी युग की मांग को देखते हुए सभी सहकारी संस्थाओं के पूर्ण डिजिटलीकरण का लक्ष्य निर्धारित करना और उनके पदाधिकारियों व कर्मचारियों की कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना भी अत्यंत आवश्यक है।
इन सुनियोजित प्रयासों के माध्यम से हम निश्चित रूप से चंडीगढ़ को ‘शहरी सहकारिता’ के एक उत्कृष्ट मॉडल शहर के रूप में विकसित कर सकते हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि सहकार भारती, चंडीगढ़, सहकारिता विभाग, यू.टी. चंडीगढ़ तथा समाज के सभी हितधारक एकजुट होकर इन महत्वपूर्ण लक्ष्यों को प्राप्त करने में अवश्य सफल होंगे।
सहकारिता हमें यही संदेश देती है कि जब समाज साथ चलता है, तब विकास तेज़, संतुलित और सर्वसमावेशी बनता है।
अंत में, मैं पुनः इस संगोष्ठी के सफल आयोजन के लिए सहकार भारती, चंडीगढ़ तथा सहकारिता विभाग, यू.टी. चंडीगढ़ को हार्दिक बधाई देता हूँ। मुझे आशा है कि आज की चर्चा से प्राप्त सुझाव सहकारिता आंदोलन को नई दिशा प्रदान करेंगे तथा विकसित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।
आइए, हम सभी मिलकर सहकारिता के माध्यम से समृद्ध, सशक्त और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का संकल्प लें।
आप सभी को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
बहुत-बहुत धन्यवाद,
जय हिन्द!
जय भारत!