SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF KARGIL VIJAY DIVAS AT CHANDIGARH ON JULY 20, 2026.

‘कारगिल विजय दिवस’ समारोह के अवसर पर

राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 20.07.2026, सोमवारसमयः सुबह 10:30 बजेस्थानः चंडीगढ़

         

भारत माता की जय!

आज कारगिल विजय दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित इस गौरवपूर्ण अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित होकर मेरा हृदय गर्व, श्रद्धा और कृतज्ञता से भर उठा है। यह दिवस केवल एक सैन्य विजय की वर्षगांठ नहीं है। यह भारत के अदम्य साहस, राष्ट्रीय स्वाभिमान, सामूहिक संकल्प और हमारे वीर सैनिकों के सर्वोच्च बलिदान का पावन स्मृति-दिवस है।

आज से ठीक 27 वर्ष पूर्व, 26 जुलाई, 1999 को भारतीय सशस्त्र सेनाओं ने दुर्गम पहाड़ियों, बर्फीली चोटियों, प्रतिकूल मौसम और अत्यंत कठिन परिस्थितियों के बीच शत्रु को परास्त कर कारगिल की चोटियों पर पुनः तिरंगा फहराया था। उस ऐतिहासिक विजय की स्मृति में प्रत्येक वर्ष 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है।

इसलिए, आज भारत के आप जैसे विशिष्ट नायकों के बीच उपस्थित होना मेरे लिए बहुत सौभाग्य, सम्मान और गर्व की बात है। आप जैसे पुरुषों और महिलाओं के कारण ही हमारा देश सुरक्षित है और इसके नागरिक बिना किसी डर के खुली हवा में सांस ले सकते हैं और अपना रोज़मर्रा का काम कर सकते हैं। देश आप सभी का आभारी है और मैं विनम्रतापूर्वक आपको सलाम करता हूं।

देवियो और सज्जनो,

यदि हम कारगिल वियज दिवस की बात करें तो, यह बड़े ही राष्ट्रीय गौरव और संतोष की बात है कि हमारे सैनिकों के नेतृत्व, बहादुरी और अटल दृढ़ संकल्प के साथ-साथ पूरे देश की एकजुटता ने सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी भारत को एक यादगार जीत दिलाई।

जब दुश्मन ने धोखे से हमारी चोटियों (टाइगर हिल, तोलोलिंग) पर कब्ज़ा कर लिया था, तब ‘ऑपरेशन विजय’ के तहत हमारे जवानों ने माइनस डिग्री तापमान और सीधी चढ़ाई जैसी असंभव परिस्थितियों को पार करते हुए दुश्मन को नेस्तनाबूद किया। कैप्टन विक्रम बत्रा का वह उद्घोष ‘‘ये दिल मांगे मोर!’’ आज भी हर भारतीय युवा की रगों में जोश भर देता है।

कारगिल की विजय हमें बताती है कि जिस राष्ट्र के सैनिकों में हिमालय जैसा साहस और नागरिकों में समुद्र जैसी गहराई हो, उस राष्ट्र को कोई शक्ति पराजित नहीं कर सकती।

कारगिल युद्ध हमारे इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय है, जिसमें भारतीय सैनिकों ने दुनिया को दिखाया कि भारत शांति का पक्षधर अवश्य है, लेकिन उसकी शांति को उसकी कमजोरी समझने की भूल कोई न करे।

पाकिस्तान का इतिहास ही धोखे और छल-कपट का रहा है। जब भी भारत ने शांति और मित्रता का हाथ बढ़ाया है, उसने हमेशा हमारी पीठ में छुरा घोंपने का प्रयास किया है। दरअसल, पाकिस्तान की सेना और वहां के सत्ता-प्रतिष्ठान का वजूद ही ‘भारत-विरोध’ की नींव पर टिका है। वे भली-भांति जानते हैं कि भारतीय सेना के अदम्य साहस के सामने वे सीधे युद्ध में कभी टिक नहीं सकते, इसीलिए वे आतंकवाद और प्रोक्सी वॉर का कायरतापूर्ण सहारा लेते हैं। 

दोनों देशों के बीच निरंतर तनाव और नफरत पैदा करना उनकी कोई मजबूरी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है। इसी नफरत और अस्थिरता का डर दिखाकर वहां की सेना अपने ही देश की सत्ता और संसाधनों पर अपना अनुचित कब्ज़ा बनाए रखती है।

इतिहास साक्षी है कि पाकिस्तान ने जब-जब युद्ध या आतंकवाद के माध्यम से भारत की शांति, सुरक्षा और संप्रभुता को चुनौती दी, हमारी सेनाओं ने उसे निर्णायक उत्तर दिया। वर्ष 1947-48 में भारतीय सेना ने जम्मू-कश्मीर पर हुए धोखापूर्ण आक्रमण को विफल किया, 1965 में शत्रु को पीछे धकेलते हुए लाहौर की दहलीज तक पहुँची और 1971 में केवल 13 दिनों में लगभग 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों को आत्मसमर्पण के लिए विवश कर बांग्लादेश के उदय का मार्ग प्रशस्त किया। इन विजयों ने भारतीय सेनाओं के साहस, रणनीतिक कौशल और अद्भुत समन्वय को विश्व के सामने स्थापित किया।

साथियो,

समय के साथ पाकिस्तान ने प्रत्यक्ष युद्धों में पराजित होने के बाद सीमा पार आतंकवाद को भारत के विरुद्ध एक हथियार के रूप में प्रयोग करने का प्रयास किया। लेकिन नए भारत की नीति बिल्कुल स्पष्ट है, आतंकवाद और उसके संरक्षकों के प्रति कोई सहनशीलता नहीं होगी।

अप्रैल 2025 में पहलगाम में निर्दोष पर्यटकों पर किए गए बर्बर आतंकवादी हमले के बाद भारत ने केवल शोक व्यक्त करके चुप बैठना स्वीकार नहीं किया। 6 और 7 मई, 2025 की रात भारतीय सशस्त्र बलों ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के अंतर्गत पाकिस्तान तथा पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में स्थित आतंकवादी ढाँचे और प्रशिक्षण शिविरों पर अत्यंत सटीक, नियंत्रित और निर्णायक प्रहार किए। इस कार्रवाई में नौ आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाया गया, जिसमें 100 से अधिक आतंकवादी मारे गए। भारत की कार्रवाई पूरी तरह आतंकवादी ढाँचे पर केंद्रित, मापी-तुली और गैर-उत्तेजक थी तथा पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना नहीं बनाया गया।

देवियो और सज्ज्नो,

हम मूलतः एक शांतिप्रिय देश हैं। हमारी सभ्यता ने सदैव विश्व को “वसुधैव कुटुम्बकम्”, सह-अस्तित्व, संवाद और शांति का संदेश दिया है। भारत ने कभी किसी दूसरे देश की भूमि पर अधिकार करने अथवा युद्ध प्रारंभ करने की नीति नहीं अपनाई। लेकिन हम यह भी भली-भाँति जानते हैं कि अपनी मातृभूमि, नागरिकों और सीमाओं की रक्षा कैसे करनी है।

हम शांति चाहते हैं, लेकिन सम्मान और सामर्थ्य के साथ। हम संवाद में विश्वास रखते हैं, लेकिन आतंकवाद के सामने मौन रहने में नहीं। भारत की शांति और संप्रभुता से खिलवाड़ करने वाले किसी भी दुस्साहसी को मुंहतोड़ जवाब देने में हमारी थलसेना, वायुसेना और नौसेना पूर्णतः सक्षम हैं।

आज का भारत स्पष्ट शब्दों में कहता है, “हम किसी को छेड़ते नहीं हैं, लेकिन यदि कोई भारत को छेड़ेगा, तो उसे छोड़ा भी नहीं जाएगा।” और “भारत की सहनशीलता हमारी संस्कृति है, लेकिन राष्ट्र की सुरक्षा और सम्मान की रक्षा हमारा सर्वोच्च संकल्प है।” 

देवियो और सज्जनो,

मुझे इस बात का बहुत गर्व है कि आज मुझे परमवीर चक्र विजेता कैप्टन योगेंद्र सिंह यादव, अन्य वीरों, वीर नारियों और शहीदों के परिवारों को सम्मानित करने का अवसर मिला है। जिन लोगों ने खुद यह युद्ध लड़ा, आज उन्हीं के मुंह से साहस, बहादुरी और बलिदान की महान कहानियाँ सुनकर मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो गया है। 

अब मुझे और भी पक्का विश्वास हो गया है कि हमारा देश आप जैसे लोगों के हाथों में पूरी तरह सुरक्षित है। मैं बहुत भावुक हूँ और मेरे पास अपना आभार व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं हैं। देश को वीर नारियों और शहीदों के परिवारों पर गर्व है और यह पूरा देश पूरी मजबूती के साथ उनके पीछे खड़ा है।

मुझे ट्राईसिटी के विभिन्न स्कूलों और कॉलेजों के इतने सारे बच्चों, शिक्षकों और एनसीसी कैडेटों को यहाँ देखकर विशेष रूप से बहुत खुशी हो रही है। मुझे बताया गया है कि ‘महाराजा रणजीत सिंह आर्म्ड फोर्सेज प्रिपरेटरी इंस्टीट्यूट’ और ‘माई भागो आर्म्ड फोर्सेज प्रिपरेटरी इंस्टीट्यूट’ के कैडेट भी यहाँ मौजूद हैं। 

हमारी सेना में इतना बड़ा योगदान देने की पंजाब की इस शानदार विरासत पर मुझे बहुत गर्व है। भारत का प्रवेश द्वार होने के कारण, पंजाब ने भारत पर बुरी नज़र डालने वाले हर दुश्मन का सामना करने के लिए हमेशा सबसे आगे रहकर लड़ाई लड़ी है। अपनी मातृभूमि की ऐसी सच्ची लगन से सेवा करने की पंजाब की यह महान परंपरा इसी जोश के साथ आगे भी जारी रहनी चाहिए।

हम सभी जानते हैं कि पंजाब की वीर परंपरा भारत की सुरक्षा और सैन्य गौरव की आधारशिला रही है। इस धरती ने फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ और एयर चीफ मार्शल अर्जन सिंह जैसे महान सैन्य नेतृत्वकर्ता दिए, जिन्होंने निर्णायक समय में देश का मार्गदर्शन किया।

सूबेदार जोगिंदर सिंह ने 1962 के युद्ध में अंतिम सांस तक लड़ते हुए परमवीर चक्र अर्जित किया। नायब सूबेदार बाना सिंह ने 1987 में सियाचिन की सामरिक चौकी पर विजय प्राप्त कर असाधारण वीरता दिखाई। लेफ्टिनेंट जनरल हरबख्श सिंह ने 1965 के युद्ध में पश्चिमी कमान का प्रभावी नेतृत्व किया, जबकि ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी ने 1971 की लोंगेवाला लड़ाई में सीमित सैनिकों के साथ विशाल पाकिस्तानी सेना का सामना कर इतिहास रचा।

साथियो,

आज हम जिस स्वतंत्र वातावरण में जीवन जी रहे हैं, वह हमें सहज रूप से प्राप्त नहीं हुआ है। इसके पीछे सदियों का संघर्ष, असंख्य बलिदान और राष्ट्रभक्तों की तपस्या है।

मंगल पांडेय, रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, वीर कुंवर सिंह, लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल, महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, सरदार वल्लभभाई पटेल, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, उधम सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और हजारों स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित किया।

महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन को जन-जन का आंदोलन बनाया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने देशवासियों का आह्वान किया, “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।” शहीद भगत सिंह ने हमें सिखाया कि क्रांति का वास्तविक अर्थ समाज में अन्याय, भय और शोषण को समाप्त करना है।

सरदार पटेल ने रियासतों का एकीकरण करके भारत की राजनीतिक एकता को मजबूत किया। बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में निर्मित संविधान ने हमें न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का मार्ग दिखाया।

हमारी स्वतंत्रता केवल शासन-परिवर्तन नहीं थी। यह हमारे आत्मसम्मान, सभ्यता, संस्कृति और भविष्य को पुनः प्राप्त करने का संकल्प था। लेकिन स्वतंत्रता प्राप्त करना जितना कठिन था, उसकी रक्षा करना भी उतना ही चुनौतीपूर्ण रहा है। स्वतंत्रता के बाद हमारी सेनाओं ने हर संकट में राष्ट्र की सीमाओं और एकता की रक्षा की है।

इसलिए प्रत्येक नागरिक को स्मरण रखना चाहिए कि हम अपने घरों में चैन से इसलिए सोते हैं, क्योंकि हमारे सैनिक सीमाओं पर जागते हैं।

देवियो और सज्जनो,

आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के कुशल और दूरदर्शी नेतृत्व में, वर्ष 2014 से 2026 के बीच भारत के रक्षा क्षेत्र में एक अभूतपूर्व और युगांतरकारी परिवर्तन आया है। यह वह कालखंड रहा है, जिसमें हमारे राष्ट्र ने अपनी सैन्य क्षमता, सामर्थ्य और वैश्विक साख को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। यह सब ऐतिहासिक रक्षा सुधारों, अभूतपूर्व निवेश और ‘आत्मनिर्भरता’ की दिशा में किए गए एक दृढ़ संकल्प के कारण ही संभव हो सका है।

अगर हम आंकड़ों की बात करें तो, जहाँ 2013-14 में हमारा रक्षा बजट 2.53 लाख करोड़ रुपये था, वहीं 2026-27 में यह बढ़कर 7.85 लाख करोड़ रुपये के ऐतिहासिक स्तर पर पहुँच गया है। इतना ही नहीं, भारत में होने वाला स्वदेशी रक्षा उत्पादन भी 2014-15 के 46,429 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 1.78 लाख करोड़ रुपये हो गया है। 

आज हम केवल अपनी सेना के लिए हथियार नहीं बना रहे हैं, बल्कि रक्षा निर्यात के क्षेत्र में भी हमने एक बहुत बड़ी छलांग लगाई है। 2013-14 में हमारा रक्षा निर्यात मात्र 686 करोड़ रुपये था, जो 2025-26 में 38,424 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया है। आज मुझे यह बताते हुए अत्यंत गर्व होता है कि दुनिया के 80 से अधिक देशों में ‘मेड-इन-इंडिया’ रक्षा उपकरण निर्यात किए जा रहे हैं।

रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020, स्वदेशी उपकरणों की ‘पॉजिटिव इंडिजनाइजेशन लिस्ट’ और रक्षा उत्कृष्टता के लिए नवाचार (Innovations for Defence Excellence (iDEX) जैसे दूरदर्शी और कड़े सुधारों ने देश में घरेलू विनिर्माण, नवाचार और निजी क्षेत्र की भागीदारी को जबरदस्त मजबूती प्रदान की है। स्वदेशीकरण और आधुनिकीकरण की इसी ताकत के बल पर, आज भारत की ‘रक्षा कूटनीति’ भी विश्व पटल पर सफलता की नई ऊंचाइयों को छू रही है।

साथियो,

आज कारगिल विजय दिवस पर हम केवल पुष्पांजलि अर्पित करके अपने कर्तव्य की पूर्ति नहीं कर सकते। हमें प्रतिज्ञा करनी होगी कि हम भारत की एकता और अखंडता की रक्षा करेंगे। हम सेना और सैनिकों का सम्मान करेंगे। हम शहीद परिवारों के साथ खड़े रहेंगे। हम राष्ट्रीय संपत्ति की रक्षा करेंगे। हम देशविरोधी दुष्प्रचार से सावधान रहेंगे। हम अपने कर्तव्यों को अधिकारों जितना ही महत्व देंगे। हम भारत को आत्मनिर्भर, सुरक्षित और विकसित राष्ट्र बनाने में योगदान देंगे।

“शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,

वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा।”

लेकिन हमारी श्रद्धांजलि केवल मेलों और समारोहों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उसका प्रतिबिंब हमारे चरित्र, कर्तव्य और राष्ट्र के प्रति समर्पण में दिखाई देना चाहिए।

साथियो,

कारगिल की चोटियों पर विजय पाने वाले सैनिक आज भी हमसे कह रहे हैं, कठिनाइयों से मत डरो। कर्तव्य से पीछे मत हटो। राष्ट्रहित से समझौता मत करो। तिरंगे का सम्मान कभी कम मत होने दो।

हमारे वीर सैनिकों ने अपने आज का बलिदान इसलिए दिया, ताकि हमारा कल सुरक्षित रह सके। उनके बलिदान का ऋण हम कभी पूर्ण रूप से नहीं चुका सकते। लेकिन हम ऐसा भारत बनाकर उनके सपनों को अवश्य साकार कर सकते हैं, जो शक्तिशाली भी हो और शांतिप्रिय भी; आधुनिक भी हो और अपनी संस्कृति से जुड़ा भी; समृद्ध भी हो और संवेदनशील भी; आत्मनिर्भर भी हो और विश्व-कल्याण के प्रति समर्पित भी।

आइए, आज कारगिल विजय दिवस पर हम सभी संकल्प लें, राष्ट्र सर्वोपरि था, राष्ट्र सर्वोपरि है और राष्ट्र सदैव सर्वोपरि रहेगा। हम संकल्प लें कि भारत की आन, बान और शान के लिए सदैव एकजुट रहेंगे। हम अपने सैनिकों का सम्मान करेंगे। हम अपने शहीदों को कभी नहीं भूलेंगे। हम अपने तिरंगे को कभी झुकने नहीं देंगे। 

मैं अपनी वाणी को इन पंक्तियों के साथ विराम देना चाहूँगा,

“जिनके सिंहनाद से सहमी धरती रही अभी तक डोल,

कलम, आज उनकी जय बोल।

जो अगणित लघु दीप हमारे, तूफानों में एक किनारे,

जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन, माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल,

कलम, आज उनकी जय बोल।”

कारगिल के अमर शहीदों को शत-शत नमन!

भारत की थल, वायु और नौसेना के सभी वीर जवानों को मेरा सलाम!

शहीद परिवारों और वीर नारियों के प्रति राष्ट्र की ओर से कृतज्ञता!

बहुत-बहुत धन्यवाद,

जय हिन्द!

जय भारत!