SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF DISCUSSION ORGANISED ON THE BOOK ‘SHATAYU SANGH AND WOMEN’S PARTICIPATION’ AT CHANDIGARH ON JULY 22, 2026.
- by Admin
- 2026-07-22 21:50
‘शतायु संघ और महिला सहभागिता’ पुस्तक पर आयोजित चर्चा पर
राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन
दिनांकः 22.07.2026, बुधवार समयः दोपहर 3:40 बजे स्थानः चंडीगढ़
नमस्कार!
आज राष्ट्रीय तकनीकी शिक्षक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान (एनआईटीटीटीआर), चंडीगढ़ के इस प्रतिष्ठित परिसर में ‘शतायु संघ और महिला सहभागिता’ पुस्तक पर हो रही चर्चा से जुड़े इस अत्यंत महत्वपूर्ण आयोजन में उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है।
सबसे पहले मैं इस महत्वपूर्ण पुस्तक की लेखिका डॉ. शोभा विजेंद्र जी को हार्दिक बधाई देता हूँ कि उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों, बचपन से लेकर आज तक संघ के साथ अपने जुड़ाव, और वर्तमान समाज में महिलाओं की भूमिका को इतनी आत्मीयता और स्पष्टता के साथ शब्दों में पिरोया है।
मुझे यह जानकर प्रसन्नता है कि इस आयोजन से सम्पूर्णा जैसी संस्था भी जुड़ी है, जो वर्ष 1993 से दिल्ली में महिला एवं बाल सशक्तिकरण, जल संरक्षण और स्वच्छता जैसे विषयों पर निरंतर कार्य कर रही है। ऐसी संस्थाओं का यह सतत प्रयास ही है कि विचार केवल पुस्तकों और मंचों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ज़मीनी स्तर पर परिवर्तन का रूप लेता है।
मुझे बताया गया है कि इस पुस्तक का लोकार्पण इसी वर्ष 18 मार्च को दिल्ली के NDMC कन्वेंशन सेंटर में हुआ था, और उसके पश्चात मुंबई में, संघ के केंद्रीय कार्यालय में, और मैसूर में भी इस पर सारगर्भित चर्चाएं हो चुकी हैं। आज चंडीगढ़ में हो रही यह चर्चा इस श्रृंखला की पांचवीं कड़ी है।
गर्व का विषय है कि यह पुस्तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी यात्रा में नारी की महत्वपूर्ण और बहुआयामी भूमिका को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। इसमें बताया गया है कि राष्ट्र-सेवा, सामाजिक जागरण, संगठन निर्माण और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण में मातृशक्ति का योगदान सदैव महत्वपूर्ण रहा है।
तीन भागों में विभाजित यह कृति लेखिका के अनुभवों, विभिन्न सरसंघचालकों के विचारों तथा देश की प्रतिष्ठित महिलाओं के लेखों के माध्यम से यह संदेश देती है कि राष्ट्र निर्माण में महिला सहभागिता अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यह पुस्तक भारतीय संस्कृति में नारी को शक्ति, संस्कार और सृजन का आधार मानते हुए मातृशक्ति के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करती है तथा राष्ट्र और समाज के निर्माण में उसकी अमूल्य भूमिका को रेखांकित करती है।
देवियो और सज्जनो,
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने वर्ष 2025 में अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरे किए हैं और वर्तमान समय में उसका शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है। सौ वर्षों की यह यात्रा केवल एक संगठन के विस्तार की कहानी नहीं, बल्कि लाखों निःस्वार्थ कार्यकर्ताओं के त्याग और समाज सेवा के संकल्प की कहानी है। और इस यात्रा में महिलाओं की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण रही है जितनी पुरुषों की। यह पुस्तक उसी सहभागिता को सामने लाने का एक प्रयास है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना विजयादशमी के पावन अवसर पर 27 सितंबर 1925 को नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने की थी। उस समय उनके साथ बहुत कम संख्या में स्वयंसेवक थे, लेकिन उनके सामने लक्ष्य अत्यंत व्यापक था, ऐसे अनुशासित, चरित्रवान और राष्ट्रनिष्ठ नागरिकों का निर्माण, जो समाज को संगठित कर राष्ट्र को सशक्त बनाने में अपना योगदान दें।
डॉ. हेडगेवार जी का विश्वास था कि राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल शासन-व्यवस्था, संसाधनों अथवा संस्थाओं में नहीं होती; उसकी सबसे बड़ी शक्ति संगठित, सजग और संस्कारवान समाज में होती है।
उन्होंने संगठन की शुरुआत बड़े भवनों, विशाल संसाधनों या प्रचार के माध्यम से नहीं की। उन्होंने व्यक्ति-निर्माण से शुरुआत की। उनका मानना था कि जब व्यक्ति का चरित्र मजबूत होगा, तभी परिवार मजबूत होगा; परिवार मजबूत होगा तो समाज संगठित होगा और संगठित समाज ही शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण कर सकता है।
एक छोटे से प्रयास से आरंभ हुई यह यात्रा आज एक व्यापक सामाजिक आंदोलन का स्वरूप प्राप्त कर चुकी है। संघ की कार्यपद्धति का मूल आधार दैनिक शाखा, व्यक्तिगत संपर्क, सामूहिक अनुशासन, सेवा और सामाजिक समरसता रहा है।
मुझे स्वयं एक स्वयंसेवक के रूप में बचपन से संघ की शाखा में जाने और वहाँ से सीखने का सौभाग्य मिला है। संघ ने हमें कभी पद नहीं मांगना सिखाया, बल्कि निरंतर राष्ट्र के लिए काम करना सिखाया। अनुशासन, सेवा और समर्पण, यही वे तीन मूल्य हैं जो एक स्वयंसेवक के जीवन को गढ़ते हैं, चाहे वह महिला हो या पुरुष।
आज जब मैं यह पुस्तक चर्चा का हिस्सा बन रहा हूं, तो मुझे प्रसन्नता है कि इस शताब्दी वर्ष में समाज के सामने यह संदेश जा रहा है कि सशक्त राष्ट्र के निर्माण में महिलाओं की सहभागिता कोई नई अवधारणा नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना का सदा से अभिन्न अंग रही है।
देवियो और सज्जनो,
किसी भी राष्ट्र की प्रगति का सही आकलन इस बात से होता है कि वहां महिलाओं को कितना सम्मान, कितने अवसर और निर्णय-प्रक्रिया में कितनी भागीदारी प्राप्त है।
भारतीय संस्कृति में नारी को सदैव शक्ति, ज्ञान, समृद्धि और करुणा का स्वरूप माना गया है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है, ‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।’’ अर्थात जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहीं समृद्धि और देवत्व का वास होता है।
किन्तु नारी का सम्मान केवल शब्दों तक सीमित नहीं होना चाहिए। वास्तविक सम्मान तभी है, जब महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, नेतृत्व, विज्ञान, तकनीक, प्रशासन, खेल तथा सामाजिक निर्णयों में समान अवसर प्राप्त हों। महिला सहभागिता का अर्थ केवल संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि विचार-निर्माण, निर्णय लेने और नेतृत्व में उनकी सार्थक भागीदारी सुनिश्चित करना है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरित संगठनों ने भी महिलाओं की सक्रिय भूमिका पर विशेष बल दिया है। वर्ष 1936 में लक्ष्मीबाई ‘मौसीजी’ केलकर द्वारा स्थापित राष्ट्र सेविका समिति ने महिलाओं में नेतृत्व, आत्मविश्वास, राष्ट्रभक्ति और समाजसेवा की भावना को सुदृढ़ करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उनका जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि सच्चा नेतृत्व समस्याओं की चर्चा नहीं, बल्कि समाधान की पहल करता है।
साथियो,
भारतीय इतिहास महिलाओं के साहस, ज्ञान और नेतृत्व के असंख्य उदाहरणों से भरा हुआ है। वैदिक काल में गार्गी और मैत्रेयी ने ज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में अपनी असाधारण विद्वता का परिचय दिया। राजमाता अहिल्याबाई होल्कर ने सुशासन, न्याय, धर्म और जनकल्याण का आदर्श प्रस्तुत किया। रानी दुर्गावती और रानी लक्ष्मीबाई ने मातृभूमि की रक्षा के लिए अदम्य साहस दिखाया।
सावित्रीबाई फुले ने सामाजिक विरोध और अपमान का सामना करते हुए बालिकाओं की शिक्षा का मार्ग प्रशस्त किया। भगिनी निवेदिता ने भारत को अपनी कर्मभूमि बनाकर महिला शिक्षा और राष्ट्र-जागरण के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया।
स्वतंत्रता संग्राम में कस्तूरबा गांधी, सरोजिनी नायडू, अरुणा आसफ अली, दुर्गा भाभी, कैप्टन लक्ष्मी सहगल और अनेक वीरांगनाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
और जब हम यह बात पंजाब की धरती पर, चंडीगढ़ में कह रहे हैं, तो यह और भी सार्थक हो जाता है। यह वही भूमि है जिसने माता गुजरी जी का अद्वितीय बलिदान और साहस देखा, जिसने माई भागो जी के रणकौशल और नेतृत्व को देखा। पंजाब की मिट्टी में वीरता, त्याग और सेवा की परंपरा महिलाओं के माध्यम से सदियों से प्रवाहित होती रही है।
आज आधुनिक भारत में महिलाएं विज्ञान, अंतरिक्ष, रक्षा, प्रशासन, न्यायपालिका, उद्यमिता और खेल के क्षेत्र में नई ऊंचाइयां प्राप्त कर रही हैं। आज हमारी बेटियां लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं, सीमाओं की रक्षा कर रही हैं, अंतरिक्ष अभियानों का नेतृत्व कर रही हैं और विश्व मंच पर तिरंगे का गौरव बढ़ा रही हैं।
फिर भी हमें स्वीकार करना होगा कि आज भी अनेक महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक अवसरों और निर्णय-प्रक्रिया में समान भागीदारी के लिए चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए महिला सशक्तीकरण को केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि सामाजिक संस्कार और राष्ट्रीय दायित्व के रूप में अपनाना होगा।
परिवारों को बेटियों को भी समान अवसर देने होंगे, शिक्षा संस्थानों को उनमें नेतृत्व और आत्मविश्वास विकसित करना होगा तथा समाज को महिलाओं के प्रति सम्मानजनक और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना होगा।
हमें सदैव स्मरण रखना चाहिए कि महिला की प्रगति किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि पूरे परिवार, समाज और राष्ट्र की प्रगति है। प्रकृति ने स्त्री और पुरुष को प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि एक-दूसरे का पूरक बनाया है। देश की आधी आबादी की पूर्ण भागीदारी के बिना विकसित और समृद्ध भारत का निर्माण संभव नहीं है।
साथियो,
जब भी राष्ट्र निर्माण में मातृशक्ति की भूमिका की बात आती है, तो मुझे राजमाता जीजाबाई का स्मरण हो आता है। यह वह दौर था जब समाज में निराशा का अंधकार छाया हुआ था, मंदिरों को तोड़ा जा रहा था और हमारी संस्कृति संकट में थी। ऐसे समय में जीजाबाई ने केवल आंसू नहीं बहाए, बल्कि उन्होंने अपने पुत्र शिवाजी के चरित्र का वह निर्माण किया, जिसने आगे चलकर ‘हिंदवी स्वराज्य’ की स्थापना की।
जीजाबाई ने बचपन से ही शिवाजी महाराज को रामायण और महाभारत की शौर्य गाथाएं सुनाईं। उन्होंने शिवाजी को यह सिखाया कि अन्याय सहना सबसे बड़ा पाप है और धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाना सबसे बड़ा पुण्य। एक माता के संस्कारों ने एक सामान्य बालक को छत्रपति बना दिया।
यह है ‘महिला सहभागिता’ का सबसे ज्वलंत और महान उदाहरण! आज संघ भी इसी ‘संस्कार क्षम’ मातृशक्ति का आह्वाहन करता है, जो अपनी गोद में पलने वाली आने वाली पीढ़ी को शिवाजी और महाराणा प्रताप जैसे संस्कार दे सके। डॉ. शोभा विजेन्द्र द्वारा लिखी गई यह पुस्तक इन सभी उदाहरणों को समाहित करके संघ में महिलाओं की सहभागिता को उजागर कर रही है। पुस्तक की शुरुआत में लिखी यह 4 पंक्तियाँ ‘‘ये पृष्ठ उस शक्ति को समर्पित हैं, जो राष्ट्र निर्माण करती है और माँ, मातृभूमि और जगन्माता बनकर पूरी वसुधा का कल्याण करती है’’ गागर में सागर भरने के समान हैं।
मैं यहां एक प्रेरक प्रसंग साझा करना चाहूँगा। स्वामी विवेकानंद से एक बार भारत के उत्थान के संबंध में प्रश्न किया गया। उनका स्पष्ट मत था कि भारत की उन्नति तब तक संभव नहीं है, जब तक महिलाओं की स्थिति में सुधार नहीं होता। वे मानते थे कि किसी पक्षी के लिए केवल एक पंख के सहारे उड़ना संभव नहीं है।
यह उदाहरण आज भी उतना ही प्रासंगिक है। पुरुष और महिला राष्ट्ररूपी पक्षी के दो पंख हैं। दोनों को समान शक्ति, सम्मान और समान अवसर मिलने पर ही राष्ट्र विकास के आकाश में ऊंची उड़ान भर सकता है।
साथियो,
आज महिला सहभागिता को केवल पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। आज की आवश्यकता है कि ए.आई., डिजिटल तकनीक, स्टार्टअप और रक्षा उत्पादन जैसे आधुनिक क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़े। आर्थिक आत्मनिर्भरता सशक्तिकरण की पहली सीढ़ी है; इसलिए स्वयं सहायता समूहों और कौशल विकास के माध्यम से हमें गांव की बेटी से लेकर शहर की युवती तक, सभी को उद्यमिता से जोड़ना होगा। इसके साथ ही, महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केवल कानून ही नहीं, बल्कि परिवार से मिलने वाले ‘संस्कारों’ की भी आवश्यकता है। बेटियों को आत्मरक्षा और बेटों को महिलाओं का सम्मान करना सिखाना अनिवार्य है।
साम्यवादी विचारधारा से प्रेरित वर्गों द्वारा समय-समय पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में महिलाओं की भूमिका को लेकर अनेक भ्रांतियाँ और प्रश्न खड़े किए जाते रहे हैं।
डॉ. शोभा विजेन्द्र द्वारा लिखित यह पुस्तक उन सभी भ्रमों का तथ्यपरक, ऐतिहासिक और सशक्त उत्तर प्रस्तुत करती है। यह कृति स्पष्ट करती है कि राष्ट्र निर्माण की इस यात्रा में महिलाओं की सहभागिता सदैव महत्वपूर्ण, सक्रिय और प्रेरणादायी रही है।
देवियो और सज्जनो,
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज अपनी सौ वर्ष की यात्रा पूरी कर रहा है। संघ ने अपने शताब्दी वर्ष में ‘पंच परिवर्तन’ (सामाजिक समरसता, परिवार प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी और नागरिक कर्तव्य) का जो संकल्प लिया है, वह महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के बिना अधूरा है।
क्योंकि परिवार में संस्कार, पर्यावरण के प्रति चेतना और स्वदेशी का भाव एक माता ही सबसे बेहतर ढंग से विकसित कर सकती है। अनुभव बताता है कि जब महिला पंचायत से लेकर नीति-निर्माण तक का नेतृत्व करती है, तो शासन अधिक संवेदनशील और उत्तरदायी बनता है।
मैं इस मंच से युवाओं से कहना चाहता हूँ कि सामाजिक परिवर्तन केवल सरकारों का काम नहीं है। आप अपने परिवार और समाज में महिलाओं के प्रति सम्मानपूर्ण व्यवहार से शुरुआत कर सकते हैं।
आप किसी बालिका की शिक्षा में सहयोग कर सकते हैं। आप अपने कार्यस्थल पर समान अवसर सुनिश्चित कर सकते हैं। आप महिलाओं के प्रति अपमानजनक भाषा, डिजिटल दुर्व्यवहार और सामाजिक भेदभाव का विरोध कर सकते हैं।
मातृशक्ति से भी मेरा आग्रह है कि अपनी क्षमता को कभी कम न आंकें। आपका धैर्य और आपकी करुणा आपकी सबसे बड़ी शक्ति है। आप परिवार संभाल सकती हैं, तो संस्था भी संभाल सकती हैं। आप बच्चों का भविष्य बना सकती हैं, तो राष्ट्र का भविष्य भी बना सकती हैं।
अपने सपनों को केवल इसलिए मत छोड़िए कि परिस्थितियां कठिन हैं। कठिन परिस्थितियां ही महान व्यक्तित्वों को जन्म देती हैं। जो अपने संकल्प पर अडिग रहते हैं, उनके लिए बाधाएं मार्ग का अंत नहीं, सफलता की सीढ़ियां बन जाती हैं।
आज भारत ‘विकसित भारत-2047’ के लक्ष्य की ओर अग्रसर है। यह संकल्प तभी सिद्ध होगा जब हम ‘महिला विकास’ से आगे बढ़कर ‘महिला-नेतृत्व वाले विकास’ को अपनाएंगे। हमें अपनी प्राचीन सांस्कृतिक चेतना और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि का समन्वय करना होगा।
मैं इस अवसर पर सभी उपस्थित बहनों और बेटियों से आग्रह करूंगा कि वे इस पुस्तक को केवल पढ़ें ही नहीं, बल्कि इसमें वर्णित अनुभवों से प्रेरणा लें और अपने परिवार, अपने समाज और अपने राष्ट्र के प्रति अपनी भूमिका को और सशक्त रूप से निभाएं। और मैं समाज के हर वर्ग से भी अपील करूंगा कि महिलाओं की सहभागिता को केवल एक नारे के रूप में नहीं, बल्कि नीति और व्यवहार दोनों में स्थान दें।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि डॉ. शोभा विजेंद्र जी की यह पुस्तक, ‘शतायु संघ और महिला सहभागिता’, केवल पुस्तकालयों तक सीमित न रहकर समाज में एक गंभीर और सार्थक संवाद का आधार बनेगी।
एक बार पुनः डॉ. शोभा विजेंद्र जी को इस सारगर्भित पुस्तक के लिए बधाई। श्री प्रदीप जोशी जी की उपस्थिति और मार्गदर्शन के लिए आभार, और श्री विजेंद्र गुप्ता जी का भी विशेष आभार, जो इस पुस्तक के लोकार्पण के समय से ही इससे जुड़े रहे हैं और आज पुनः इस चर्चा में हमारे साथ हैं। सप्त सिंधु कल्चरल हेरिटेज फोरम और डॉ. वरिंदर गर्ग जी को इस सार्थक आयोजन के लिए धन्यवाद।
अंत में, मैं बस इतना ही कहूँगा, जब नारी शिक्षित होती है, तो परिवार संस्कारित होता है। जब नारी आत्मनिर्भर होती है, तो समाज सशक्त होता है। और जब नारी राष्ट्र-निर्माण का नेतृत्व करती है, तो देश का भविष्य उज्ज्वल होता है।
आइए, हम एक ऐसे सशक्त राष्ट्र का निर्माण करें जहाँ किसी बेटी के सपनों की सीमा उसकी परिस्थितियां तय न करें, बल्कि मातृशक्ति देश के विकास की सक्रिय नेतृत्वकर्ता हो।
इस चर्चा की सफलता के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
बहुत-बहुत धन्यवाद,
जय हिन्द!
जय भारत!