SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF VAN MAHOTSAV CULTURAL EVENING AT CHANDIGARH ON 10.07.2026.

वन महोत्सव 2026 के अन्तर्गत आयोजित ‘सांस्कृतिक संध्या’ पर

राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन 

दिनांकः 10.07.2026,  शुक्रवारसमयः शाम 6:00 बजेस्थानः चंडीगढ़

         

आप सभी को सायंकालीन वंदन!

आज वन महोत्सव-2026 के उपलक्ष्य में आयोजित इस सांस्कृतिक संध्या में आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। मैं वन एवं वन्यजीव विभाग, यू.टी. चण्डीगढ़ तथा इस आयोजन से जुड़े सभी विभागों और संस्थाओं को हार्दिक बधाई देता हूँ, जिन्होंने पर्यावरण संरक्षण, जनभागीदारी और हमारी सांस्कृतिक विरासत को एक सुंदर सूत्र में पिरोते हुए इस प्रेरणादायी कार्यक्रम का आयोजन किया है।

प्रकृति और संस्कृति, ये दोनों भारतीय जीवन-दर्शन के ऐसे दो स्तंभ हैं, जो एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि वन हमारी सांसों को जीवन देते हैं, तो संस्कृति हमारी आत्मा को दिशा देती है। यदि वृक्ष धरती को हरियाली प्रदान करते हैं, तो हमारी संस्कृति समाज को संवेदनशीलता, संतुलन और संस्कार प्रदान करती है।

हमारी संस्कृति, लोकगीत, लोकनृत्य और परम्पराएँ सदियों से प्रकृति, वन, नदियों और वन्यजीवन का गुणगान करती रही हैं। संस्कृति समाज को जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम है और जब संस्कृति के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश जुड़ता है, तो उसका प्रभाव और भी व्यापक हो जाता है। 

इसलिए आज की यह सांस्कृतिक संध्या केवल मनोरंजन का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह हमारी उस प्राचीन सभ्यता का उत्सव है, जिसने हजारों वर्षों से प्रकृति और संस्कृति के बीच अद्भुत सामंजस्य स्थापित किया है।

मुझे पूर्ण विश्वास है कि आज प्रस्तुत लोकनृत्यों एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने उपस्थित सभी दर्शकों के मन में प्रकृति के प्रति प्रेम, संवेदनशीलता तथा उसके संरक्षण के प्रति नई चेतना का संचार किया है। मैं सभी कलाकारों और प्रतिभागियों को हार्दिक बधाई देता हूँ।

 

देवियो और सज्जनो,

हमारी संस्कृति ने प्रकृति को कभी संसाधन नहीं, बल्कि संबंध माना है। भारतीय परंपरा में तो धरती को ‘भूमाता’, नदियों को ‘माता’, पर्वतों को ‘देव’, वृक्षों को ‘वृक्ष देवता’ और पशु-पक्षियों को परिवार का सदस्य माना गया है। यही कारण है कि हमारे यहाँ प्रकृति के संरक्षण को केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि संस्कृति और कर्तव्य का विषय माना गया है।

ऋग्वेद का यह मंत्र आज भी हमें यही संदेश देता है, ‘‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।’’ अर्थात् “यह पृथ्वी हमारी माता है और हम इसके पुत्र हैं।

जब हम पृथ्वी को माता मानते हैं, तब उसका दोहन नहीं, बल्कि संरक्षण हमारा स्वाभाविक कर्तव्य बन जाता है।

इसलिए, मेरा मानना है कि वन महोत्सव केवल वृक्षारोपण का अभियान नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी संवेदनशीलता और भावी पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी का राष्ट्रीय संकल्प है। वृक्ष हमारे जीवन का आधार हैं। वे हमें स्वच्छ वायु, शुद्ध जल, जैव विविधता, संतुलित जलवायु तथा स्वस्थ पर्यावरण प्रदान करते हैं। इसलिए प्रत्येक पौधा केवल एक पौधा नहीं, बल्कि आने वाले कल के सुरक्षित और समृद्ध भविष्य का प्रतीक है।

साथियो,

भारत की सभ्यता विश्व की उन विरल सभ्यताओं में है, जहाँ पर्यावरण संरक्षण हमारी जीवनशैली का अभिन्न अंग रहा है। पीपल, बरगद, नीम, तुलसी, बेल, आंवला, अशोक जैसे वृक्ष केवल वनस्पतियाँ नहीं रहे, बल्कि हमारी आस्था, आयुर्वेद, स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन के अभिन्न अंग रहे हैं।

हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले ही यह समझ लिया था कि यदि वृक्ष सुरक्षित रहेंगे, तभी जल सुरक्षित रहेगा; यदि जल सुरक्षित रहेगा, तभी जीवन सुरक्षित रहेगा। इसीलिए उन्होंने पंचमहाभूत, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के संतुलन को जीवन का आधार माना।

इसी प्रकार, मत्स्य पुराण में वृक्षों की महत्ता को कितने सुंदर और वैज्ञानिक शब्दों में समझाया गया है, 

‘‘दशकूपसमा वापी, दशवापीसमो हृदः।

दशहृदसमः पुत्रो, दशपुत्रसमो द्रुमः।।’’

अर्थात, दस कुँए के बराबर होती है एक बावड़ी, दस बावड़ी के बराबर एक सरोवर, दस सरोवर के समान एक पुत्र और दस पुत्रों के समान एक वृक्ष का महत्त्व होता है।

जब हमारी संस्कृति में एक पेड़ को दस पुत्रों के समान माना गया है, तो उसे काटना या उसे सूखने देना हमारी सबसे बड़ी नैतिक हार है।

प्राचीन भारत की पंचवटी परंपरा केवल धार्मिक व्यवस्था नहीं थी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का वैज्ञानिक मॉडल थी। आज पूरी दुनिया जिस सस्टेनेबल डेवलपमेंट की बात कर रही है, भारत हजारों वर्ष पहले उसे अपने जीवन में उतार चुका था।

देवियो एवं सज्जनो,

मुझे यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता है कि चण्डीगढ़ पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में देश के अग्रणी शहरों में अपनी विशिष्ट पहचान बना रहा है। गत वर्ष वन महोत्सव 2025 के शुभारम्भ के अवसर पर चण्डीगढ़ ने एक ही दिन में 318 स्थानों पर 1 लाख 17 हजार 836 पौधे लगाकर एक ऐतिहासिक उपलब्धि प्राप्त की थी। इतना ही नहीं, वर्ष 2025-26 में 5 लाख 76 हजार 221 पौधों के लक्ष्य के विरुद्ध 6 लाख 64 हजार 133 पौधों का सफलतापूर्वक रोपण किया गया। यह उपलब्धि चण्डीगढ़ प्रशासन, सभी हरितकरण एजेंसियों, शैक्षणिक संस्थानों, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों, स्वयंसेवी संगठनों तथा जागरूक नागरिकों की सामूहिक प्रतिबद्धता का उत्कृष्ट उदाहरण है।

इसी उत्साह और संकल्प के साथ इस वर्ष वन महोत्सव 2026 के अंतर्गत 4 लाख 10 हजार 725 पौधों के रोपण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि सभी विभागों एवं नागरिकों के सक्रिय सहयोग से यह लक्ष्य भी सफलतापूर्वक प्राप्त किया जाएगा।

देवियो एवं सज्जनो,

पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में हमारे सामूहिक प्रयासों के सुखद परिणाम अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। वर्ष 2025 के दौरान चण्डीगढ़ की वायु गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है। अधिकांश समय वायु गुणवत्ता सूचकांक ‘संतोषजनक’ श्रेणी में रहा तथा गंभीर प्रदूषण की घटनाओं में भी उल्लेखनीय कमी आई है।

यह हमारे लिए गर्व का विषय है कि स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2025 में दस लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहरों की श्रेणी में चण्डीगढ़ ने स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2024 में 27वें स्थान से छलांग लगाकर 8वाँ स्थान प्राप्त किया है। यह उपलब्धि सभी विभागों, संस्थानों और नागरिकों के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है तथा हमें भविष्य में और बेहतर कार्य करने की प्रेरणा देती है।

देवियो और सज्जनो,

आज सुबह मुझे डड्डू माजरा में वन महोत्सव का शुभारंभ करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। डड्डू माजरा आज पर्यावरणीय परिवर्तन और पुनर्जीवन का प्रेरणादायक प्रतीक बन चुका है। एक समय यह स्थान वर्षों से जमा कचरे के कारण पर्यावरणीय चुनौती का केन्द्र था, किन्तु आज वही स्थान हरियाली और पर्यावरण संरक्षण की नई पहचान बन रहा है। इस परिवर्तन के लिए चण्डीगढ़ नगर निगम तथा वन एवं वन्यजीव विभाग द्वारा किए गए सतत एवं समन्वित प्रयास अत्यंत सराहनीय हैं। 

यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता हुई कि आज वन महोत्सव के पहले दिन पर पूरे चण्डीगढ़ में 1 लाख 25 हजार से अधिक पौधों का रोपण किया गया है। यह उपलब्धि विभिन्न विभागों के उत्कृष्ट समन्वय, सामूहिक उत्तरदायित्व और पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनकी साझा प्रतिबद्धता का प्रमाण है। 

लेकिन हमें यह याद रखना होगा कि पौधा लगाना केवल प्रथम चरण है। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है उसकी देखभाल, संरक्षण और उसे वृक्ष बनने तक पोषित करना। 

यदि प्रत्येक पौधे के जीवित रहने और विकसित होने को सुनिश्चित किया जाए, तभी वन महोत्सव का वास्तविक उद्देश्य पूर्ण होगा। मैं सभी विभागों, संस्थानों और नागरिकों से आग्रह करता हूँ कि वे लगाए गए प्रत्येक पौधे को अपनी जिम्मेदारी समझकर उसकी नियमित देखभाल करें।

मुझे यह जानकर भी प्रसन्नता है कि वन एवं वन्यजीव विभाग द्वारा आज पौधों के वितरण हेतु तीन विशेष वाहनों को जनसेवा के लिए समर्पित किया गया है, जो चण्डीगढ़ के विभिन्न सेक्टरों एवं आवासीय क्षेत्रों में जाकर नागरिकों को मामूली मूल्य पर पौधे उपलब्ध कराएंगे। 

वन विभाग की यह नई पहल आम लोगों की भागीदारी को और अधिक सशक्त बनाएगी तथा प्रत्येक परिवार को हरियाली के इस अभियान से जोड़ने में सहायक सिद्ध होगी। मुझे विश्वास है कि यह प्रयास ‘जन-जन का वृक्ष, जन-जन का दायित्व’ की भावना को और अधिक मज़बूत करेगा।

मैं विशेष रूप से युवाओं और विद्यालयों के इको क्लबों से कहना चाहूँगा कि वे पर्यावरण संरक्षण के इस अभियान के वास्तविक ब्रांड एम्बेसडर बनें। यदि प्रत्येक विद्यार्थी अपने जीवन में कम-से-कम एक पौधे को वृक्ष बनने तक संरक्षित करने का संकल्प ले, तो आने वाले वर्षों में हमारा देश और अधिक हरित एवं समृद्ध बनेगा। आज का लगाया गया एक पौधा आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ वायु, शुद्ध जल और स्वस्थ जीवन का आधार बनेगा।

देवियो और सज्जनो,

आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, अत्यधिक तापमान, अनियमित वर्षा, जंगलों की आग, जल संकट, जैव विविधता के क्षरण तथा प्रदूषण जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार पिछले कुछ वर्ष मानव इतिहास के सबसे गर्म वर्ष रहे हैं।

विश्व में प्रतिवर्ष लगभग 15 अरब वृक्ष नष्ट हो जाते हैं। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। अनेक जीव-जंतु विलुप्ति के कगार पर हैं। यह केवल पर्यावरण का संकट नहीं है, बल्कि मानव सभ्यता के भविष्य का भी प्रश्न है।

इन परिस्थितियों में प्रत्येक वृक्ष हमारी धरती का एक मौन प्रहरी है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने लिखा था, ‘‘वृक्ष पृथ्वी का वह प्रयास हैं, जिससे वह आकाश से संवाद करती है।’’ वास्तव में प्रत्येक वृक्ष पृथ्वी और आकाश के बीच जीवन का सेतु है।

वृक्ष कार्बन को अवशोषित करते हैं, तापमान को नियंत्रित करते हैं, जैव विविधता का संरक्षण करते हैं और मानव जीवन को सुरक्षित बनाते हैं। इसलिए पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक एवं सामाजिक दायित्व है। जब समाज और सरकार मिलकर कार्य करते हैं, तभी सतत विकास का लक्ष्य साकार होता है।

 इसी सोच को व्यवहार में उतारते हुए भारत ने पर्यावरण संरक्षण को केवल नीतियों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जन-आंदोलन का स्वरूप दिया है। आज भारत विश्व के समक्ष यह संदेश दे रहा है कि प्रकृति की रक्षा तभी संभव है, जब उसमें प्रत्येक नागरिक की सक्रिय भागीदारी हो।

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में पर्यावरण संरक्षण को जनभागीदारी का अभियान बनाया गया है। वर्ष 2024 में आरंभ ‘‘एक पेड़ माँ के नाम’’ अभियान ने पूरे देश में भावनात्मक जुड़ाव के साथ वृक्षारोपण को नई ऊर्जा दी है। इस अभियान के अन्तर्गत दिसंबर 2025 तक लगभग 262 करोड़ पौधे लगाए गए हैं। 

मिशन LiFE (Lifestyle for Environment) ने दुनिया को यह संदेश दिया है कि पर्यावरण की रक्षा केवल सरकारें नहीं कर सकतीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक अपनी जीवनशैली बदलकर इसमें योगदान दे सकता है।

राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम, ग्रीन इंडिया मिशन, नमामि गंगे, अमृत सरोवर मिशन, इंटरनेशनल सोलर अलायंस, राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, स्वच्छ भारत मिशन तथा कैच द रेन अभियान जैसी अनेक पहलें भारत की पर्यावरणीय प्रतिबद्धता का प्रमाण हैं। आज भारत न केवल विकास कर रहा है, बल्कि हरित विकास का वैश्विक मॉडल भी प्रस्तुत कर रहा है।

महात्मा गांधी जी ने कहा था, ‘‘प्रकृति प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकता पूरी कर सकती है, लेकिन एक भी व्यक्ति के लालच को कभी पूरा नहीं कर सकती।’’ आज यह वाक्य पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है।

साथियो,

आज मैं विशेष रूप से युवाओं से कहना चाहता हूँ कि मोबाइल की स्क्रीन से बाहर निकलकर प्रकृति की हरियाली को भी देखिए। सोशल मीडिया पर केवल तस्वीरें साझा मत कीजिए, बल्कि अपने जीवन में ऐसे कार्य कीजिए जिन्हें आने वाली पीढ़ियाँ याद रखें। एक पौधा लगाइए..., एक वर्ष तक उसकी देखभाल कीजिए..., फिर देखिए कि वह वृक्ष केवल बढ़ता नहीं है, बल्कि आपके व्यक्तित्व को भी विकसित करता है।

याद रखिए, पेड़ लगाने वाला व्यक्ति भविष्य में विश्वास करता है। और... जिस समाज में वृक्षों का सम्मान होता है, वहाँ जीवन, संस्कृति और सभ्यता भी सुरक्षित रहती है।

आप केवल पर्यावरण के उत्तराधिकारी नहीं हैं, बल्कि उसके संरक्षक भी हैं। मैं आपसे पाँच संकल्प लेने का आग्रह करता हूँ कि हर वर्ष कम से कम एक वृक्ष अवश्य लगाएँ और उसकी देखभाल करें। प्लास्टिक का प्रयोग कम करें। जल और बिजली की बचत करें। स्वच्छता को जीवन का संस्कार बनाएँ। प्रकृति के प्रति संवेदनशील जीवनशैली अपनाएँ।

इस अवसर पर मैं एक अत्यंत प्रेरक प्रसंग आपसे साझा करना चाहता हूं। एक बार एक वृद्ध व्यक्ति सड़क किनारे आम का पौधा लगा रहा था। किसी ने पूछा, ‘‘जब तक यह फल देगा, तब तक आप शायद जीवित भी न रहें।’’ वृद्ध मुस्कुराकर बोले, ‘‘मैंने जिन पेड़ों के फल खाए हैं, वे भी मैंने नहीं लगाए थे। अब मेरी जिम्मेदारी है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए मैं कुछ छोड़कर जाऊँ।’’ यही पर्यावरण संरक्षण का वास्तविक दर्शन है।

प्रिय साथियो,

आज का यह सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रकृति और संस्कृति के अटूट संबंध का सशक्त प्रतीक है। वन, वन्यजीव और प्रकृति पर आधारित लोकनृत्य एवं सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ हमारी समृद्ध परम्पराओं और पर्यावरण के प्रति हमारी सांस्कृतिक आस्था को अभिव्यक्त करती हैं। आज की इस सांस्कृतिक संध्या का विशेष महत्व यह भी है कि संस्कृति हमें केवल मनोरंजन नहीं देती, बल्कि जीवन के मूल्य भी सिखाती है। 

कला समाज को दिशा देती है। संगीत संवेदनशीलता जगाता है। नृत्य प्रकृति के साथ सामंजस्य का संदेश देता है। लोक संस्कृति हमें अपनी जड़ों से जोड़ती है। जब संस्कृति और पर्यावरण साथ चलते हैं, तब समाज अधिक संवेदनशील बनता है।

जब कोई बच्चा प्रकृति पर आधारित गीत गाता है..., जब कोई कलाकार वृक्षों की महिमा पर नृत्य प्रस्तुत करता है..., जब कोई लोकगीत धरती और वर्षा का स्वागत करता है... तब वह केवल कला का प्रदर्शन नहीं करता, बल्कि समाज में पर्यावरण चेतना का बीजारोपण करता है।

संस्कृति, समाज के हृदय तक पहुँचने का सबसे प्रभावी माध्यम है। जो संदेश कोई अन्य माध्यम वर्षों में नहीं दे पाता, वह कला और संस्कृति कुछ ही क्षणों में जन-जन तक पहुँचा देती है। 

आप सभी के सामूहिक प्रयासों ने इस कार्यक्रम को केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता और सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रभावशाली संदेश बनाने का कार्य किया है। मुझे विश्वास है कि आप सभी भविष्य में भी इसी समर्पण और उत्साह के साथ प्रकृति संरक्षण एवं समाजहित के ऐसे रचनात्मक अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाते रहेंगे।

मैं इस अवसर पर इको क्लबों, शैक्षणिक संस्थानों, इको टास्क फोर्स के जवानों, स्वयंसेवी संगठनों, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों, जनप्रतिनिधियों तथा प्रत्येक नागरिक का भी अभिनंदन करता हूँ, जिन्होंने वन महोत्सव को जन-जन का अभियान बनाने में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है।

आइए, हम सभी आज यह संकल्प लें कि हम केवल पौधे ही नहीं लगाएंगे, बल्कि प्रत्येक पौधे को वृक्ष बनने तक उसकी रक्षा और देखभाल भी करेंगे। यही हमारे पर्यावरण, हमारी आने वाली पीढ़ियों और हमारे सुंदर चण्डीगढ़ के प्रति हमारी सच्ची सेवा होगी।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं वन एवं वन्यजीव विभाग, चण्डीगढ़ नगर निगम, सभी सहभागी विभागों तथा इस आयोजन से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को पुनः हार्दिक बधाई देता हूँ।

बहुत-बहुत धन्यवाद,

जय हिन्द!

जय भारत!