SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF INAUGURATION OF MULTI LEVEL PARKING BUILDING WITHIN THE CHANDIGARH DISTRICT COURT PREMISES AT CHANDIGARH ON JULY 18, 2026.

मल्टी-लेवल पार्किंग भवन के उद्घाटन के अवसर पर

राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 18.07.2026,  शनिवारसमयः सुबह 11:00 बजेस्थानः चंडीगढ़

         

नमस्कार!

आज जिला न्यायालय परिसर, चण्डीगढ़ के इस मल्टी-लेवल पार्किंग भवन के उद्घाटन के अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। मैं चण्डीगढ़ प्रशासन, इंजीनियरिंग विभाग, इस परियोजना से जुड़े सभी अभियंताओं, अधिकारियों, कर्मचारियों तथा निर्माण एजेंसियों को इस महत्वपूर्ण जनसुविधा परियोजना के सफल निर्माण हेतु हार्दिक बधाई देता हूँ।

हम सभी भली-भांति जानते हैं कि किसी भी शहर, राज्य या देश की प्रगति का आइना उसका बुनियादी ढांचा होता है। एक मजबूत और सुव्यवस्थित इंफ्रास्ट्रक्चर लोगों के जीवन को सरल बनाने और उनकी कार्यकुशलता को बढ़ाने का एक सशक्त माध्यम होता है।

देवियो और सज्जनो,

जब हम बुनियादी ढांचे की बात करते हैं, तो चण्डीगढ़ का संदर्भ अपने आप में बेहद खास हो जाता है। चण्डीगढ़ केवल एक शहर नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की नियोजित विकास यात्रा का एक प्रेरणादायी उदाहरण है। विश्वविख्यात वास्तुकार ली कॉर्बुज़ियर द्वारा परिकल्पित यह शहर सुव्यवस्थित शहरी नियोजन, हरित वातावरण, विस्तृत सड़क नेटवर्क और संतुलित विकास की दृष्टि से विश्वभर में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है।

किन्तु, विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। समय के साथ शहर की आबादी, आर्थिक गतिविधियाँ, व्यावसायिक प्रतिष्ठान और वाहनों की संख्या में निरंतर वृद्धि हुई है। ऐसी स्थिति में पार्किंग जैसी मूलभूत सुविधाएँ अब केवल एक सामान्य ‘सुविधा’ नहीं रह गई हैं, बल्कि यह सुचारू शहरी जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता बन चुकी हैं।

इस बढ़ती आवश्यकता का सबसे अधिक प्रभाव हमारे जिला न्यायालय परिसर जैसे महत्वपूर्ण स्थानों पर देखने को मिलता है। यहाँ प्रतिदिन हजारों अधिवक्ता, न्यायिक अधिकारी, वादकारी, पुलिस अधिकारी, कर्मचारी तथा आम नागरिक आते हैं। न्यायालय वह स्थान है जहाँ लोग अक्सर भारी मन, तनाव और न्याय की एक बड़ी उम्मीद लेकर आते हैं।

ज़रा सोचिए, यदि उन्हें इस परिसर में प्रवेश करते ही पार्किंग ढूंढने के मानसिक तनाव और अस्त-व्यस्तता से जूझना पड़े, तो उनकी परेशानी दोगुनी हो जाती है। इसके साथ ही, हमारे अधिवक्ताओं और जजों का समय राष्ट्र की बहुत बड़ी संपत्ति है, जिसे ट्रैफिक या पार्किंग की अव्यवस्था की भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता। लंबे समय से पार्किंग की कमी के कारण यहाँ आने वाले हर व्यक्ति को अनावश्यक कठिनाइयों, समय की बर्बादी तथा यातायात अव्यवस्था का सामना करना पड़ता था।

मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह आधुनिक मल्टी-लेवल पार्किंग भवन इन तमाम समस्याओं के स्थायी समाधान में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इस नई पार्किंग सुविधा से न केवल सभी के बहुमूल्य समय की बचत होगी, बल्कि न्यायालय परिसर में स्वच्छता, अनुशासन और सुगमता का एक नया और सकारात्मक वातावरण भी बनेगा।

मुझे बताया गया है कि 4.5 एकड़ क्षेत्रफल में लगभग 66 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित यह शानदार मल्टी-लेवल पार्किंग अपने आप में एक अत्याधुनिक और भव्य संरचना है। यह पार्किंग भवन लगभग 1,174 कारों की पार्किंग क्षमता के साथ विकसित किया गया है। इसमें बेसमेंट में 283, स्टिल्ट ग्राउंड फ्लोर पर 129, ओपन ग्राउंड फ्लोर में 381, फर्स्ट फ्लोर पर 127, सेकेंड फ्लोर पर 127 तथा टैरेस तल पर भी 127 वाहनों के पार्किंग की व्यवस्था की गई है।

इसके अलावा, यह मल्टीलेवल पार्किंग भवन आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित है। इसमें बेसमेंट में स्वच्छ हवा के निरंतर प्रवाह के लिए मैकेनिकल वेंटिलेशन सिस्टम, 4 यात्री लिफ्ट, सीसीटीवी निगरानी, अग्नि सुरक्षा एवं अग्निशमन प्रणाली, ऊर्जा की बचत करने वाली विद्युत व्यवस्था, आवश्यक पेयजल एवं स्वच्छता सुविधाएँ, सुगम्य भारत अभियान के मानकों के अनुरूप पैदल रैंप एवं 4 सीढ़ियाँ, वाहन चालकों के लिए 2 विश्राम कक्ष, दिव्यांगजनों के लिए आरक्षित पार्किंग, तथा वाहनों के सुचारु आवागमन के लिए सुव्यवस्थित यातायात व्यवस्था उपलब्ध कराई गई है।

यह पहला अवसर नहीं है जब न्यायपालिका और चंडीगढ़ प्रशासन के बेहतरीन समन्वय से कोई परियोजना पूरी हुई है। अतीत में भी इसी तालमेल और आपसी सहयोग की बदौलत कई महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं को सफलतापूर्वक धरातल पर उतारा जा चुका है।

उदाहरण के तौर पर पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय परिसर में समय के साथ न्यायिक अवसंरचना का निरंतर विस्तार किया गया है। जहाँ प्रारंभ में केवल कोर्ट रूम संख्या 1 से 9 तक की ही व्यवस्था उपलब्ध थी, वहीं आज इसका विस्तार होकर आज यह संख्या 69 तक पहुँच चुकी है। इसके अतिरिक्त अधिवक्ताओं की सुविधाओं के लिए लॉयर्स चैंबर्स, न्यू लॉयर्स चैंबर्स, मल्टी-लेवल पार्किंग तथा अन्य आवश्यक आधारभूत सुविधाओं का भी विकास किया गया है।

इसके अलावा, अधिवक्ताओं एवं वादकारियों की सुविधा के लिए लगभग 3.50 करोड़ रूपये की लागत से ग्रीन ग्रास पेवर आधारित पर्यावरण-अनुकूल कच्ची पार्किंग का भी निर्माण किया गया है। 

देवियो और सज्जनो,

आज जब हम न्याय के इस प्रांगण के समीप खड़े हैं, तो कानून और न्याय की महत्ता पर चर्चा करना प्रासंगिक है। भारत में कानून और न्याय की अवधारणा कोई पश्चिमी देन नहीं है; इसका इतिहास हज़ारों वर्ष पुराना है।

प्राचीन भारत में ‘कानून’ का अर्थ ‘धर्म’ हुआ करता था। यह वह धर्म नहीं है जिसे हम आज केवल पूजा-पद्धति मानते हैं, बल्कि यह ‘कर्तव्य’ और ‘सदाचार’ का नियम था। हमारे वेदों, उपनिषदों, स्मृतियों (जैसे मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति) और चाणक्य के अर्थशास्त्र में न्याय व्यवस्था का अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक वर्णन मिलता है।

दुनिया के कई देशों में जहाँ कानून का मतलब ‘राजा का आदेश’ होता था, वहीं हमारे भारत में यह मान्यता थी कि ‘धर्म (Rule of Law) राजा से भी ऊपर है’। राजा को भी उसी धर्म और नियम के अधीन रहकर राजकाज चलाना होता था।

‘‘धर्मो रक्षति रक्षितः’’ अर्थात, जो धर्म (कानून और न्याय) की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। कानून किसी भी सभ्य समाज की रीढ़ होता है। यह कमज़ोर को ताकत देता है, अराजकता को रोकता है और समाज में समानता और शांति सुनिश्चित करता है।

देवियो और सज्जनो,

आज हम सब एक ऐतिहासिक परिवर्तन काल के साक्षी बन रहे हैं। जब हमारा देश ‘विकसित भारत 2047’ के संकल्प की ओर तेजी से पग बढ़ा रहा है, तब हमारी न्याय व्यवस्था में भी अभूतपूर्व और क्रांतिकारी सुधार हुए हैं। 

आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में, भारत सरकार ने औपनिवेशिक काल के उन पुराने कानूनों को जड़ से समाप्त कर दिया है, जिनका मुख्य उद्देश्य नागरिकों पर राज करना और केवल दंडित करना था।

पहले के कानूनों को अंग्रेज़ों ने अपनी सत्ता को लंबा खींचने और अपनी संपत्ति की रक्षा के लिए इंग्लैंड की संसद में बनाया था। लेकिन आज, भारतीय दंड संहिता (IPC), दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह विशुद्ध रूप से भारतीय आत्मा वाले तीन नए कानूनों,  ‘भारतीय न्याय संहिता’, ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ और ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम’ ने ले ली है। 

इन नए कानूनों का मूल उद्देश्य अब सिर्फ ‘दंड’ देना नहीं, बल्कि नागरिकों को ‘न्याय’ प्रदान करना है। इनका मुख्य लक्ष्य भारतीय नागरिकों के शरीर, उनकी संपत्ति और संविधान द्वारा प्रदत्त उनके सभी अधिकारों की रक्षा करना है।

साथियो,

अब देश में लागू किए गए इन तीन नए कानूनों से आम आदमी के मन में ‘‘एफ.आई.आर. करेंगे तो क्या होगा?’’ के डर की जगह ‘‘एफ.आई.आर. से तुरंत न्याय मिलेगा’’ का अटूट विश्वास पैदा हो रहा है।

नए आपराधिक कानून हमारे ‘क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम’ को पूरी तरह बदल देंगे। पहले हमारी न्याय प्रणाली के सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि किसी को नहीं पता था कि न्याय कब मिलेगा। लेकिन अब, इन कानूनों के पूर्ण क्रियान्वयन के बाद, किसी भी मामले में न्याय मिलने की एक स्पष्ट समय-सीमा तय हो गई है।

न्याय दिलाने के तीनों महत्वपूर्ण अंगों, पुलिस, प्रॉसीक्यूशन और ज्यूडिशियरी को जवाबदेह बनाया गया है और उन्हें समय-सीमा से बांधा गया है। अब 90 दिनों के भीतर जांच पूरी करने, चार्जशीट दाखिल करने, चार्ज फ्रेम करने और तय समय में जजमेंट देने की कानूनी बाध्यता सुनिश्चित की गई है।

उपस्थित न्यायविदो,

दुनिया के लगभग 89 देशों की न्याय प्रणालियों का गहन अध्ययन करने के बाद, सरकार ने इन कानूनों में तकनीक को कानूनी आधार देकर समावेशित किया है। इन नए कानूनों में डिजिटल और तकनीकी साक्ष्यों को जो मान्यता दी गई है, उसके बाद केवल शंकाओं के आधार पर अपराध करके बच निकलने वाले अपराधियों के लिए कोई भी रास्ता नहीं छोड़ा गया है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस नई प्रणाली के पूरी तरह लागू होने के बाद हमारे देश में दोष-सिद्धि दर बहुत ऊंचे स्तर पर पहुंच जाएगी।

इन कानूनों में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर अत्यंत सख्त प्रावधान किए गए हैं। इसके साथ ही, ई-कोर्ट्स और वर्चुअल सुनवाई जैसी डिजिटल पहलों ने न्याय को आम आदमी के दरवाज़े तक पहुँचाने का जो शानदार काम किया है, वह ‘आत्मनिर्भर और डिजिटल भारत’ की एक सच्ची और सुखद तस्वीर प्रस्तुत करता है। 

तीनों नए कानूनों पर पूर्ण अमल और तकनीक के उपयोग के साथ, मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि हमारी न्याय प्रणाली विश्व की सबसे आधुनिक और पारदर्शी न्याय प्रणाली बनने जा रही है।

देवियो और सज्जनो,

न्यायालय केवल एक भवन नहीं, बल्कि न्याय का मंदिर है। यहाँ आने वाला प्रत्येक नागरिक विश्वास के साथ यह अपेक्षा करता है कि उसे निष्पक्ष, समयबद्ध और सुलभ न्याय मिलेगा। इसलिए न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास है, और इस विश्वास को बनाए रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

आज आवश्यकता केवल न्याय देने की नहीं, बल्कि हर नागरिक तक न्याय की सहज पहुँच सुनिश्चित करने की है। न्याय तभी सार्थक है, जब वह समय पर, कम खर्च में और सरल भाषा में उपलब्ध हो। आर्थिक कठिनाइयाँ, जटिल प्रक्रियाएँ और भाषा की बाधाएँ किसी भी नागरिक को न्याय से वंचित नहीं कर सकतीं।

मुझे प्रसन्नता है कि ई-कोर्ट, ई-फाइलिंग, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, डिजिटल रिकॉर्ड, निःशुल्क विधिक सहायता और भारतीय भाषाओं में न्यायिक निर्णय उपलब्ध कराने जैसी अनेक पहलें न्याय प्रणाली को अधिक पारदर्शी, प्रभावी और जनसुलभ बना रही हैं।

साथ ही, हमें विचाराधीन कैदियों की संख्या कम करने, लंबित मामलों को शीघ्र निपटाने और न्यायिक अवसंरचना को मजबूत बनाने की दिशा में निरंतर प्रयास करने होंगे। एक ऐसी न्याय व्यवस्था, जो त्वरित, सुलभ, समावेशी और संवेदनशील हो, वही एक मजबूत लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान है।

मुझे विश्वास है कि न्यायपालिका, बार, प्रशासन और समाज के सामूहिक प्रयासों से हम ऐसी न्याय व्यवस्था का निर्माण करेंगे, जहाँ प्रत्येक नागरिक को बिना किसी भेदभाव के न्याय, सम्मान और समान अवसर प्राप्त हो सकें।

देवियो और सज्जनो,

तकनीक आज हमारी न्याय व्यवस्था को अधिक सुलभ, पारदर्शी और प्रभावी बना रही है। ई-कोर्ट्स परियोजना इसके सबसे बड़े उदाहरणों में से एक है। इसके अंतर्गत अब तक 1 करोड़ से अधिक मामले ई-फाइलिंग के माध्यम से दर्ज किए जा चुके हैं, 1 हजार 404 करोड़ रूपये से अधिक की कोर्ट फीस का ई-भुगतान हुआ है तथा 660 करोड़ से अधिक पन्नों का डिजिटलीकरण किया जा चुका है।

आंकड़ों की बात करें तो, 28 फरवरी 2026 तक की स्थिति के अनुसार, देश भर में न्यायाधीशों के 25 हजार 894 स्वीकृत पदों और 21 हजार 27 कार्यरत न्यायाधीशों के मुकाबले, वर्तमान में 22 हजार 712 न्यायालय कक्ष उपलब्ध हैं। वहीं, अगर हम आज के परिदृश्य को देखें, तो हमारे देश में प्रति दस लाख की आबादी पर न्यायाधीशों का अनुपात लगभग 22 है।

National Service and Tracking of Electronics Processes (NSTEP) प्रणाली के माध्यम से करोड़ों समन और नोटिसों का डिजिटल निष्पादन किया जा रहा है। वहीं, 3 हजार 240 न्यायालय परिसरों और 1 हजार 272 जेलों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा उपलब्ध होने से दूरस्थ सुनवाई अधिक सुगम हुई है। राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (National Judicial Data Grid) के माध्यम से नागरिक अब 35 करोड़ से अधिक मामलों और न्यायालयी आदेशों की जानकारी ऑनलाइन प्राप्त कर सकते हैं।

इसके साथ ही डिजिटल कोर्ट्स, JustIS ऐप और केस इंफॉर्मेशन सिस्टम (CIS 4.0) जैसी पहलें न्यायिक कार्यप्रणाली को अधिक आधुनिक, दक्ष और पेपरलेस बना रही हैं। ये उपलब्धियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि भारत एक त्वरित, पारदर्शी और तकनीक-संचालित न्याय व्यवस्था की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है।

देवियो और सज्जनो,

यहाँ उपस्थित सभी सम्मानित अधिवक्ताओं से मैं एक विशेष बात कहना चाहता हूँ। आप न्याय व्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। समाज का अंतिम और सबसे कमज़ोर व्यक्ति भी जब हर जगह से निराश हो जाता है, तो वह न्याय के लिए आपकी ओर देखता है।

‘‘न्याय में देरी, न्याय न मिलने के समान है।’’ मेरा आप सभी से यह आग्रह है कि अपनी वकालत के पेशे को केवल एक व्यवसाय न मानें, बल्कि इसे समाज सेवा का एक पवित्र माध्यम समझें। कोशिश करें कि गरीब और असहाय लोगों को न्याय सुलभ और सस्ता मिल सके।

इसके अतिरिक्त, पंजाब और चंडीगढ़ के एक स्वस्थ भविष्य के लिए, विशेषकर हमारी युवा पीढ़ी को नशे के अंधकार से बचाने में भी आप कानूनी जागरूकता के माध्यम से एक बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। एक नशामुक्त और अपराधमुक्त समाज का निर्माण हम सबकी सामूहिक ज़िम्मेदारी है।

अंत में, मैं चंडीगढ़ प्रशासन, इंजीनियरिंग विभाग और इस परियोजना से जुड़े हर उस श्रमिक और अधिकारी को अपनी ओर से हार्दिक बधाई देता हूँ, जिनके पसीने और मेहनत से यह बहुमंजिला पार्किंग समय पर बनकर तैयार हुई है।

यह सुविधा आज से आप सभी वकीलों, जजों और आम जनता को समर्पित है। इसका सुचारू रूप से उपयोग करें और इस परिसर की गरिमा व स्वच्छता को बनाए रखने में अपना योगदान दें।

ईश्वर से यही प्रार्थना है कि यह न्यायालय परिसर हमेशा सत्य की जीत और धर्म की स्थापना का प्रतीक बना रहे।

बहुत-बहुत धन्यवाद,

जय हिन्द!

जय भारत!