SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF RELEASING OF THE PRIDE OF PEACOCK GLORY OF INDIA, COMPILED BY PUNJAB STATE INFORMATION COMMISSIONER, SHRI HARPREET SANDHU AT PUNJAB LOK BHAVAN ON AUGUS

‘द प्राइड ऑफ पीकॉक - ग्लोरी ऑफ इंडिया’ के विमोचन के अवसर पर

राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 03.08.2026, सोमवारसमयः शाम 5:00 बजे

स्थानः पंजाब लोकभवन

 

 

नमस्कार!

आज का यह अवसर अत्यंत विशेष और हृदय को आनंदित करने वाला है। आज हम यहाँ एक अत्यंत मनमोहक और ज्ञानवर्धक कलात्मक प्रस्तुति, ‘‘द प्राइड ऑफ पीकॉक - ग्लोरी ऑफ इंडिया’’ (The Pride of Peacock – Glory of India) के विमोचन व प्रस्तुतीकरण के अवसर पर एकत्रित हुए हैं।

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि इस कृति का संकलन पंजाब के राज्य सूचना आयुक्त श्री हरप्रीत संधू ने बड़े परिश्रम और समर्पण के साथ किया है। यह केवल मोर के सुंदर चित्रों का संग्रह नहीं है, बल्कि हमारे राष्ट्रीय पक्षी मोर के महत्व को लोगों तक पहुँचाने का एक सराहनीय प्रयास भी है। इस कृति के माध्यम से उन्होंने मोर की सुंदरता के साथ-साथ उसके पर्यावरण में योगदान, भारतीय संस्कृति में उसके विशेष स्थान और हमारे जीवन मूल्यों से उसके गहरे संबंध को सरल और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।

कहा गया है, “जहाँ शब्द समाप्त होते हैं, वहाँ कला संवाद प्रारंभ करती है।” “द प्राइड ऑफ पीकॉक-ग्लोरी ऑफ इंडिया” भी ऐसी ही एक कलात्मक अभिव्यक्ति है, जो हमें प्रकृति के सौंदर्य को देखने के साथ-साथ उसके संरक्षण के प्रति अपने दायित्व का भी स्मरण कराती है।

इस प्रकार के प्रयास विशेष रूप से युवाओं को प्रकृति से जुड़ने, उसकी सुंदरता को समझने और पर्यावरण की रक्षा के लिए आगे आने की प्रेरणा देते हैं। वे हमें यह भी याद दिलाते हैं कि हमारी प्राकृतिक धरोहर की रक्षा करना केवल प्रकृति के लिए ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के बेहतर भविष्य के लिए भी बहुत आवश्यक है।

मैं श्री हरप्रीत संधू को इस सराहनीय कार्य के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ। भारत की विरासत को साहित्य, फोटोग्राफी और कला के माध्यम से लोगों तक पहुँचाने के उनके निरंतर प्रयास प्रशंसनीय हैं। मुझे विश्वास है कि यह कृति अनेक लोगों को हमारी प्राकृतिक धरोहर से प्रेम करने, उसका सम्मान करने और उसके संरक्षण के लिए प्रेरित करेगी।

देवियो और सज्जनो,

भारतवर्ष की भूमि विविधताओं और प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है। इस सौंदर्य का सबसे सजीव और रंगीन प्रतीक हमारा राष्ट्रीय पक्षी, मोर है। यह भारतीय कला, साहित्य, दर्शन और लोक-संस्कृति का अभिन्न अंग है। 

मोर केवल अपनी सुंदरता के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपराओं, साहित्य और आध्यात्मिक जीवन का भी एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। सदियों से वर्षा ऋतु के आगमन पर मोर का मनमोहक नृत्य कवियों, कलाकारों और प्रकृति प्रेमियों को प्रेरित करता आया है। मोर को वर्षा का संदेशवाहक माना जाता है। यह आनंद, आशा, समृद्धि और मनुष्य तथा प्रकृति के बीच मधुर संबंध का प्रतीक है।

भारत में मोर हमारी कला, साहित्य, संगीत, लोककथाओं, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग रहा है। प्राचीन मंदिरों की मूर्तिकला से लेकर आधुनिक कला तक, उसने सदियों से हमारी रचनात्मकता को प्रेरित किया है। इसे भगवान कार्तिकेय का वाहन माना गया है, जो वीरता, शक्ति और धर्म की रक्षा का प्रतीक है। इसके अतिरिक्त, विद्या, संगीत और कला की देवी माँ सरस्वती को भी कई जगह मोर पर विराजमान दर्शाया जाता है।

मोर के रंग-बिरंगे पंख भारत की विविधता का सुंदर चित्र प्रस्तुत करते हैं। जैसे उसके अनेक रंग मिलकर अद्भुत सौंदर्य रचते हैं, वैसे ही हमारी अनेक भाषाएँ, परंपराएँ और संस्कृतियाँ मिलकर भारत की एकता को सशक्त बनाती हैं। मोर हमें सिखाता है कि विविधता ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है।

भारत सरकार ने मोर के इसी अद्वितीय प्राकृतिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व को गहराई से आत्मसात करते हुए, वर्ष 1963 को इसे आधिकारिक रूप से भारत का ‘राष्ट्रीय पक्षी’ घोषित किया था। मोर को यह सर्वोच्च सम्मान प्रदान करने के पीछे मुख्य कारण इसका संपूर्ण भारत में पाया जाना, आम जनमानस से इसका सीधा जुड़ाव और हमारी धार्मिक व सांस्कृतिक परंपराओं में इसकी गहरी पैठ होना था।

इस दृष्टि से ‘‘द प्राइड ऑफ पीकॉक-ग्लोरी ऑफ इंडिया’’ हमारे राष्ट्रीय पक्षी का गौरवगान नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, प्रकृति के प्रति सम्मान और ‘‘अनेकता में एकता’’ की भावना का भी सुंदर संदेश है।

हमारे राष्ट्रीय पक्षी का संरक्षण केवल सरकार का नहीं, बल्कि हम सभी का साझा दायित्व है। यह हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ, सुरक्षित और समृद्ध प्राकृतिक विरासत को बचाकर रखने की हमारी सामूहिक प्रतिबद्धता का प्रतीक है।

साथियो,

जब भी हम मोर की बात करते हैं, तो हमारा ध्यान स्वतः ही भगवान श्री कृष्ण के मुकुट पर सुशोभित ‘मोरपंख’ की ओर चला जाता है। यह मात्र एक आभूषण नहीं है, इसके पीछे एक बहुत गहरी और आध्यात्मिक कथा छिपी है।

एक बार, वनवास के दौरान भगवान श्रीराम और माता सीता घने वन में मार्ग भटक गए। प्यास से व्याकुल माता सीता के लिए जल खोजते समय एक मोर ने उनका मार्गदर्शन किया। रास्ता चिन्हित करने के लिए वह अपने सुंदर पंख गिराता चला गया और अंततः अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। उसके इस निःस्वार्थ त्याग से भाव-विभोर होकर भगवान श्रीराम ने उसे स्मरण रखने का वचन दिया। मान्यता है कि अपने अगले अवतार श्रीकृष्ण के रूप में उन्होंने मस्तक पर मोरपंख धारण कर उस त्याग के प्रति कृतज्ञता प्रकट की।

मोरपंख और भगवान श्रीकृष्ण के संबंध में अन्य अनेक लोकमान्यताएँ प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार राधा जी ने प्रेम और स्मृति के प्रतीक के रूप में उन्हें मोरपंख भेंट किया। दूसरी मान्यता इसे मयूर देव की भक्ति और समर्पण का प्रतीक मानती है। वहीं कुछ कथाओं में कहा गया है कि बाल्यकाल की क्रीड़ाओं के दौरान बलराम जी ने स्नेहपूर्वक यह पंख अपने छोटे भाई श्रीकृष्ण को प्रदान किया। इन सभी मान्यताओं का मूल भाव प्रेम, भक्ति, स्नेह और कृतज्ञता है।

श्री कृष्ण का मोरपंख धारण करना यह दर्शाता है कि ईश्वर प्रकृति के कण-कण से प्रेम करते हैं। मोरपंख के गहरे रंग जीवन के विभिन्न रंगों जैसे सुख, दुख, संघर्ष और उल्लास का प्रतीक हैं। यह हमें सिखाता है कि हमें जीवन के हर रंग को समभाव से स्वीकार करना चाहिए।

देवियो और सज्जनो,

भारतीय संस्कृति प्रकृति को केवल संसाधन नहीं मानती। हमने प्रकृति को माता, देवत्व और जीवनदाता के रूप में सम्मान दिया है। हम पृथ्वी को माता कहते हैं। नदियों को जीवनदायिनी मानते हैं। वृक्षों की पूजा करते हैं। पर्वतों में पवित्रता देखते हैं। पशु-पक्षियों को देवी-देवताओं के साथ जोड़ते हैं। और सूर्य, चंद्रमा, वायु, अग्नि तथा जल के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। 

हमारे प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है, “माता भूमिः पुत्रोऽहम पृथिव्याः।” अर्थात् पृथ्वी हमारी माता है और हम उसकी संतान हैं। यह केवल आध्यात्मिक उद्घोष नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का अत्यंत गहरा सिद्धांत है। यदि हम पृथ्वी को अपनी माता मानते हैं, तो उसके जल, वन, मिट्टी, पर्वत, पशु-पक्षियों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना हमारा नैतिक कर्तव्य है।

भारतीय दर्शन हमें यह भी सिखाता है कि इस सृष्टि में कोई भी जीव अनुपयोगी नहीं है। प्रत्येक जीव का प्रकृति के संतुलन में अपना विशिष्ट स्थान और योगदान है। मोर हो या गौरैया, मधुमक्खी हो या तितली, वृक्ष हो या घास का छोटा-सा पौधा, सभी पृथ्वी के विशाल जीवन-चक्र की कड़ियाँ हैं।

मनुष्य स्वयं को प्रकृति का स्वामी समझने की भूल कर सकता है, लेकिन सच्चाई यह है कि मनुष्य प्रकृति की व्यवस्था का केवल एक अंग है। प्रकृति मनुष्य पर निर्भर नहीं है; मनुष्य का पूरा अस्तित्व प्रकृति पर निर्भर है। इस सत्य को जितना शीघ्र हम समझेंगे, उतना ही सुरक्षित हमारा भविष्य होगा।

देवियो और सज्जनो,

मुझे इस बात का हर्ष है कि हमारे राष्ट्रीय पक्षी के संरक्षण और पर्यावरण जागरूकता की दिशा में राष्ट्रीय स्तर पर अत्यंत सराहनीय प्रयास हो रहे हैं। हाल ही में, 3 से 5 फरवरी 2026 तक नई दिल्ली के त्रावणकोर हाउस में ‘The Peacock’s Call: Mission LiFE for a Greener Tomorrow’ नामक एक विशेष तीन-दिवसीय प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। 

केन्द्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सहयोग से विश्व वन्यजीव कोष-इंडिया के ‘पर्यावरण संबंधी जानकारी, जागरूकता, क्षमता निर्माण एवं आजीविका कार्यक्रम’ (ईआईएसीपी) केंद्र द्वारा आयोजित यह पहल, भारत की प्राकृतिक विरासत को हमारी दिनचर्या और पर्यावरण-अनुकूल व्यवहार से जोड़ने का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

इस प्रदर्शनी के शुरुआती दो दिनों में ही 2 हजार से अधिक लोगों ने इसमें भाग लिया, जिनमें भारी संख्या में स्कूली छात्र, युवा और आम नागरिक शामिल थे। क्विज़, ओरिगेमी, पोस्टर-मेकिंग, लघु फिल्मों के प्रदर्शन और विशेषज्ञ वार्ताओं जैसी रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से युवा पीढ़ी को मोर के पारिस्थितिकी तंत्र और वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूक करना एक अत्यंत सकारात्मक कदम है।

यह पूरा आयोजन भारत सरकार की महत्वाकांक्षी पहल Mission LiFE - Lifestyle for Environment के सिद्धांतों पर आधारित है, जिसका मूल उद्देश्य टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली को अपनाना है। 

श्री संधू जी की यह पुस्तक और हाल ही में संपन्न हुई यह प्रदर्शनी, दोनों ही हमें यह स्पष्ट संदेश देते हैं कि मोर केवल एक सांस्कृतिक प्रतीक नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और मानव के बीच सद्भाव का भी प्रतिनिधित्व करता है। हमें ऐसे आयोजनों से प्रेरणा लेते हुए वन्यजीव और जैव विविधता के संरक्षण को एक जन-आंदोलन का रूप देना चाहिए।

साथियो,

जब हम जैव-विविधता की बात करते हैं तो इसका अर्थ पृथ्वी पर पाए जाने वाले पौधों, पशुओं, पक्षियों, सूक्ष्मजीवों और उनके प्राकृतिक आवासों की विविधता से है। यही विविधता पृथ्वी की जीवन-रक्षा प्रणाली है।

वन वायु को शुद्ध करते हैं, वर्षा चक्र और मिट्टी का संरक्षण करते हैं तथा जीवों को आश्रय देते हैं। नदियाँ सभ्यताओं, कृषि, अर्थव्यवस्था व पारिस्थितिक तंत्र की जीवनरेखा हैं। मधुमक्खियाँ और अन्य परागणकर्ता खाद्य उत्पादन में, पक्षी बीजों के प्रसार और कीट नियंत्रण में तथा वेट्लैंड बाढ़ नियंत्रण, भूजल पुनर्भरण और प्रवासी पक्षियों के संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

प्रकृति एक विशाल जाल की तरह है। इसकी एक कड़ी कमजोर होने पर पूरा पर्यावरण तंत्र प्रभावित होता है। जैव-विविधता हमें भोजन, औषधियाँ, स्वच्छ जल, उपजाऊ मिट्टी, जलवायु संतुलन और आजीविका प्रदान करती है। इसके बावजूद अनियंत्रित शहरीकरण, वनों की कटाई, प्रदूषण, रसायनों का अत्यधिक प्रयोग, अवैध शिकार और जलवायु परिवर्तन से जीवों तथा उनके आवासों पर गंभीर संकट बढ़ रहा है।

किसी प्रजाति का विलुप्त होना केवल एक जीव का अंत नहीं, बल्कि लाखों वर्षों की विकास-यात्रा, आनुवंशिक संपदा और उसकी पारिस्थितिक भूमिका का भी अंत है। बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा, जल संकट, भूमि क्षरण, प्रदूषण और प्राकृतिक आपदाएँ हमें चेतावनी दे रही हैं कि विकास और पर्यावरण को परस्पर विरोधी नहीं माना जा सकता। हमें ऐसा विकास चाहिए, जो आर्थिक प्रगति के साथ पर्यावरणीय संतुलन बनाए; ऐसी कृषि, जो उत्पादन के साथ मिट्टी और जल की रक्षा करे; ऐसे शहर, जो आधुनिक और हरित हों; और ऐसी जीवनशैली, जिसमें सुविधा हो, पर संसाधनों की बर्बादी न हो।

मोर भारत के ग्रामीण, वन और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में पाया जाता है। उसका संरक्षण केवल कानूनी सुरक्षा से संभव नहीं, बल्कि उसके प्राकृतिक आवास, भोजन, जल स्रोतों और प्रजनन स्थलों की रक्षा भी आवश्यक है। पेड़ों की कटाई, झाड़ियों का नष्ट होना, जल स्रोतों का प्रदूषण और अनियोजित निर्माण असंख्य जीवों के घर समाप्त कर देते हैं।

मोर सहित अन्य पक्षियों की रक्षा के लिए प्राकृतिक आवासों का संरक्षण, अवैध शिकार और व्यापार पर नियंत्रण, जल स्रोतों एवं वेट्लैंड की सुरक्षा, कृषि रसायनों का विवेकपूर्ण उपयोग, स्थानीय प्रजातियों के वृक्षों का रोपण तथा बच्चों और युवाओं में जागरूकता अत्यंत आवश्यक है।

वन्यजीव संरक्षण केवल जंगलों तक सीमित नहीं है। जैव-विविधता हमारे खेतों, बागों, तालाबों, विद्यालयों, घरों और शहरों के हरित क्षेत्रों में भी बसती है। हम पक्षियों के लिए स्वच्छ जल रख सकते हैं, स्थानीय पौधे लगा सकते हैं, प्लास्टिक और कचरा फैलाने से बच सकते हैं तथा घायल पक्षियों की सहायता कर सकते हैं। 

छोटे-छोटे प्रयास मिलकर संरक्षण का बड़ा जन-आंदोलन बनते हैं। प्रकृति की रक्षा में प्रत्येक व्यक्ति का योगदान छोटा हो सकता है, पर कोई भी योगदान महत्वहीन नहीं होता।

पर्यावरण संरक्षण हमारा केवल सामाजिक अथवा नैतिक दायित्व नहीं है; यह हमारा संवैधानिक कर्तव्य भी है। भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक से प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा तथा जीवों के प्रति दया की अपेक्षा करता है।

यदि पक्षियों की चहचहाहट समाप्त हो जाएगी, यदि नदियाँ सूख जाएंगी, यदि वन समाप्त हो जाएंगे और यदि वायु सांस लेने योग्य नहीं रहेगी, तो आर्थिक प्रगति और भौतिक समृद्धि का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। इसलिए हमें विकास के साथ प्रकृति को भी आगे लेकर चलना होगा।

साथियो,

पंजाब की पहचान केवल उसकी वीरता, कृषि और समृद्ध संस्कृति से ही नहीं, बल्कि उसकी प्राकृतिक संपदा से भी है। ‘पंजाब’ अर्थात पाँच नदियों की भूमि। हमारी सभ्यता और जीवन प्रकृति, जल और मिट्टी से गहराई से जुड़े हुए हैं। श्री गुरू नानक देव जी का यह संदेश हमें प्रकृति के प्रति हमारा दायित्व याद दिलाता है, ‘‘पवन गुरु पानी पिता माता धरत महत।’’ यह पंक्ति पर्यावरणीय दर्शन का पूर्ण सार प्रस्तुत करती है।

देश की खाद्य सुरक्षा में पंजाब का योगदान ऐतिहासिक रहा है। अब समय है कि जल संरक्षण, मिट्टी की सेहत, फसल विविधीकरण और जैव-विविधता के संरक्षण में भी पंजाब देश के लिए एक आदर्श बने।

अंत में, मैं एक बार पुनः श्री हरप्रीत सिंह संधू जी को “द प्राइड ऑफ पीकॉक-ग्लोरी ऑफ इंडिया” जैसी सुंदर, प्रेरणादायक एवं सार्थक कलाकृति के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ। यह कृति हमें याद दिलाती है कि हमारी असली संपत्ति हमारे बैंक खातों में नहीं, बल्कि हमारे जंगलों, नदियों और वन्यजीवों में बसती है।

आइए, आज हम संकल्प लें कि हम अपने पर्यावरण, अपनी जैव विविधता और अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करेंगे। हम एक ऐसा वातावरण बनाएँगे जहाँ प्रकृति और मानव एक साथ सामंजस्य में रह सकें।

मैं अपनी बात इन पंक्तियों के साथ समाप्त करना चाहूँगाः “मोर के पंखों में प्रकृति का श्रृंगार है, उसके रंगों में भारत का विस्तार है। उसकी गरिमा हमारी संस्कृति की पहचान है, और उसका संरक्षण हम सबका धर्म और सम्मान है।

बहुत-बहुत धन्यवाद, जय हिन्द! जय भारत!