SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF HOISTING THE 110 FOOT TALL MONUMENTAL NATIONAL FLAG AT PGIMER, CHANDIGARH ON AUGUST 5, 2026.
- by Admin
- 2026-08-05 19:15
पीजीआईएमईआर में ‘स्मारकीय राष्ट्रीय ध्वजारोहण’ के अवसर पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 05.08.2026, बुधवार समयः शाम 4:00 बजे स्थानः चंडीगढ़
नमस्कार!
आज पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ़ (पी.जी.आई.एम.ई.आर.) में इस भव्य राष्ट्रीय ध्वज के ध्वजारोहण समारोह में उपस्थित होना मेरे लिए अत्यंत गर्व और सम्मान का विषय है। यह विशाल तिरंगा केवल एक ध्वज नहीं, बल्कि भारत की एकता, साहस, धैर्य और राष्ट्र निर्माण के प्रति हमारी अटूट प्रतिबद्धता का जीवंत प्रतीक है।
मैं इस महत्वपूर्ण पहल के लिए पी.जी.आई.एम.ई.आर. के निदेशक, संस्थान के प्रशासन, चिकित्सकों, वैज्ञानिकों, कर्मचारियों तथा इस परियोजना से जुड़े सभी व्यक्तियों को हार्दिक बधाई देता हूँ।
देवियो और सज्जनो,
मेरा पी.जी.आई.एम.ई.आर. का हर एक दौरा मेरे लिए हमेशा एक अत्यंत सुखद अनुभव होता है। यह न केवल भारत का बल्कि पूरे विश्व का एक अग्रणी चिकित्सा संस्थान है जो चंडीगढ़ और आसपास के राज्यों के लोगों को बेहतरीन स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर रहा है। यहां तक कि यह संस्थान पड़ोसी देशों के रोगियों को भी अपनी सेवाओं से लाभान्वित कर रहा है।
हम सभी जानते हैं कि इस प्रतिष्ठित संस्थान की स्थापना का सपना पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वर्गीय सरदार प्रताप सिंह कैरों तथा संयुक्त पंजाब के अग्रणी चिकित्सा शिक्षाविदों की दूरदर्शी सोच का परिणाम था। इस महान पहल को स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जी का पूर्ण समर्थन प्राप्त हुआ, जो ऐसे संस्थानों को ‘‘विद्या का मंदिर’’ और आधुनिक भारत का ‘‘तीर्थस्थल’’ मानते थे।
वर्ष 1962 में इस संस्थान ने आकार लेना शुरू किया और 7 जुलाई 1963 को पंडित नेहरू जी ने स्वयं ‘नेहरू अस्पताल’ का उद्घाटन किया। प्रारंभ में यह अविभाजित पंजाब सरकार के अधीन था, किंतु नवंबर 1966 में राज्यों के पुनर्गठन के बाद इसका प्रशासनिक नियंत्रण चंडीगढ़ को सौंप दिया गया। वर्ष 1967 में संसद के एक अधिनियम द्वारा इसे भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्था का दर्जा प्रदान किया गया।
इस संस्थान की स्थापना का उद्देश्य उत्तम रोगी सेवा, पोस्ट ग्रेजुएट चिकित्सा शिक्षा में आत्मनिर्भरता, चिकित्सा एवं पैरामेडिकल मानव संसाधन का प्रशिक्षण तथा समुदाय-आधारित स्वास्थ्य अनुसंधान को बढ़ावा देना था। पिछले छह दशकों में इस संस्थान ने इन सभी उद्देश्यों को सफलतापूर्वक साकार करते हुए देश और विश्व में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है।
देवियो और सज्जनो,
आज हमने राष्ट्रीय गौरव के जिस सर्वोच्च प्रतीक हमारे तिरंगे का आरोहण किया है, वह केवल तीन रंगों का कोई साधारण कपड़ा नहीं है। यह भारत की आत्मा, हमारी संप्रभुता, अखंडता और राष्ट्रीय स्वाभिमान का जीवंत स्वरूप है। यह ध्वज अपने भीतर हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष, सैनिकों के सर्वोच्च बलिदान, किसानों और श्रमिकों के अथक परिश्रम के साथ-साथ, आप जैसे समर्पित चिकित्सकों एवं स्वास्थ्य कर्मियों की निस्वार्थ सेवा और 140 करोड़ देशवासियों की अनंत आशाओं को भी समाहित किए हुए है।
जब तिरंगा लहराता है, तो प्रत्येक भारतीय का मस्तक गर्व से ऊँचा हो जाता है। हिमालय की चोटियों से लेकर समुद्र की गहराइयों तक, सीमा की कठिन चौकियों से लेकर अंतरिक्ष की अनंत ऊँचाइयों तक, तिरंगा भारत की शक्ति, सामर्थ्य और आत्मविश्वास का परिचय देता है।
आज पीजीआईएमईआर परिसर में स्थापित यह 110 फुट ऊँचा स्मारकीय राष्ट्रीय ध्वज दूर से दिखाई देगा, लेकिन इसका वास्तविक संदेश हमारे हृदयों की गहराइयों तक पहुँचना चाहिए। इसकी ऊँचाई हमें प्रेरणा देती है कि हमारे विचार भी ऊँचे हों, हमारे संकल्प भी ऊँचे हों और राष्ट्र के प्रति हमारी निष्ठा भी अडिग तथा सर्वोच्च हो।
हमारे राष्ट्रीय ध्वज की वर्तमान संरचना को संविधान सभा ने 22 जुलाई, 1947 को स्वीकार किया था। इसके कुछ ही दिनों बाद, 15 अगस्त, 1947 को भारत ने स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में एक नए युग में प्रवेश किया। स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वेंकैया ने वर्ष 1921 में विजयवाड़ा में महात्मा गांधी के समक्ष ध्वज का एक प्रारूप प्रस्तुत किया था। समय के साथ इसमें परिवर्तन हुए और अंततः अशोक चक्र से युक्त वर्तमान तिरंगा स्वतंत्र भारत की पहचान बना।
हमारे राष्ट्रीय ध्वज का केसरिया रंग साहस, त्याग और निःस्वार्थ सेवा की प्रेरणा देता है। श्वेत रंग सत्य, शांति, पारदर्शिता और सद्भाव का प्रतीक है, जबकि हरा रंग जीवन, समृद्धि, विकास और प्रकृति के साथ संतुलन का संदेश देता है। तिरंगे के मध्य स्थित अशोक चक्र धर्म, न्याय, निरंतर गति और प्रगति का प्रतीक है।
मुझे लगता है कि तिरंगे के ये सभी मूल्य पी.जी.आई.एम.ई.आर. की कार्य-संस्कृति में भी दिखाई देते हैं। केसरिया रंग उन चिकित्सकों, नर्सों और स्वास्थ्यकर्मियों के त्याग को दर्शाता है, जो दिन-रात रोगियों की सेवा करते हैं। श्वेत रंग चिकित्सा पेशे की सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता और नैतिकता का प्रतीक है। हरा रंग रोगियों के लिए जीवन, स्वास्थ्य और नई आशा का संदेश देता है, जबकि अशोक चक्र यहाँ निरंतर चल रहे चिकित्सा अनुसंधान, नवाचार और वैज्ञानिक प्रगति को अभिव्यक्त करता है। इसलिए पी.जी.आई.एम.ई.आर. परिसर में स्थापित यह 110 फुट ऊँचा तिरंगा केवल एक स्मारकीय संरचना नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा, साहस, संवेदना और निरंतर प्रगति का संकल्प है।
इस ध्वज की छाया में शिक्षा प्राप्त करने वाले प्रत्येक विद्यार्थी को यह संकल्प लेना चाहिए कि उसका ज्ञान केवल व्यक्तिगत सफलता का माध्यम न बनकर गरीब, जरूरतमंद और पीड़ित व्यक्ति के जीवन में आशा का प्रकाश बने। प्रत्येक चिकित्सक को यह याद रखना चाहिए कि रोगी केवल एक केस, फाइल या पंजीकरण संख्या नहीं, बल्कि अपने परिवार, सपनों और भावनाओं वाला एक मनुष्य है। प्रत्येक वैज्ञानिक का अनुसंधान प्रयोगशाला और शोध-पत्रों तक सीमित न रहकर जनसाधारण के जीवन को बेहतर बनाने में सहायक होना चाहिए।
सच्ची देशभक्ति केवल समारोहों और नारों तक सीमित नहीं होती। वह हमारे चरित्र, कर्म और कर्तव्य में दिखाई देती है। ईमानदारी से अपना दायित्व निभाना, कानून का पालन करना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, स्वच्छता और पर्यावरण का ध्यान रखना तथा जरूरतमंद की सहायता करना भी राष्ट्रध्वज के प्रति वास्तविक सम्मान है।
इसीलिए कहा जा सकता है, “तिरंगा केवल हमारी पहचान नहीं, यह हमारे कर्तव्यों का आह्वान है। यह केवल आकाश में नहीं लहराता, यह प्रत्येक भारतीय के हृदय में बसता है।” जब भी यह तिरंगा आकाश में लहराता है, यह हम सभी को याद दिलाता है कि राष्ट्र सेवा का सर्वोच्च मार्ग ईमानदारी, संवेदनशीलता और श्रेष्ठता के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना है।
मुझे लगता है कि इस भव्य तिरंगे के लिए पी.जी.आई.एम.ई.आर. से अधिक उपयुक्त स्थान कोई और नहीं हो सकता। यह संस्थान मानव सेवा का एक पावन मंदिर है, जहाँ सेवा ही जीवन का मूल मंत्र है। प्रतिवर्ष लाखों मरीज अपनी आशाओं और विश्वास के साथ इस संस्थान में आते हैं। यहाँ के डॉक्टर, नर्स, शोधकर्ता, विद्यार्थी और सभी स्वास्थ्यकर्मी कर्तव्य से आगे बढ़कर निःस्वार्थ मानव सेवा की मिसाल प्रस्तुत करते हैं।
इस संस्थान ने रोगी सेवा, चिकित्सा शिक्षा, अनुसंधान और जनस्वास्थ्य के क्षेत्र में देश के अग्रणी संस्थानों में अपनी विशिष्ट पहचान लगातार बनाए रखी है। आज यह संस्थान केवल बदलते हुए स्वास्थ्य परिदृश्य के साथ कदमताल नहीं कर रहा, बल्कि भारत की स्वास्थ्य सेवाओं का भविष्य भी गढ़ रहा है।
मुझे यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता है कि हाल ही में माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा राष्ट्र को समर्पित ‘एडवांस्ड न्यूरोसाइंसेज़ सेंटर’ तथा ‘एडवांस्ड मदर एंड चाइल्ड सेंटर’ ने अपनी सेवाएँ प्रारम्भ कर दी हैं और शीघ्र ही इस पूरे क्षेत्र के लोगों को विश्वस्तरीय टर्शरी हेल्थकेयर सेवाएँ उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे।
इसी प्रकार, ‘क्रिटिकल केयर ब्लॉक’ का निर्माण भी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है और इसके अगले वर्ष पूर्ण होने की संभावना है। इसके पूरा होने से पीजीआईएमईआर की आपातकालीन एवं गंभीर रोगियों को उच्चस्तरीय उपचार प्रदान करने की क्षमता और अधिक सुदृढ़ होगी।
मुझे यह जानकर भी अत्यंत प्रसन्नता है कि माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा पी.जी.आई.एम.ई.आर. में मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की घोषणा की गई है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह दूरदर्शी पहल चिकित्सा शिक्षा को नई ऊँचाइयों तक ले जाएगी, भावी चिकित्सकों की नई पीढ़ी तैयार करेगी तथा सइ संस्थान को राष्ट्रीय श्रेष्ठता के केंद्र के रूप में और अधिक सशक्त बनाएगी।
यह और भी हर्ष का विषय है कि पी.जी.आई.एम.ई.आर. की श्रेष्ठता केवल आधुनिक भवनों और अधोसंरचना तक सीमित नहीं है। यह संस्थान नवाचार, जनस्वास्थ्य और सामुदायिक सहभागिता के क्षेत्र में भी राष्ट्रीय नेतृत्व प्रदान कर रहा है।
संस्थान का ‘रीजनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन’ (ROTTO North) लगातार तीसरी बार राष्ट्रीय सर्वश्रेष्ठ ROTTO पुरस्कार तथा कुल चौथी बार यह सम्मान प्राप्त कर पूरे देश का गौरव बढ़ा रहा है। यह उपलब्धि मृतक अंगदान को बढ़ावा देने, पूरे उत्तर भारत में क्षमता निर्माण करने तथा असंख्य मरीजों को नया जीवन देने के प्रति पी.जी.आई.एम.ई.आर. की अटूट प्रतिबद्धता का प्रमाण है।
यह सम्मान वास्तव में उन समर्पित स्वास्थ्यकर्मियों और सबसे बढ़कर उन महान ’अंगदाता परिवारों’ का है, जिनकी करुणा और उदारता पूरे देश के लिए प्रेरणा बन गई है।
इसी प्रकार, प्रोजेक्ट सारथी भी पी.जी.आई.एम.ई.आर. की एक अत्यंत प्रेरणादायक पहल है। युवाओं की स्वयंसेवी भागीदारी के माध्यम से मरीजों की सहायता के उद्देश्य से प्रारम्भ हुआ यह अभियान आज सहभागी स्वास्थ्य सेवा का राष्ट्रीय मॉडल बन चुका है। मुझे यह जानकर विशेष प्रसन्नता है कि केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने इस अभिनव पहल को राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है। यह इस बात का उत्तम उदाहरण है कि इस प्रतिष्ठित संस्थान में जन्मे नवाचार किस प्रकार पूरे देश के मरीजों के अनुभव को बेहतर बना सकते हैं।
ये सभी उपलब्धियाँ यह सिद्ध करती हैं कि पी.जी.आई.एम.ई.आर. केवल श्रेष्ठ चिकित्सक और वैज्ञानिक ही तैयार नहीं कर रहा, बल्कि भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था को सशक्त बनाने वाले नए मॉडल भी विकसित कर रहा है।
प्रिय विद्यार्थियो,
आप ऐसे संस्थान में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, जिसकी विरासत अत्यंत गौरवशाली है। इस पर गर्व करना आपका अधिकार है और इसे नई उपलब्धियों से समृद्ध करना आपका दायित्व है।
डिग्री आपको चिकित्सक बनाएगी, लेकिन संवेदना आपको एक अच्छा चिकित्सक बनाएगी। तकनीकी दक्षता आपको रोग का उपचार करना सिखाएगी, लेकिन मानवीयता आपको रोगी को समझना सिखाएगी। अनुसंधान आपको नए समाधान खोजने में सक्षम बनाएगा, लेकिन नैतिकता यह सुनिश्चित करेगी कि आपका ज्ञान मानवता के हित में उपयोग हो।
याद रखिए, सफल चिकित्सक वह नहीं, जिसके पास केवल अधिक ज्ञान हो; सफल चिकित्सक वह है, जिसके ज्ञान पर रोगी को विश्वास और जिसके व्यवहार में करुणा हो।
भारत आज ‘विकसित भारत 2047’ के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। विकसित भारत के निर्माण के लिए स्वस्थ भारत का निर्माण अनिवार्य है। हमें ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था विकसित करनी होगी, जो गुणवत्तापूर्ण होने के साथ-साथ सुलभ, किफायती, समावेशी और संवेदनशील भी हो।
डिजिटल हेल्थ, टेलीमेडिसिन, ए.आई., रोबोटिक सर्जरी, जीनोमिक्स और सटीक चिकित्सा जैसी तकनीकें स्वास्थ्य क्षेत्र को नई दिशा दे रही हैं। परंतु हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि तकनीक मानवता का विकल्प नहीं, बल्कि मानवता की सेवा का साधन बने।
तकनीक जितनी आधुनिक हो, स्वास्थ्य सेवा उतनी ही मानवीय होनी चाहिए। अनुसंधान जितना उच्चस्तरीय हो, उसका लाभ उतनी ही शीघ्रता से सामान्य और जरूरतमंद नागरिक तक पहुँचना चाहिए।
चंडीगढ़ प्रशासन भी नागरिक-केंद्रित, आधुनिक और समावेशी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए प्रतिबद्ध है। इस दिशा में पी.जी.आई.एम.ई.आर. हमारा प्रमुख सहयोगी और मार्गदर्शक संस्थान है। मुझे विश्वास है कि यह संस्थान भविष्य में भी मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, कैंसर नियंत्रण, अंगदान, मानसिक स्वास्थ्य, नशामुक्ति, वृद्धजन स्वास्थ्य और आपातकालीन चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में अपना नेतृत्व प्रदान करता रहेगा।
देवियो और सज्जनो,
भारतीय संस्कृति में डॉक्टर को “धरती का भगवान” माना जाता है। यहाँ उपस्थित आप सभी स्वास्थ्य कर्मियों का कार्य महज एक पेशा नहीं, बल्कि मानवता की सर्वोच्च सेवा है।
“स्वास्थ्य ही वास्तविक धन है”, महात्मा गांधी जी के इसी विचार को आत्मसात करते हुए, माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र में ऐतिहासिक परिवर्तन किए हैं। वर्ष 2014 से अब तक देश में एम्स की संख्या 7 से बढ़कर 23 हो गई है। इसी अवधि में, मेडिकल कॉलेजों की संख्या 109 प्रतिशत बढ़कर 387 से 808 हो गई है। चिकित्सा शिक्षा को सुदृढ़ करते हुए, एमबीबीएस सीटें 141 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 51 हजार 348 से 1 लाख 23 हजार 700 और पीजी सीटें 144 प्रतिशत बढ़कर 31 हजार 185 से 76 हजार 174 हो गई हैं। स्वास्थ्य बजट भी 220 प्रतिशत की अभूतपूर्व वृद्धि के साथ 33 हजार 278 करोड़ रुपये से बढ़कर 1 लाख 6 हजार 530 करोड़ रुपये हो गया है।
स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ, किफायती और तकनीक-सक्षम बनाने की दिशा में, विश्व की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना ‘आयुष्मान भारत’ के तहत अब तक 44.14 करोड़ कार्ड जारी कर, 1 लाख 80 हजार 435 करोड़ रुपये का निःशुल्क उपचार प्रदान किया गया है। साथ ही, ‘वय वंदना योजना’ में 1.20 करोड़ वरिष्ठ नागरिकों का पंजीकरण और ‘डिजिटल मिशन’ के तहत 90 करोड़ नागरिकों की डिजिटल स्वास्थ्य पहचान सुनिश्चित की गई है।
आज देशभर में 1 लाख 86 हजार से अधिक ‘आयुष्मान आरोग्य मंदिर’ और 18 हजार से अधिक ‘जन औषधि केंद्र’ गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक देखभाल व सस्ती दवाइयां घर-घर पहुँचा रहे हैं। मिशन इंद्रधनुष, टीबी उन्मूलन और ई-संजीवनी जैसी पहलों ने भी स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा दी है।
इन सभी प्रयासों का एकमात्र उद्देश्य हर नागरिक को समय पर, उत्तम स्वास्थ्य सेवाएँ देकर ‘स्वस्थ भारत, विकसित भारत’ के हमारे राष्ट्रीय संकल्प को साकार करना है, और मुझे गर्व है कि पी.जी.आई.एम.ई.आर. इस संकल्प को पूरा करने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
साथियो,
आज स्थापित विशाल तिरंगा हमें ‘राष्ट्र सर्वोपरि है’ का महत्वपूर्ण संदेश देता है। तिरंगा हमें स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान से जोड़ता है और हमें अपने कर्तव्य ईमानदारी, संवेदना और समर्पण के साथ निभाने की प्रेरणा देता है।
आइए, हम संकल्प लें कि राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा को सदैव बनाए रखेंगे, विज्ञान और तकनीक का उपयोग मानव कल्याण के लिए करेंगे, प्रत्येक रोगी के साथ करुणा और समानता का व्यवहार करेंगे तथा पी.जी.आई.एम.ई.आर. की महान विरासत को नई उपलब्धियों से और समृद्ध बनाएँगे।
अंत में, मैं यही कहना चाहूँगा, “ऊँचा केवल ध्वज-दंड नहीं, हमारा राष्ट्रीय चरित्र भी होना चाहिए। विशाल केवल संस्थान का भवन नहीं, हमारा सेवा-भाव भी होना चाहिए। आधुनिक केवल चिकित्सा उपकरण नहीं, हमारी सोच भी होनी चाहिए। और महान केवल हमारा इतिहास नहीं, हमारे आज के कर्म भी होने चाहिए।”
मैं प्रोफेसर विवेक लाल और पूरे पीजीआईएमईआर परिवार को इस प्रेरणादायक पहल के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ। मेरी कामना है कि यह विशाल राष्ट्रीय ध्वज आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रसेवा, समर्पण, उत्कृष्टता और गणतंत्र के सर्वोच्च आदर्शों के प्रति सदैव प्रेरित करता रहे तथा एक स्वस्थ, सशक्त और संवेदनशील भारत के निर्माण के हमारे सामूहिक संकल्प को और अधिक दृढ़ बनाए।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं पीजीआईएमईआर परिवार को उनकी निरंतर श्रेष्ठता और जनसेवा की इस गौरवशाली यात्रा के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।
बहुत-बहुत धन्यवाद,
जय हिन्द!
जय भारत!