SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF ANNUAL ART EXHIBITION AND PRIZE DISTRIBUTION CEREMONY 2025-26 AT CHANDIGARH ON AUGUST 5, 2026.
- by Admin
- 2026-08-05 18:45
‘वार्षिक कला प्रदर्शनी व पुरस्कार वितरण समारोह 2025-26’ के अवसर पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 05.08.2026, बुधवार समयः शाम 5:30 बजे स्थानः चंडीगढ़
नमस्कार!
आज चंडीगढ़ ललित कला अकादमी द्वारा आयोजित इस प्रतिष्ठित ‘वार्षिक कला प्रदर्शनी एवं पुरस्कार वितरण समारोह 2025-26’ के उद्घाटन अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित होना मेरे लिए अत्यंत सम्मान और गर्व का विषय है।
सबसे पहले, मैं ट्राईसिटी के उन सभी 136 प्रतिभाशाली कलाकारों को हृदय से बधाई देता हूँ, जिनकी अनूठी कलाकृतियों को आज यहाँ प्रदर्शित किया गया है। इसके साथ ही, आज पुरस्कार से सम्मानित होने वाले सभी 19 कलाकारों और 60 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के हमारे 4 वरिष्ठ एवं अनुभवी कलाकारों को भी मैं उनके विशिष्ट योगदान के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ।
मुझे यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता हो रही है कि आज पुरस्कृत होने वाले कलाकारों में पेशेवर वर्ग के 8 प्रतिभाशाली कलाकार शामिल हैं, जिन्हें कुल 2 लाख 50 हजार रुपये की पुरस्कार राशि प्रदान की गई है। इसी प्रकार, विद्यार्थी वर्ग के 11 उभरते हुए नवोदित कलाकारों को कुल 1 लाख 70 हजार रुपये की पुरस्कार राशि देकर उनका उत्साहवर्धन किया गया है। इसके अतिरिक्त, कला के क्षेत्र में अपने अमूल्य और दीर्घकालिक योगदान के लिए हमारे 4 वरिष्ठ एवं अनुभवी कलाकारों को अत्यंत प्रतिष्ठित ‘अमृता शेरगिल सम्मान’ से विभूषित करते हुए, कुल 2 लाख 4 हजार रुपये की सम्मान राशि प्रदान की गई है।
मुझे यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता हुई है कि इस प्रदर्शनी में भाग लेने वाले कलाकरों में हमारे युवा, मातृशक्ति, वरिष्ठ नागरिक और हमारे प्रतिभावान दिव्यांग कलाकार पूरे उत्साह के साथ शामिल हैं। यह समावेशी भागीदारी वास्तव में सराहनीय है। कुल 450 आई कृतियों में से इन 136 बेहतरीन कलाकृतियों का चयन करना, निर्णायक मंडल (जूरी) के लिए निश्चित रूप से एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण और जिम्मेदारी भरा कार्य रहा होगा।
मैं 5 अगस्त से 13 अगस्त 2026 तक चलने वाले इस अत्यंत सुंदर, भव्य और महत्वपूर्ण आयोजन के लिए चंडीगढ़ ललित कला अकादमी को हृदय से बधाई देता हूँ।
मुझे बताया गया है कि वर्ष 1976 में चंडीगढ़ आर्ट काउंसिल का गठन किया गया था, जिसके अंतर्गत ‘चंडीगढ़ ललित कला अकादमी’, ‘चंडीगढ़ साहित्य अकादमी’ और ‘चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी’ की स्थापना की गई थी, ताकि शहर के कलात्मक, साहित्यिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को एक नई दिशा, नई पहचान और नई ऊर्जा मिल सके।
अपनी स्थापना से ही चंडीगढ़ ललित कला अकादमी प्रदर्शनियों, कार्यशालाओं और संवादों के माध्यम से कलाकारों व कला-प्रेमियों को जोड़कर, कला-संस्कृति को बढ़ावा देने और शहर की एक सशक्त ‘दृश्य कला पहचान’स्थापित करने में निरंतर अग्रणी भूमिका निभा रही है।
युवा कलाकारों के लिए वर्ष 2022 में प्रारंभ किया गया अंतरराष्ट्रीय छात्रवृत्ति कार्यक्रम अकादमी की प्रमुख उपलब्धियों में से एक है। इसके अंतर्गत 20 से 30 वर्ष आयु वर्ग के कलाकारों को लंदन, पेरिस, रोम, वेटिकन सिटी और वेनिस बिएनाले जैसे वैश्विक कला केंद्रों का अध्ययन भ्रमण कराया जाता है। अकादमी के छात्रवृत्ति प्राप्त कलाकार कई बार वेनिस बिएनाले में भाग ले चुके हैं। भारत में ऐसी छात्रवृत्ति आरंभ करने वाली सीएलकेए एकमात्र कला अकादमी है।
इसी प्रकार, सीएलकेए ओपन हैंड आर्ट स्टूडियो पुरस्कार एवं छात्रवृत्ति योजना भी अपनी तरह की अनूठी पहल है। अकादमी प्रत्येक वर्ष नए प्रिंटमेकिंग प्रेस स्थापित करती है और पाँच प्रतिभाशाली युवा कलाकारों को छात्रवृत्ति प्रदान करती है, जिसमें दो माह की कलाकार रेज़िडेंसी तथा 25 हजार रुपये की वित्तीय सहायता शामिल है। इससे कलाकारों को संसाधन, समय, मार्गदर्शन और अनुकूल रचनात्मक वातावरण प्राप्त होता है।
अकादमी ने चंडीगढ़ के कलाकारों की प्रदर्शनियाँ जवाहर कला केंद्र, जयपुर; भारत भवन, भोपाल; शिमला; क्षेत्रीय केंद्र, लखनऊ तथा ललित कला अकादमी, नई दिल्ली जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में आयोजित की हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जापान के कमाकुरा में प्रदर्शनियों, चंडीगढ़ के सरकारी संग्रहालय एवं कला दीर्घा में जापानी कलाकारों की पारस्परिक प्रदर्शनियों तथा कलाकार आदान-प्रदान कार्यक्रमों ने भारत-जापान सांस्कृतिक संबंधों को सुदृढ़ किया है।
कोरिया, श्रीलंका, बांग्लादेश और अन्य देशों के कलाकारों के प्रदर्शनियों एवं संवाद कार्यक्रमों ने भी स्थानीय कलाकारों और विद्यार्थियों को विविध कला परंपराओं तथा समकालीन प्रक्रियाओं से परिचित कराया है।
समावेशी कला संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए अकादमी ने ‘वॉयस ऑफ रेज़िलिएंस’ परियोजना के अंतर्गत दिव्यांग कलाकारों के लिए कार्यशालाएँ और प्रदर्शनियाँ आयोजित की हैं। महिला कलाकारों के लिए विशेष प्रदर्शनियाँ तथा चंडीगढ़ और केरल के महिला कलाकारों की संयुक्त प्रदर्शनियाँ भी आयोजित की गई हैं। अकादमी देशभर की राज्य ललित कला अकादमियों और सांस्कृतिक संस्थानों के साथ साझेदारी विकसित कर संयुक्त प्रदर्शनियों, कार्यशालाओं और कलाकार संवाद के नए अवसर सृजित कर रही है।
शिक्षा और कौशल विकास भी अकादमी के कार्यों का प्रमुख आधार हैं। ओपन हैंड आर्ट स्टूडियो में प्रत्येक सप्ताहांत चित्रकला, प्रिंटमेकिंग, पॉटरी और क्ले मॉडलिंग की नियमित कक्षाएँ तथा प्रतिष्ठित कलाकारों द्वारा मास्टरक्लास आयोजित की जाती हैं। इसके अतिरिक्त, 30 सरकारी विद्यालयों में व्याख्यानमालाओं, चंडीगढ़ की कला एवं वास्तुकला पर ऑडियो-विजुअल प्रस्तुतियों और कार्यशालाओं के माध्यम से विद्यार्थियों को शहर की सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराया जा रहा है।
जनसहभागिता बढ़ाने के लिए सेक्टर-17 अंडरपास, ली कार्बुज़ियर सेंटर और सीएलकेए ओपन हैंड आर्ट स्टूडियो में निःशुल्क प्रदर्शनी स्थल उपलब्ध कराए जाते हैं। मूर्तिकला कार्यशालाओं के माध्यम से सेक्टर-17 प्लाज़ा, सुखना लेक, रोज़ गार्डन, लीज़र वैली और यूटी गेस्ट हाउस सहित शहर के प्रमुख स्थलों पर स्थायी पत्थर की मूर्तियाँ स्थापित की गई हैं। अकादमी रोज़ फेस्टिवल, चंडीगढ़ कार्निवल और क्राफ्ट्स मेले में सक्रिय भागीदारी कर कला को व्यापक जनसमुदाय तक पहुँचाती है।
भविष्य में अकादमी राष्ट्रीय चंडीगढ़ कला मेले, शहर के विभिन्न हिस्सों में आर्ट कॉर्नर तथा दीर्घकालिक रूप से चंडीगढ़ बिएनाले (एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की कला प्रदर्शनी) के आयोजन की परिकल्पना कर रही है। छात्रवृत्तियों, अंतरराष्ट्रीय आदान-प्रदान, सार्वजनिक कला, शिक्षा, शोध, प्रदर्शनियों और सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से चंडीगढ़ ललित कला अकादमी भारतीय कला जगत में अपनी विशिष्ट पहचान को निरंतर सुदृढ़ कर रही है।
देवियो और सज्जनो,
कला मानव सभ्यता की सबसे प्राचीन और प्रभावशाली अभिव्यक्तियों में से एक है। भाषा और लिपि के व्यवस्थित विकास से पहले ही मनुष्य ने रेखाओं, संकेतों और चित्रों के माध्यम से अपने जीवन, प्रकृति, उत्सवों और सामुदायिक अनुभवों को अभिव्यक्त करना शुरू कर दिया था। मध्य प्रदेश के भीमबेटका शैलचित्र इस प्राचीन रचनात्मक चेतना के साक्षी हैं।
कला भाषा, संस्कृति और समय की सीमाओं से परे जाकर मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है। एक रेखा, रंग या आकृति अनेक बार वह भाव व्यक्त कर देती है, जिसे शब्दों में कहना कठिन होता है। कला केवल सौंदर्य का अनुभव नहीं कराती, बल्कि हमें सोचने, प्रश्न पूछने और अपने समय को समझने की दृष्टि भी देती है। वह कभी समाज का दर्पण बनती है, तो कभी उसे मार्ग दिखाने वाला दीपक। इसीलिए कहा गया है, “कला वह भाषा है, जिसे आँखें पढ़ती हैं, हृदय समझता है और समय सुरक्षित रखता है।”
भारत की कला-परंपरा हजारों वर्षों से निरंतर विकसित होती रही है। अजंता के भित्तिचित्र करुणा, त्याग और आध्यात्मिकता की अद्भुत अभिव्यक्ति हैं, जबकि एलोरा की बौद्ध, हिंदू और जैन गुफाएँ भारत की धार्मिक सहिष्णुता और कलात्मक प्रतिभा को प्रकट करती हैं। सांची के स्तूप, खजुराहो के मंदिर, महाबलीपुरम के शैलकृत स्मारक और तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर हमारी वास्तुकला, मूर्तिकला और चित्रकला की महान उपलब्धियों के प्रमाण हैं।
भारत के मंदिर केवल पूजा-स्थल नहीं रहे, बल्कि वे वास्तुकला, मूर्तिकला, नृत्य, संगीत और शिल्प के जीवंत केंद्र भी रहे हैं। इसी प्रकार मधुबनी, वारली, पत्तचित्र, कलमकारी, गोंड, तंजौर, पहाड़ी लघुचित्र, राजस्थानी चित्रकला और पंजाब की लोककलाएँ हमारी सांस्कृतिक विविधता की सुंदर अभिव्यक्तियाँ हैं।
हमारी लोककलाएँ यह भी सिखाती हैं कि महान सृजन के लिए महँगे साधनों से अधिक कल्पना, संवेदना और समर्पण की आवश्यकता होती है। साधारण मिट्टी, कपड़ा, लकड़ी और प्राकृतिक रंग भी कलाकार के स्पर्श से असाधारण अभिव्यक्ति बन सकते हैं।
देवियो और सज्जनो,
चंडीगढ़ स्वयं कला, वास्तुकला और आधुनिक नगर-योजना का एक जीवंत उदाहरण है। कैपिटल कॉम्प्लेक्स और ‘ओपन हैंड’ स्मारक खुले मन से विचार ग्रहण करने और समाज को अपनी प्रतिभा देने का संदेश देते हैं।
नेकचंद जी का रॉक गार्डन इस बात का अद्भुत उदाहरण है कि कलाकार की कल्पना अनुपयोगी वस्तुओं को भी सौंदर्य और अर्थ प्रदान कर सकती है। टूटे बर्तनों, चूड़ियों, टाइलों और त्यक्त सामग्री से निर्मित यह उद्यान कला, पुनर्चक्रण और मानवीय सृजनशीलता का प्रेरक प्रतीक है। इसी प्रकार राजकीय संग्रहालय एवं कला दीर्घा हमारी प्राचीन मूर्तियों, गांधार कला तथा पहाड़ी और राजस्थानी लघुचित्रों को नागरिकों के निकट लाती है।
इस दृष्टि से चंडीगढ़ केवल एक नियोजित शहर नहीं, बल्कि अपने आप में एक खुली कला-दीर्घा है, जहाँ इमारतें, उद्यान, मूर्तियाँ, संग्रहालय और सार्वजनिक स्थल आधुनिकता तथा परंपरा के बीच निरंतर संवाद स्थापित करते हैं।
मुझे प्रसन्नता है कि इस प्रदर्शनी में विभिन्न शैलियों, विषयों और माध्यमों की व्यापक विविधता दिखाई दे रही है। कहीं प्रकृति की चिंता है, कहीं मानवीय संबंधों की संवेदना; कहीं सामाजिक परिवर्तन की अभिव्यक्ति है, तो कहीं आध्यात्मिक अनुभूति। अनेक कलाकार पारंपरिक माध्यमों के साथ कार्य कर रहे हैं, जबकि अन्य डिजिटल कला, फोटोग्राफी, इंस्टॉलेशन और मल्टीमीडिया के माध्यम से नए प्रयोग कर रहे हैं।
आज डिजिटल पेंटिंग, एनीमेशन, वीडियो आर्ट, थ्री-डी मॉडलिंग और एआई जैसी तकनीकें कलात्मक अभिव्यक्ति के नए द्वार खोल रही हैं। हमें इनका स्वागत करना चाहिए, लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि तकनीक कलाकार की संवेदना और कल्पना का विकल्प नहीं हो सकती। तकनीक केवल साधन है; रचना की आत्मा कलाकार के विचारों, अनुभवों और मानवीय भावनाओं से आती है।
प्रिय कलाकारो,
आप समाज की संवेदनशील चेतना हैं। आपकी रचनाएँ पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तीकरण, सामाजिक समानता, मानसिक स्वास्थ्य, शांति और मानवीय गरिमा जैसे विषयों पर समाज को जागरूक कर सकती हैं।
आज जब विश्व तनाव, हिंसा, पर्यावरणीय संकट और मानसिक अस्वस्थता जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब कला की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। कला हमें बाहरी शोर से दूर ले जाकर स्वयं से संवाद करने का अवसर देती है। वह पीड़ा को समाप्त न कर सके, तो उसे अभिव्यक्ति अवश्य देती है; और अभिव्यक्ति ही मनुष्य को उससे उबरने की दिशा में पहला कदम उठाने का साहस देती है।
मैं विशेष रूप से दिव्यांग कलाकारों के लिए विशेष निर्णायक मंडल पुरस्कार प्राप्त करने वाले श्री वीरप्रताप सिंह को हार्दिक बधाई देता हूँ। आपकी उपलब्धि यह संदेश देती है कि प्रतिभा किसी शारीरिक सीमा से बँधी नहीं होती। “जब संकल्प मजबूत हो, तो सीमाएँ रुकावट नहीं, सृजन की नई दिशा बन जाती हैं।”
प्रिय युवा कलाकारो,
कला के क्षेत्र में सफलता के लिए प्रतिभा के साथ अनुशासन, धैर्य और निरंतर अभ्यास आवश्यक है। एक श्रेष्ठ कलाकृति के पीछे अनेक प्रयोग, संशोधन, असफलताएँ और आत्ममंथन छिपे होते हैं।
दूसरों से सीखिए, लेकिन अपनी मौलिकता बनाए रखिए। अपनी जड़ों से जुड़े रहिए, परंतु नए विचारों से मत डरिए। परंपरा का सम्मान कीजिए, लेकिन उसमें अपने समय की संवेदना और अपनी व्यक्तिगत दृष्टि भी जोड़िए।
याद रखिए, “खाली कैनवास कठिनाई नहीं, संभावना है; पहली रेखा पूर्णता नहीं, यात्रा की शुरुआत है; और प्रत्येक असफल प्रयोग एक बेहतर रचना की ओर बढ़ाया गया कदम है।”
मैं अभिभावकों और शिक्षकों से भी आग्रह करता हूँ कि वे बच्चों की कलात्मक रुचि को केवल मनोरंजन न समझें। कला बच्चों में कल्पनाशीलता, आत्मविश्वास, एकाग्रता और संवेदनशीलता विकसित करती है। हर बच्चा पेशेवर कलाकार बने, यह आवश्यक नहीं; लेकिन कला से जुड़ा प्रत्येक बच्चा अधिक सृजनशील और जिम्मेदार नागरिक अवश्य बन सकता है।
साथियो,
भारत आज ‘विकसित भारत 2047’ के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। विकसित भारत का अर्थ केवल आर्थिक और तकनीकी प्रगति नहीं है। विकसित राष्ट्र वह भी होता है, जो अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करे, अपने कलाकारों का सम्मान करे और नागरिकों की रचनात्मक क्षमता को आगे बढ़ने का अवसर दे।
कला और संस्कृति भारत की महत्वपूर्ण ‘सॉफ्ट पावर’ हैं। भारतीय कला, हस्तशिल्प, वास्तुकला, वस्त्र, संगीत और नृत्य विश्वभर में हमारी पहचान को सुदृढ़ करते हैं। हमें पारंपरिक कलाओं को वैश्विक मंच देने के साथ-साथ समकालीन कलाकारों को भी अंतरराष्ट्रीय अवसरों से जोड़ना होगा।
कला के माध्यम से रोजगार और उद्यमिता की संभावनाओं को भी बढ़ाया जा सकता है। कलाकारों को कला-प्रबंधन, डिजिटल प्रस्तुति, ऑनलाइन मार्केटिंग, बौद्धिक संपदा अधिकार और कला-संरक्षण से संबंधित प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाना चाहिए, ताकि उनकी प्रतिभा को सम्मान के साथ आर्थिक स्थिरता भी प्राप्त हो।
देवियो और सज्जनो,
कला को मूर्त रूप देने में कलाकारों को अपना समय, ऊर्जा और संसाधन लगाना पड़ता है। कलाकृतियों का उचित मूल्य मिलना उस कलाकार के साथ-साथ उन लोगों को भी प्रोत्साहित करेगा जो कला को एक पेशे के रूप में अपनाना चाहते हैं।
मैं चंडीगढ़ के नागरिकों से भी आग्रह करता हूँ कि वे प्रदर्शनियों और संग्रहालयों को अपने सामाजिक जीवन का हिस्सा बनाएँ, कलाकारों से संवाद करें और उनकी रचनाओं का समर्थन करें। कलाकार को केवल प्रशंसा ही नहीं, बल्कि दर्शक, संवाद और सहयोग की भी आवश्यकता होती है।
अंत में, मैं यही कहना चाहूँगा, “कला केवल दीवारों की शोभा नहीं, वह समाज की आत्मा का स्वर है। कला केवल रंगों और आकारों का संयोजन नहीं, वह मनुष्य की संवेदनाओं और सपनों की अभिव्यक्ति है। कला केवल अतीत की धरोहर नहीं, वह भविष्य की कल्पना भी है।”
आइए, हम अपनी कलात्मक विरासत को सुरक्षित रखने, लोक एवं पारंपरिक कलाओं को नई पीढ़ी तक पहुँचाने, युवा कलाकारों को अवसर देने तथा चंडीगढ़ को सृजनशीलता और सांस्कृतिक समावेश का अग्रणी केंद्र बनाने का संकल्प लें।
मैं चंडीगढ़ ललित कला अकादमी को इस भव्य प्रदर्शनी के आयोजन के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ। सभी चयनित कलाकारों, पुरस्कार विजेताओं और सम्मानित वरिष्ठ कलाकारों को मेरी ओर से बहुत-बहुत शुभकामनाएँ।
आप सभी निरंतर सृजन करते रहें और अपनी कला से चंडीगढ़ तथा भारत का गौरव बढ़ाते रहें।
बहुत-बहुत धन्यवाद,
जय हिन्द!
जय भारत!