SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF 16TH NATIONAL MEETING OF STATE BIODIVERSITY BOARDS AND UNION TERRITORY BIODIVERSITY COUNCILS AT CHANDIGARH ON SEPTEMBER 6, 2026.
- by Admin
- 2026-09-06 13:30
राज्य जैव विविधता बोर्डों और संघ राज्य क्षेत्र जैव विविधता परिषदों की 16वीं राष्ट्रीय बैठक के अवसर पर
राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन
दिनांकः 06.09.2026, रविवार समयः सुबह 11:00 बजे स्थानः चंडीगढ़
नमस्कार!
मुझे पंजाब की इस पावन धरा पर आप सभी का स्वागत करते हुए अत्यंत हर्ष की अनुभूति हो रही है। राज्य जैव विविधता बोर्डों और संघ राज्य क्षेत्र जैव विविधता परिषदों की इस 16वीं राष्ट्रीय बैठक में आपकी उपस्थिति हमारे सामूहिक संकल्प का प्रमाण है।
यह बैठक केवल प्रशासनिक समीक्षा या अनुभव साझा करने का मंच नहीं है। यह भारत की प्राकृतिक विरासत के भविष्य पर सामूहिक चिंतन का एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय अवसर है। क्योंकि आज जैव विविधता का संरक्षण केवल पर्यावरण का विषय नहीं रह गया है; यह हमारी पारिस्थितिक सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, जल सुरक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका, जलवायु अनुकूलन और सतत विकास से सीधे जुड़ा हुआ विषय है।
अथर्ववेद का एक अत्यंत सुंदर श्लोक हैः ‘‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’’ अर्थात् भूमि मेरी माता है, और मैं इस पृथ्वी का पुत्र हूँ।
श्री गुरु नानक देव जी ने भी प्रकृति के साथ मनुष्य के अटूट संबंध को बहुत सुंदर शब्दों में व्यक्त कियाः “पवन गुरु, पानी पिता, माता धरत महत।” अर्थात् वायु गुरु के समान है, जल पिता के समान है और धरती हमारी महान माता है।
यह केवल आध्यात्मिक संदेश नहीं है; यह आज के पर्यावरणीय संकट के लिए एक अत्यंत आधुनिक और प्रासंगिक जीवन-दर्शन भी है। यदि हवा प्रदूषित होगी, पानी दूषित होगा, मिट्टी कमजोर होगी और जैव विविधता समाप्त होगी, तो मानव समाज की समृद्धि भी स्थायी नहीं रह सकती।
एक आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत 2047 के निर्माण का हमारा सपना तभी साकार हो सकता है, जब हम अपनी प्राकृतिक संपदा और जैव विविधता को पूरी तरह से सुरक्षित और समृद्ध रखें।
साथियो,
हम भाग्यशाली हैं कि भारत दुनिया के ‘महा-विविध’ यानी "Megadiverse" देशों में से एक है। विश्व के कुल भू-क्षेत्र का केवल लगभग 2.4 प्रतिशत भारत के पास है, फिर भी विश्व में दर्ज प्रजातियों का लगभग 8 प्रतिशत हमारे देश में पाया जाता है। भारत में विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त 4 जैव विविधता हॉटस्पॉट हैं। हिमालय से पश्चिमी घाट तक, मरुस्थल से वर्षावनों तक और वेटलैंड्स से तटीय एवं समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र तक हमारा देश प्रकृति की असाधारण विविधता का धनी है।
लेकिन जैव विविधता केवल प्रजातियों की संख्या नहीं है। हमारे जंगल, नदियाँ, वेटलैंड्सँ, मिट्टी, पौधे और जीव-जंतु हमें भोजन, औषधि, स्वच्छ जल, परागण, मिट्टी की उर्वरता और जलवायु संतुलन जैसी अनगिनत पारिस्थितिकी सेवाएँ प्रदान करते हैं।
इसलिए हमें हमेशा याद रखना होगा कि जैव विविधता कोई विलासिता नहीं, जीवन की आधारभूत संरचना है। और प्रकृति हमारी अर्थव्यवस्था के बाहर नहीं है; प्रकृति ही हमारी अर्थव्यवस्था की मूल पूँजी है।
महात्मा गांधी का संदेश भी हमें यही सिखाता है कि पृथ्वी प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकता पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन देती है, लेकिन असीमित लालच के लिए नहीं। इसलिए आज आवश्यकता ऐसी विकास यात्रा की है जिसमें विकास भी हो, लेकिन प्रकृति के साथ; समृद्धि भी हो, लेकिन स्थिरता के साथ।
मित्रों,
आज हम पंजाब की धरती पर एकत्र हुए हैं जो पाँच नदियों की धरती और देश के अन्न भंडार के रूप में पहचानी जाती है। पंजाब की प्राकृतिक पहचान केवल उसके खेतों तक सीमित नहीं है। सतलुज, ब्यास और रावी से जुड़े बाढ़ क्षेत्र, वेटलैंड्स, घास के मैदान और वन्यजीव आवास यहाँ की महत्वपूर्ण प्राकृतिक संपदा हैं।
हरिके, कांजली, रोपड़, केशोपुर-मियानी, नंगल और रणजी सागर जैसे वेटलैंड्स अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त हैं और प्रवासी पक्षियों को महत्वपूर्ण आवास प्रदान करते हैं। लेकिन इनका महत्व इससे कहीं अधिक है। ये जल को संचित करते हैं, भूजल का पुनर्भरण करते हैं, कार्बन का भंडारण करते हैं, बाढ़ के प्रभाव को कम करते हैं और हजारों परिवारों की आजीविका का आधार हैं।
इसलिए वेटलैंड्स को केवल पर्यटन या पक्षी-दर्शन के स्थान के रूप में नहीं, बल्कि प्रकृति की प्राकृतिक आधारभूत संरचना के रूप में देखना होगा।
मुझे प्रसन्नता है कि भारत ने वेटलैंड्स संरक्षण में महत्वपूर्ण प्रगति की है। 2014 में देश में 26 रामसर स्थल थे, जबकि अगस्त 2026 तक इनकी संख्या बढ़कर 101 हो गई है। अरुणाचल प्रदेश की ग्लाव झील देश का 101वाँ रामसर स्थल बनी है।
लेकिन हमें याद रखना होगा कि मान्यता से अधिक महत्वपूर्ण प्रबंधन है। प्रत्येक वेटलैंड के लिए वैज्ञानिक प्रबंधन, जल प्रवाह का संरक्षण, प्रदूषण में कमी, आक्रामक बाहरी प्रजातियों का नियंत्रण, जलग्रहण क्षेत्र का संरक्षण, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और नियमित पारिस्थितिक निगरानी आवश्यक है।
पंजाब के लिए कृषि जैव विविधता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। हरित क्रांति ने देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत किया और पंजाब के किसानों ने इसमें ऐतिहासिक योगदान दिया। अब बदलते जलवायु और प्राकृतिक संसाधनों की चुनौतियों के बीच हमें ऐसी कृषि की ओर बढ़ना होगा जो अधिक टिकाऊ और जल-संरक्षण आधारित हो।
स्थानीय फसल किस्में, मिट्टी के सूक्ष्म जीव, परागणकर्ता, देशी वृक्ष और खेतों में रहने वाले पक्षी, ये कृषि के अदृश्य साथी हैं। जैव विविधता कमजोर होगी, तो दीर्घकाल में कृषि भी कमजोर होगी। इसलिए फसल विविधीकरण, मिट्टी का स्वास्थ्य, जल संरक्षण, स्थानीय बीजों और आनुवंशिक संसाधनों का संरक्षण तथा परागणकर्ताओं की रक्षा हमारी प्राथमिकताएँ होनी चाहिए।
साथियो,
चंडीगढ़ के निकट स्थित लगभग 2 हजार 600 हेक्टेयर में फैला सुखना वन्यजीव अभयारण्य भी हमें एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। केवल सुखना झील को बचाना पर्याप्त नहीं है; उसके जलग्रहण क्षेत्र, जंगल, मिट्टी और प्राकृतिक जल निकासी तंत्र को भी सुरक्षित रखना होगा।
चंडीगढ़ के नगर वन, जैव विविधता उद्यान, नगर पक्षी अभयारण्य और अन्य हरित क्षेत्र यह दिखाते हैं कि शहरी विकास और प्रकृति साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं। आज जब दुनिया तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रही है, हमें यह सोच विकसित करनी होगी कि शहर केवल मनुष्यों के लिए नहीं, प्रकृति के लिए भी होने चाहिए। भविष्य के स्मार्ट शहर केवल तकनीकी रूप से स्मार्ट नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति भी संवेदनशील होने चाहिए।
साथियो,
जैव विविधता संरक्षण की वास्तविक शक्ति स्थानीय समुदायों में है। इसी कारण जैव विविधता प्रबंधन समितियाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसी प्रकार जन जैव विविधता रजिस्टर केवल सरकारी दस्तावेज नहीं, बल्कि किसी समुदाय की पारिस्थितिक स्मृति हैं। इन रजिस्टरों में स्थानीय पौधों, पशु-पक्षियों, फसल किस्मों, औषधीय पौधों, पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति से समुदाय के संबंधों का दस्तावेजीकरण होता है।
लेकिन हमारा लक्ष्य केवल यह गिनना नहीं होना चाहिए कि कितने रजिस्टर बने। हमें उनकी गुणवत्ता, वैज्ञानिक सत्यापन, नियमित अद्यतन और वास्तविक उपयोग सुनिश्चित करना होगा।
जन जैव विविधता रजिस्टर जीवंत दस्तावेज बनें, जिनसे यह पता चले कि कौन-सी प्रजातियाँ घट रही हैं, कौन-सी पारंपरिक फसल की किस्में खत्म हो रही हैं, कौन-से आवास संकट में हैं और कहाँ संरक्षण एवं पुनर्स्थापन की आवश्यकता है।
मेरा सुझाव है कि समय के साथ जन जैव विविधता रजिस्टर को भौगोलिक सूचना प्रणाली, विश्वविद्यालयों, नागरिक विज्ञान और आधुनिक डिजिटल साधनों से जोड़ा जा सकता है, लेकिन पारंपरिक ज्ञान और आनुवंशिक संसाधनों के संबंध में स्थानीय समुदायों के अधिकारों की पूर्ण सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी होगी।
इसी से जुड़ा है लाभ-साझेदारी का सिद्धांत। यदि किसी जैविक संसाधन या पारंपरिक ज्ञान से लाभ उत्पन्न होता है, तो उस संसाधन के संरक्षण में योगदान देने वाले समुदायों को भी उचित लाभ मिलना चाहिए।
यह केवल कानूनी अनुपालन नहीं; यह पारिस्थितिक न्याय और सामाजिक न्याय है। लाभ-साझेदारी से प्राप्त संसाधनों का उपयोग जैव विविधता संरक्षण, क्षतिग्रस्त आवासों के पुनर्स्थापन, स्थानीय आजीविका और संस्थागत क्षमता को मजबूत करने में होना चाहिए।
विश्व पर्यावरण दिवस 2026 पर राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण द्वारा लाभ-साझेदारी को प्रोत्साहित करने वाली स्वैच्छिक प्रमाणन योजना की शुरुआत तथा जैविक अनुक्रम संबंधी डिजिटल सूचना जैसे नए विषयों पर भारतीय दृष्टिकोण को आगे बढ़ाना इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
हमें आदिवासी और पारंपरिक ज्ञान को भी संरक्षण का महत्वपूर्ण आधार मानना होगा। किसान, जनजातीय समुदाय, वनवासी, पशुपालक, मछुआरे और ग्रामीण महिलाएँ सदियों के अनुभव से विकसित ज्ञान की अमूल्य धरोहर रखते हैं। जब प्रयोगशाला का विज्ञान और समुदाय का अनुभव एक-दूसरे से जुड़ते हैं, तो संरक्षण अधिक प्रभावी बनता है।
भारत ने राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति एवं कार्ययोजना 2024-2030 को कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा के अनुरूप तैयार किया है। इसमें 23 राष्ट्रीय जैव विविधता लक्ष्य और उनकी प्रगति मापने के लिए 142 राष्ट्रीय संकेतक निर्धारित किए गए हैं।
मेरा मानना है कि लक्ष्य तभी सफल होंगे जब वे राज्य, जिला, पंचायत और स्थानीय स्तर पर वास्तविक कार्रवाई में बदलेंगे। दिल्ली में बनी नीति को धरातल पर परिणाम में बदलने वाली संस्थाएँ आप हैं। इसलिए राज्य जैव विविधता बोर्डों और संघ राज्य क्षेत्र जैव विविधता परिषदों की भूमिका आने वाले वर्षों में और अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है।
आज भारत में संरक्षण बुनियादी ढांचा भी मजबूत हुआ है। मार्च 2026 की राष्ट्रीय जैव विविधता रिपोर्ट के अनुसार देश में वन और वृक्ष आवरण 8.27 लाख वर्ग किलोमीटर तक पहुँच गया है, जो भारत के सम्पूर्ण भौगोलिक क्षेत्रफल का 25.17 प्रतिशत है।
आज देश में 58 टाइगर रिजर्व, 33 एलिफेंट रिजर्व, 18 बायोस्फियर रिजर्व, 106 राष्ट्रीय उद्यान और 574 वन्यजीव अभयारण्य हैं। देश में अनुमानित 3,682 बाघ हैं जो विश्व के कुल बाघों की आबादी का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा है। पहली राष्ट्रीय नदी डॉल्फिन गणना में 6,327 नदी डॉल्फिन दर्ज की गईं। ये उपलब्धियाँ बताती हैं कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक प्रबंधन और जनभागीदारी साथ आएँ तो सकारात्मक परिणाम संभव हैं।
लेकिन संरक्षण केवल बाघ और हाथी जैसी प्रसिद्ध प्रजातियों तक सीमित नहीं हो सकता। मधुमक्खी, तितली, मेंढक और मिट्टी के सूक्ष्म जीव भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। “प्रकृति की पुस्तक में कोई भी पृष्ठ अनावश्यक नहीं होता।”
मित्रों,
पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। पर्यावरण के लिए जीवनशैली अभियान Mission LiFE – Lifestyle For Environment ने इसे प्रत्येक नागरिक की दैनिक आदतों से जोड़ा है। ऊर्जा और जल की बचत, कचरा कम करना, ई-कचरे का जिम्मेदार प्रबंधन, सिंगल यूज़ प्लास्टिक से दूरी और टिकाऊ जीवनशैली इसके महत्वपूर्ण भाग हैं।
हमारे देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी का “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान भी जनभागीदारी का सुंदर उदाहरण है। जुलाई 2026 तक इस अभियान के अंतर्गत 272 करोड़ से अधिक पौधे लगाए जा चुके थे। लेकिन, “पेड़ लगाना पहला कदम है; पेड़ बचाना असली सफलता है।” इसलिए पौधारोपण की संख्या के साथ उनके जीवित रहने की दर, देशी प्रजातियों और स्थानीय पारिस्थितिकी को भी महत्व देना होगा।
हमें विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, युवाओं, किसानों, महिलाओं और नगर निकायों को जैव विविधता संरक्षण से जोड़ना होगा। विद्यालयों में जैव विविधता क्लब, प्रकृति भ्रमण, पक्षी अवलोकन, वेट्लैंड भ्रमण और स्थानीय प्रजातियों का दस्तावेजीकरण बच्चों में पर्यावरणीय नागरिकता विकसित कर सकते हैं।
आधुनिक तकनीक जैसे ए.आई., भौगोलिक सूचना प्रणाली, दूरसंवेदी तकनीक, ड्रोन, पर्यावरणीय डीएनए और आँकड़ा विश्लेषण जैव विविधता के मानचित्रण और निगरानी में हमारी सहायता कर सकती है। लेकिन हमें यह याद रखना है कि तकनीक हमें जंगल को समझने में मदद कर सकती है, लेकिन वह एक जंगल का निर्माण नहीं कर सकती। वैज्ञानिक आँकड़े हमें प्रजातियों के विलुप्त होने की पूर्व चेतावनी दे सकते हैं, लेकिन उन्हें बचाने का संकल्प और वास्तविक निर्णय मनुष्य को ही लेना होगा। इसलिए, प्रकृति के सफल संरक्षण के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि आधुनिक प्रौद्योगिकी और मानवीय उत्तरदायित्व दोनों एक साथ कदम मिलाकर चलें।
साथियो,
राज्य जैव विविधता बोर्डों और संघ राज्य क्षेत्र जैव विविधता परिषदों के समक्ष जो कार्य है, वह भले ही चुनौतीपूर्ण है, लेकिन यह हमारे लिए एक असाधारण अवसर भी है।
हमें केवल दस्तावेजीकरण से आगे बढ़कर धरातल पर कार्रवाई करनी होगी, नियमन से आगे बढ़कर साझेदारी विकसित करनी होगी, और केवल ‘जैव विविधता के संरक्षण’ से आगे बढ़कर ‘जनभागीदारी के साथ संरक्षण’ की दिशा में बढ़ना होगा।
हमें राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, राज्य जैव विविधता बोर्डों, संघ राज्य क्षेत्र जैव विविधता परिषदों, जैव विविधता प्रबंधन समितियों, पंचायती राज संस्थाओं, शहरी स्थानीय निकायों, अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों और स्थानीय समुदायों के बीच समन्वय को और अधिक सुदृढ़ करना होगा।
इसके साथ ही, हमें जैव विविधता को मुख्यधारा की विकास योजनाओं जैसे कृषि, जल प्रबंधन, बुनियादी ढांचे, शहरी नियोजन, पर्यटन, स्वास्थ्य और ग्रामीण आजीविका में भी आवश्यक रूप से शामिल करना होगा।
हमें यह सदैव याद रखना चाहिए कि विलुप्त होने वाली हर प्रजाति, नष्ट होने वाला हर वेट्लैंड और लुप्त होने वाली हर पारंपरिक किस्म, एक ऐसी अपूरणीय क्षति है जिसकी भरपाई करना शायद कभी संभव न हो। वहीं दूसरी ओर, पुनर्जीवित किया गया हर पारिस्थितिकी तंत्र, संरक्षित की गई हर प्रजाति, सशक्त की गई हर जैव विविधता प्रबंधन समिति और जैव विविधता से लाभान्वित होने वाला हर समुदाय, हमें भविष्य के लिए एक नई आशा देता है।
मैं राज्य जैव विविधता बोर्डों और संघ राज्य क्षेत्र जैव विविधता परिषदों को निरंतर वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण की हृदय से सराहना करना चाहूँगा। इस सहायता ने उनकी संस्थागत क्षमताओं को मजबूत करने और उन्हें अपने वैधानिक दायित्वों का प्रभावी ढंग से निर्वहन करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
भारत की जैव विविधता एक अनमोल राष्ट्रीय संपत्ति है। हमारी जिम्मेदारी केवल इसे विरासत में पाना नहीं है, बल्कि इसे आने वाली पीढ़ी को उस रूप से कहीं अधिक समृद्ध, स्वस्थ और सुरक्षित रूप में सौंपना है, जिस रूप में यह हमें प्राप्त हुई थी।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस 16वीं राष्ट्रीय बैठक के विचार-विमर्श से व्यावहारिक समाधान निकलेंगे, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच सहयोग मजबूत होगा, और देश भर में जैविक विविधता ढांचे के कार्यान्वयन में और अधिक सुधार आएगा।
मैं एक बार फिर पंजाब में आप सभी विशिष्ट प्रतिनिधियों का स्वागत करता हूँ और राज्य जैव विविधता बोर्डों तथा संघ राज्य क्षेत्र जैव विविधता परिषदों की इस 16वीं राष्ट्रीय बैठक की अपार सफलता की कामना करता हूँ।
आइए, हम सब मिलकर यह सुनिश्चित करने के लिए कार्य करें कि भारत की जैविक संपदा आने वाली पीढ़ियों के लिए पारिस्थितिक सुरक्षा, संधारणीय आजीविका और न्यायसंगत विकास का एक मजबूत आधार बने।
इसी कामना के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूं।
बहुत-बहुत धन्यवाद,
जय हिन्द! जय भारत!