SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF AI BASED VICE CHANCELLORS’ CONFERENCE AT CHANDIGARH ON SEPTEMBER 12, 2026.

ए.आई. आधारित ‘ वाइस चांसलर कॉन्फ्रेंस’ के अवसर पर

राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 12.09.2026, शनिवारसमयः सुबह 10:00 बजेस्थानः पंजाब लोकभवन

 

नमस्कार!

आज के इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में आप सभी के साथ उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। मैं इस अवसर पर सभी वक्ताओं, विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और कुलपतियों का अभिनंदन करता हूँ।

मेरे विचार से आज की चर्चा भारत के भविष्य की चर्चा है। आज हम उस पीढ़ी की बात कर रहे हैं जो आने वाले 20-25 वर्षों में भारत को नेतृत्व देगी और विकसित भारत के सपने को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

साथियो,

इतिहास में कुछ ऐसे अवसर आते हैं जब पूरी दुनिया का काम करने का तरीका बदल जाता है। एक समय कृषि क्रांति आई। फिर औद्योगिक क्रांति आई। उसके बाद सूचना और डिजिटल क्रांति आई। और आज हम ’’ए.आई. यानी आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस की क्रांति’’ के दौर में प्रवेश कर चुके हैं।

 

यह हमारे सोचने, सीखने, काम करने, शोध करने और निर्णय लेने के तरीकों को बदल रही है। जिस प्रकार बिजली ने 20वीं सदी की अर्थव्यवस्था को बदल दिया था, उसी प्रकार ए.आई. आने वाले दशकों की अर्थव्यवस्था और समाज को नई दिशा देने वाली तकनीक बन सकती है। इसलिए आज हमारे विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।

मैं चाहता हूँ कि हमारे विश्वविद्यालय ए.आई. को केवल एक तकनीकी विषय के रूप में न देखें, बल्कि इसे समाज की वास्तविक समस्याओं के समाधान का माध्यम बनाएं। हमारे विद्यार्थी और शोधकर्ता ऐसे मॉडल विकसित करें जो किसानों की सहायता करें, रोगों का शीघ्र निदान करें, जल संरक्षण में मदद करें और शासन व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाएं। 

साथियो,

आम तौर पर यह माना जाता है कि ए.आई. केवल इंजीनियरिंग और कंप्यूटर विज्ञान का विषय है। लेकिन ए.आई. चिकित्सा में है। कृषि में है। कानून में है। व्यापार और वित्त में है। भाषा, साहित्य, खेल और सामाजिक विज्ञानों में भी अपनी जगह बना रही है।

मैं सभी कुलपतियों से आग्रह करना चाहूँगा कि विश्वविद्यालयों में बहुविषयक ए.आई. शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए। हर संकाय और हर विभाग में ए.आई. के उपयोग की संभावनाओं को तलाशा जाए।

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में लाई गई ’’राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020’’ ने भी शिक्षा को अधिक बहुविषयक, कौशल आधारित, शोधपरक और तकनीक-सक्षम बनाने पर जोर दिया है। 

साथियो,

हमारे लाखों विद्यार्थी ऐसे हैं जिन्होंने अपनी शिक्षा उस समय शुरू की थी, जब ए.आई. आज की तरह व्यापक नहीं थी। इसलिए हमें ब्रिज कोर्स, सर्टिफिकेट कोर्स, अल्पकालिक प्रशिक्षण और पुनः-कौशल कार्यक्रमों को बढ़ावा देना चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि केवल नए विद्यार्थी ही ए.आई. सीखें और पुरानी पीढ़ी पीछे रह जाए।

भारत सरकार के ’’इंडिया ए.आई. मिशन’’ में भविष्य के कौशल को भी एक प्रमुख आधार बनाया गया है। इसके माध्यम से ए.आई. की समझ और कौशल विकास को व्यापक स्तर पर बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। तकनीक का लोकतंत्रीकरण तभी सार्थक है, जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।

हम सबने अपने छात्र जीवन में भौतिकी, रसायन विज्ञान और जीव विज्ञान की प्रयोगशालाएँ देखी हैं। अब समय आ गया है कि विश्वविद्यालय ए.आई. प्रयोगशालाओं को भी उतना ही महत्व दें। विद्यार्थियों को केवल किताबों से 

ए.आई. न पढ़ाया जाए। उन्हें प्रयोग करने दिए जाएँ। उन्हें मॉडल बनाने दिए जाएँ। उन्हें समस्याओं के समाधान खोजने दिए जाएँ। इसी प्रक्रिया से नवाचार पैदा होगा।

मित्रों,

आज अधिकांश बड़े ए.आई. प्लेटफॉर्म और मॉडल विदेशों में विकसित हुए हैं। हम उनका उपयोग अवश्य करें, उनसे सीखें भी, लेकिन हमें केवल उपभोक्ता बनकर नहीं रहना चाहिए। भारत ज्ञान, प्रतिभा और युवाशक्ति से सम्पन्न राष्ट्र है। हमारी भाषाएँ, हमारी संस्कृति, हमारी आवश्यकताएँ और हमारी परिस्थितियाँ विशिष्ट हैं।

इसलिए हमें अपने ए.आई. मॉडल विकसित करने होंगे। ऐसे मॉडल जो भारतीय भाषाओं को समझें, जो भारत की समस्याओं का समाधान करें और जो भारतीय मूल्यों और आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाए जाएँ। 

भारत सरकार की ’’भारतजेन’’ जैसी पहल भारतीय भाषाओं और भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ए.आई. की क्षमता विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। तकनीक तभी सच्चे अर्थों में समावेशी होगी, जब वह भारत की हर भाषा और हर नागरिक तक पहुँचेगी। 

मित्रों,

विज्ञान के इतिहास में हर बड़ी छलांग ने हमारे सामने एक नया मोड़ ला खड़ा किया है। जैसे आज मिसाइल और एंटी-मिसाइल तथा ड्रोन और एंटी-ड्रोन तकनीकों का यह युग हमें यह याद दिलाता है कि हर आक्रामक तकनीक के साथ उसके बचाव और संतुलन का उपाय खोजना भी उतना ही अनिवार्य है।

 

आज असली प्रश्न यह नहीं कि भविष्य में ए.आई. क्या कर सकता है, प्रश्न यह है कि वर्तमान में हम ए.आई. के साथ क्या करते हैं। ऐसे प्रश्न मानवता के सामने पहले भी आए हैं। सबसे सशक्त उदाहरण है परमाणु ऊर्जा, हमने उसका विनाश भी देखा है, और सकारात्मक योगदान भी। 

ए.आई. भी एक परिवर्तनकारी शक्ति है। दिशाहीन हुई तो विध्वंस, सही दिशा मिली तो समाधान। इस तकनीक को मशीन-केंद्रित से मानव-केंद्रित कैसे बनाएं, संवेदनशील और उत्तरदायी कैसे बनाएं, यही हमारा उद्देश्य होना चाहिए।

ए.आई. जितनी बड़ी शक्ति है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी है। ए.आई. के साथ निजता, आंकड़ों की सुरक्षा, पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और निष्पक्षता जैसे विषय अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। कृत्रिम रूप से बनाए गए नकली वीडियो, गलत सूचना, नकली आवाज़ और भ्रामक सामग्री जैसी चुनौतियाँ हमारे सामने हैं। इसलिए हमें विद्यार्थियों को केवल यह नहीं सिखाना है कि ए.आई. से क्या किया जा सकता है, बल्कि यह भी सिखाना है कि ए.आई. से क्या किया जाना चाहिए और क्या नहीं किया जाना चाहिए। 

ए.आई. के युग में ’साइबर सुरक्षा’ का महत्व भी कई गुना बढ़ गया है। आज साइबर अपराध केवल सूचना-प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों की समस्या नहीं है। नकली वेबसाइट, ऑनलाइन धोखाधड़ी, डेटा चोरी, नकली वीडियो और पहचान की चोरी जैसी चुनौतियाँ आम नागरिक तक पहुँच चुकी हैं। इसलिए विश्वविद्यालयों में साइबर सुरक्षा के विशेष पाठ्यक्रम, प्रयोगशालाएँ और जागरूकता कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए। आज राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा और व्यक्तिगत सुरक्षा, तीनों का संबंध साइबर सुरक्षा से जुड़ चुका है।

मित्रों,

यदि भारत को विश्व में नेतृत्व करना है तो हमें ’’शोध आधारित विकास’’ की ओर बढ़ना होगा। सरकार ने इस दिशा में ’’अनुसंधान राष्ट्रीय शोध फाउंडेशन’’ की स्थापना की है। इसका उद्देश्य शोध, नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देना तथा विश्वविद्यालयों, उद्योग और सरकार के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना है।

इसी प्रकार ’’एक राष्ट्र, एक सदस्यता’’ के माध्यम से देश के उच्च शिक्षण और शोध संस्थानों के विद्यार्थियों तथा शोधकर्ताओं को बड़ी संख्या में अंतरराष्ट्रीय शोध-पत्रिकाओं तक पहुँच उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कि जिस देश के विश्वविद्यालय शोध करते हैं, वही देश भविष्य की दिशा तय करता है।

साथियो,

आज हमने डॉ. हरपाल ठेठी जी के विचार भी सुने। उन्होंने विश्वविद्यालयों और उद्योग जगत के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर महत्वपूर्ण बातें रखीं। अक्सर उद्योग कहता है, ’’हमें योग्य और प्रशिक्षित युवा नहीं मिल रहे।’’ और दूसरी ओर विद्यार्थी कहते हैं, ’’हमें रोजगार नहीं मिल रहा।’’ 

जब दोनों पक्ष अपनी-अपनी जगह सही बात कह रहे हों, तो हमें समझना होगा कि कहीं न कहीं कौशल और उद्योग की आवश्यकता के बीच अंतर है। इस अंतर को विश्वविद्यालय, उद्योग और सरकार मिलकर समाप्त कर सकते हैं।

विश्वविद्यालयों में व्यावहारिक प्रशिक्षण, अप्रेंटिसशिप, उद्योग आधारित परियोजनाएँ, उद्योग विशेषज्ञों का मार्गदर्शन, कौशल आधारित पाठ्यक्रम और पाठ्यक्रमों में समय अनुसार बदलाव को और बढ़ावा देना चाहिए। 

साथियो,

भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है। हमारे युवाओं में ऊर्जा है। प्रतिभा है। सपने हैं। और सबसे बड़ी बात, कुछ नया करने की इच्छा है। इसलिए विश्वविद्यालयों को उद्यमिता और नए व्यवसाय की संस्कृति को बढ़ावा देना होगा। 

हमें विद्यार्थियों से कहना होगा कि नौकरी पाने के साथ-साथ दूसरों के लिए रोजगार पैदा करने का भी सपना देखें, क्योंकि नवाचार की शुरुआत संस्थानों से नहीं, बल्कि ’जिज्ञासा’ से होती है। 

इसीलिए सरकार ने सरकारी स्कूलों में ’’50 हजार अटल प्रयोगशालाएँ’’ स्थापित करने की पहल की है, ताकि बच्चों में जिज्ञासा, रचनात्मकता और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा मिले। 

हमें स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक एक ऐसी ’नवाचार की श्रृंखला’ बनानी होगी, जिसमें बच्चा सवाल पूछे, प्रयोग करे, असफल हो और फिर दोबारा प्रयास करे। क्योंकि असफलता अंत नहीं; सफलता की पहली सीढ़ी है।

साथियो,

मेरा विश्वास है कि ए.आई. चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, वह एक शिक्षक का स्थान नहीं ले सकता। ए.आई. जानकारी दे सकता है, लेकिन ’’दिशा कौन देगा?’’ ए.आई. उत्तर दे सकता है, लेकिन ’’सही प्रश्न पूछना कौन सिखाएगा?’’ ए.आई. आंकड़ों का विश्लेषण कर सकता है, लेकिन ’’उस ज्ञान का उपयोग मानव कल्याण के लिए कैसे करना है, यह शिक्षक और समाज ही सिखाएगा।’’

इसलिए भविष्य में शिक्षक की भूमिका कम नहीं होगी, बल्कि और महत्वपूर्ण होगी। हमें अपने शिक्षकों को भी नई तकनीकों, ए.आई. और डिजिटल शिक्षा पद्धति का प्रशिक्षण देना होगा।

मित्रों,

वर्ष 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य केवल सरकारों के प्रयासों से पूरा नहीं होगा। इसमें हमारे विश्वविद्यालयों की ’’केंद्रीय भूमिका’’ होगी। यहीं से नए विचार निकलेंगे। यहीं से नई तकनीकें विकसित होंगी। यहीं से वैज्ञानिक और शोधकर्ता तैयार होंगे। यहीं से उद्यमी निकलेंगे। यहीं से प्रशासक, न्यायविद्, शिक्षक और राष्ट्रनिर्माता तैयार होंगे।

इसलिए हमें ऐसे विश्वविद्यालय बनाने होंगे जो केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के संस्थान हों। हमें ऐसे परिसर चाहिए जहाँ ज्ञान हो, लेकिन ज्ञान के साथ संस्कार भी हों। तकनीक हो, लेकिन तकनीक के साथ मानवता भी हो। नवाचार हो, लेकिन नवाचार के साथ जिम्मेदारी भी हो। प्रतिस्पर्धा हो, लेकिन प्रतिस्पर्धा के साथ सहयोग भी हो।

मित्रों,

पंजाब की अपनी एक विशेष पहचान है। यह भूमि मेहनत की है। यह भूमि नवाचार की है। यह भूमि उद्यमिता की है। यह भूमि युवाशक्ति की है। हमारे विश्वविद्यालयों को कृषि तकनीक, जैव प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा, स्वच्छ ऊर्जा, जल प्रबंधन, साइबर सुरक्षा, ए.आई. और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में शोध और नवाचार के नए केंद्र विकसित करने चाहिए।

पंजाब की कृषि से जुड़ी समस्याएँ हों, भूजल संरक्षण हो, पराली प्रबंधन हो, स्वास्थ्य सेवाएँ हों या औद्योगिक उत्पादकता, हमारे विश्वविद्यालय स्थानीय समस्याओं को वैश्विक समाधान में बदल सकते हैं। 

मित्रों,

दुनिया में वही राष्ट्र आगे बढ़ेगा जो ज्ञान में निवेश करेगा, शोध को सम्मान देगा, नवाचार को प्रोत्साहित करेगा और युवाओं पर विश्वास करेगा।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का मंत्र है, “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास।” इसी भावना को शिक्षा और नवाचार के क्षेत्र में भी लागू करना होगा। 

मैं आज इस मंच से हमारे युवाओं से कहना चाहता हूँ कि बड़े सपने देखिए। नई चीजें सीखिए। प्रयोग करने से मत डरिए। असफलता से मत घबराइए। और अपनी प्रतिभा को केवल अपने लिए नहीं, बल्कि देश के लिए उपयोग कीजिए। क्योंकि युवा केवल भारत का भविष्य नहीं हैं; युवा आज के भारत की सबसे बड़ी शक्ति हैं। 

मुझे विश्वास है कि आज की यह चर्चा केवल इस सभागार तक सीमित नहीं रहेगी। आज यहाँ से निकले विचार पंजाब के प्रत्येक विश्वविद्यालय तक पहुँचेंगे। हम मिलकर ऐसी शिक्षा व्यवस्था का निर्माण करेंगे जो आधुनिक भी हो और मानवीय भी; तकनीकी भी हो और मूल्यपरक भी; रोजगारपरक भी हो और राष्ट्रनिर्माणकारी भी।

हम ऐसा भारत बनाएँगे जो ए.आई. का केवल उपयोग न करे, बल्कि ए.आई. के क्षेत्र में नेतृत्व करे। ऐसा भारत जो तकनीक को अपनाए, लेकिन अपनी संस्कृति और मानवीय मूल्यों को कभी न छोड़े। और ऐसा भारत, जो 2047 में केवल आर्थिक रूप से विकसित न हो, बल्कि ’’ज्ञान, विज्ञान, नवाचार, नैतिकता और मानवता के क्षेत्र में भी विश्व का मार्गदर्शन करे।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं आप सभी को इस महत्वपूर्ण सम्मेलन के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।

बहुत-बहुत धन्यवाद।

जय हिन्द!

जय भारत!