SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF THE ITBP DISASTER MANAGEMENT SEMINAR AT CHANDIGARH ON SEPTEMBER 17, 2026.
- by Admin
- 2026-09-17 13:05
आई.टी.बी.पी. के ‘आपदा प्रबंधन संगोष्ठी’ के अवसर पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 17.09.2026, गुरूवार समयः सुबह 11:00 बजे स्थानः चंडीगढ़
नमस्कार!
आज के इस अत्यंत महत्वपूर्ण दो दिवसीय ‘आपदा प्रबंधन संगोष्ठी’ के उद्घाटन अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे अपार प्रसन्नता हो रही है।
17 और 18 सितंबर को आयोजित हो रही यह संगोष्ठी आपदा प्रबंधन से जुड़े विभिन्न संस्थानों, विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं को एक साझा मंच पर लाने का महत्वपूर्ण प्रयास है। मुझे विश्वास है कि यहां होने वाला संवाद हमारे देश की आपदा-पूर्व तैयारी, जोखिम न्यूनीकरण, राहत, बचाव, पुनर्वास और क्षमता निर्माण को अधिक प्रभावी बनाने में सहायक सिद्ध होगा।
मैं इस महत्वपूर्ण संयुक्त संगोष्ठी के आयोजन के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एन.डी.एम.ए.) और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आई.टी.बी.पी.) को हार्दिक बधाई देता हूं। साथा ही, देश के विभिन्न भागों से आए विशेषज्ञों, वरिष्ठ अधिकारियों, प्रशिक्षकों, शोधकर्ताओं, युवा प्रतिभागियों और आपदा प्रबंधन से जुड़े सभी प्रतिनिधियों का अभिनंदन।
आज की इस संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य विभिन्न हितधारकों के बीच आपसी समन्वय और संवाद को बढ़ाना है। आपदा के समय एक सेकेंड की देरी भी भारी पड़ सकती है। इसलिए, केंद्र सरकार, राज्य सरकार, नागरिक प्रशासन और सुरक्षा बलों के बीच निरंतर संवाद और त्वरित प्रतिक्रिया होना अनिवार्य है। हम सब जानते हैं कि ‘‘अकेले हम बहुत थोड़ा कर सकते हैं, साथ मिलकर हम बहुत कुछ कर सकते हैं।’’
साथियो,
हमारी भारतीय संस्कृति ने सदैव मानव-जीवन की रक्षा और संकट में सहायता करने को सर्वाेच्च धर्म माना है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है, “परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीड़नम्।” अर्थात्, दूसरों की सहायता करना पुण्य है और दूसरों को पीड़ा पहुंचाना पाप है।
आपदा के समय राहत एवं बचाव कार्यों में लगे हमारे जवान, अधिकारी, चिकित्सक, स्वयंसेवक और स्थानीय नागरिक इसी सेवा-भावना के सबसे उज्ज्वल उदाहरण हैं। मैं उनके साहस, समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा को नमन करता हूँ।
प्रकृति कब कौन सा रूप ले ले, यह कोई नहीं जानता। तूफान, बाढ़, भूकंप या भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाएँ बिना किसी पूर्व सूचना के आती हैं और अपने पीछे भारी तबाही छोड़ जाती हैं। ऐसे समय में हमारा सबसे बड़ा संबल हमारी तैयारी, हमारा अनुशासन और हमारा आपसी तालमेल होता है। जैसा कि कहा भी गया है, ‘‘आपदा को टाला तो नहीं जा सकता, लेकिन सही तैयारी और समय पर कदम उठाकर उसके विध्वंस को अवश्य कम किया जा सकता है।’’
जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम संबंधी घटनाओं की प्रकृति, तीव्रता और अनिश्चितता लगातार बढ़ती जा रही है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण हाल ही में नेपाल और हमारे अपने पहाड़ी क्षेत्रों में देखने को मिला है। तेजी से बढ़ता शहरीकरण, प्राकृतिक जल निकासी मार्गों पर अतिक्रमण, अनियोजित निर्माण और पर्यावरणीय असंतुलन आपदाओं के प्रभाव को और गंभीर बना सकते हैं।
ऐसी परिस्थितियों में हमें यह समझना होगा कि प्रत्येक प्राकृतिक घटना आपदा नहीं होती। कोई घटना तब आपदा का रूप लेती है, जब हमारी आबादी, बुनियादी ढांचा और व्यवस्थाएं उसके सामने असुरक्षित होती हैं। इसलिए आपदा प्रबंधन का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य केवल घटना के बाद सहायता पहुंचाना नहीं, बल्कि आपदा के जोखिम और संभावित नुकसान को पहले ही कम करना है।
साथियो,
किसी बड़ी आपदा से अकेला कोई एक विभाग या संस्था नहीं निपट सकती। इसमें जिला प्रशासन, पुलिस, अग्निशमन सेवा, स्वास्थ्य विभाग, स्थानीय निकाय, सेना, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, नागरिक सुरक्षा, संचार संस्थान, बिजली और जलापूर्ति विभाग, गैर-सरकारी संगठन, मीडिया, वैज्ञानिक संस्थान तथा स्थानीय समुदाय, सभी की भूमिका होती है।
यदि ये एजेंसियाँ अलग-अलग दिशा में काम करेंगी, तो संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेंगे। लेकिन यदि इनके बीच पहले से समन्वय, स्पष्ट कमान व्यवस्था, साझा संचार प्रणाली और नियमित अभ्यास हो, तो सीमित संसाधनों में भी अनेक जीवन बचाए जा सकते हैं। इसलिए आपदा के समय पहली बार परिचय करने के बजाय सभी संबंधित संस्थाओं को पहले से एक-दूसरे की कार्यप्रणाली, क्षमताओं और संसाधनों की जानकारी होनी चाहिए।
मैं इस संदर्भ में तीन छोटे सूत्र सामने रखना चाहूँगा। पहला, एक योजना। दूसरा, एक समन्वित टीम। और तीसरा, एक स्पष्ट उद्देश्यः प्रत्येक जीवन की रक्षा।
संयुक्त प्रशिक्षण, टेबल-टॉप अभ्यास, मॉक ड्रिल और क्षेत्रीय अभ्यास नियमित रूप से होने चाहिए। प्रत्येक अधिकारी को स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए कि संकट के समय किससे संपर्क करना है, किसके पास कौन-सा संसाधन है और किस स्तर पर कौन-सा निर्णय लिया जाना है। आपदा के समय अस्पष्टता और भ्रम के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
साथियो,
भारत-तिब्बत सीमा पुलिस का इस क्षेत्र में विशेष स्थान है। दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों, अत्यधिक ऊँचाई, बर्फीले मौसम, हिमस्खलन, भूस्खलन, बाढ़ और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में कार्य करने का आईटीबीपी के पास व्यापक अनुभव है।
आईटीबीपी के हिमवीर केवल हमारी सीमाओं की रक्षा ही नहीं करते, बल्कि प्राकृतिक आपदाओं, दुर्घटनाओं और अन्य संकटों के समय राहत एवं बचाव कार्यों में भी तत्पर रहते हैं। अनुशासन, साहस, शारीरिक क्षमता, त्वरित निर्णय और सीमित संसाधनों में कार्य करने की उनकी क्षमता देश की महत्वपूर्ण शक्ति है।
मुझे प्रसन्नता है कि पंचकूला स्थित राष्ट्रीय खोज, बचाव एवं आपदा प्रतिक्रिया प्रशिक्षण संस्थान अपने प्रशिक्षण अनुभव, तकनीकी ज्ञान और संस्थागत क्षमता के माध्यम से देश की आपदा प्रतिक्रिया प्रणाली को मजबूत करने में योगदान दे रहा है।
प्रशिक्षण केवल उपकरण चलाना सीखना नहीं है। यह आत्मविश्वास, टीम भावना, अनुशासन, नेतृत्व और संकट के समय सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करता है। इस दिशा में ‘ट्रेन टू ट्रेनर‘ यानी ‘प्रशिक्षकों को प्रशिक्षित करने’ की व्यवस्था उपयोगी हो सकती है। प्रशिक्षित अधिकारियों के माध्यम से पुलिस, अग्निशमन सेवाओं, एस.डी.आर.एफ., होमगार्ड, नागरिक सुरक्षा संगठनों और सामुदायिक स्वयंसेवकों तक यह क्षमता पहुँचाई जा सकती है।
साथियो,
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने नीति निर्माण, दिशा-निर्देश, जोखिम न्यूनीकरण और क्षमता निर्माण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया है। ‘आपदा मित्र’ जैसी पहल के माध्यम से सामुदायिक स्वयंसेवकों को प्रशिक्षण देना एक महत्वपूर्ण कदम है।
वर्तमान में देश में 1 लाख से अधिक प्रशिक्षित आपदा मित्र हैं, जिनमें 20 प्रतिशत महिलाएं ‘आपदा सखियाँ’ के रूप में शामिल हैं, और युवा आपदा मित्र योजना के तहत एनसीसी, एनएसएस तथा स्काउट्स जैसे प्रमुख संगठनों से ढाई लाख और युवाओं को प्रशिक्षित किया जा रहा है।
किसी आपदा के समय सबसे पहले घटनास्थल पर स्थानीय लोग ही उपस्थित होते हैं। इसलिए प्रशिक्षित स्थानीय नागरिक शुरुआती क्षणों में महत्वपूर्ण सहायता देकर अनेक जीवन बचा सकते हैं।
मेरा मानना है कि आपदा प्रबंधन केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। हर नागरिक की भागीदारी आवश्यक है। हर परिवार को अपने क्षेत्र के प्रमुख जोखिमों की जानकारी होनी चाहिए और प्राथमिक चिकित्सा सामग्री, आवश्यक दवाइयाँ, टॉर्च, महत्वपूर्ण दस्तावेजों की प्रतियाँ तथा आपातकालीन संपर्क नंबर जैसी आवश्यक तैयारियाँ रखनी चाहिए।
विद्यालयों, महाविद्यालयों, अस्पतालों, कार्यालयों, बाजारों और उद्योगों में आपदा प्रबंधन योजनाएँ केवल फाइलों तक सीमित न रहें; उनकी नियमित समीक्षा और मॉक ड्रिल होनी चाहिए।
महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और दिव्यांगजनों की विशेष आवश्यकताओं को भी आपदा योजनाओं में शामिल करना आवश्यक है।
साथियो,
आज ए.आई., ड्रोन, उपग्रह चित्र, भौगोलिक सूचना प्रणाली, दूरसंवेदी तकनीक, सेंसर और वास्तविक समय के आंकड़े आपदा प्रबंधन में नई संभावनाएँ पैदा कर रहे हैं। इनके माध्यम से जोखिम का पूर्व आकलन, प्रभावित क्षेत्रों की पहचान, पूर्व चेतावनी और राहत कार्यों की बेहतर योजना बनाई जा सकती है। लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि तकनीक मानव अनुभव का विकल्प नहीं है। आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षित मानवबल और स्थानीय ज्ञान का समन्वय ही सबसे प्रभावी परिणाम दे सकता है।
आपदा के दौरान सही सूचना भी जीवन बचाती है। इसलिए चेतावनी संदेश सरल, स्पष्ट, स्थानीय भाषा में और कार्रवाई योग्य होना चाहिए। गलत सूचना और अफवाहें संकट को और बढ़ा सकती हैं।
साथियो,
पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और चंडीगढ़ भौगोलिक और प्रशासनिक दृष्टि से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। हिमालयी क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा, बादल फटने या भूस्खलन का प्रभाव मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ और जलभराव के रूप में दिखाई दे सकता है।
इसलिए प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए क्षेत्रीय दृष्टिकोण आवश्यक है। प्राकृतिक आपदाएँ प्रशासनिक सीमाओं का पालन नहीं करतीं। पानी राज्य की सीमा पर नहीं रुकता, धुआँ जिले की सीमा नहीं पहचानता और भूकंप किसी एक शहर तक सीमित नहीं रहता।
इसलिए पड़ोसी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के बीच संसाधनों, प्रशिक्षित मानवबल, उपकरणों, अस्पतालों और आपातकालीन सेवाओं की जानकारी साझा करने की व्यवस्था तथा नियमित अंतर-राज्यीय अभ्यास हमारी सामूहिक क्षमता को मजबूत कर सकते हैं।
चंडीगढ़ जैसे नियोजित शहर में, जहाँ महत्वपूर्ण प्रशासनिक संस्थान, अस्पताल, शिक्षण संस्थान और बड़ी संख्या में सरकारी कार्यालय हैं, शहरी आपदा प्रबंधन और संस्थागत सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान आवश्यक है।
साथियो,
आपदा के बाद हमारा काम समाप्त नहीं होता। पुनर्वास, आजीविका की बहाली, स्वास्थ्य सेवाओं की पुनर्स्थापना और सुरक्षित पुनर्निर्माण भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। हमें केवल पहले जैसी स्थिति में लौटने के बजाय “बेहतर और अधिक सुरक्षित पुनर्निर्माण” का लक्ष्य रखना चाहिए।
हर आपदा और हर मॉक ड्रिल हमें कुछ सिखाती है। इसलिए प्रत्येक बड़ी घटना के बाद कार्य-पश्चात समीक्षा होनी चाहिए कि क्या अच्छा हुआ, कहाँ कमी रही और अगली बार क्या सुधार किया जा सकता है। गलती को छिपाना समाधान नहीं है; उससे सीखना ही संस्था की परिपक्वता है।
मेरा विश्वास है कि इस संगोष्ठी में होने वाला विचार-विमर्श केवल चर्चाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे ठोस सुझाव, व्यावहारिक कार्ययोजनाएँ और संस्थागत सहयोग के नए रास्ते निकलेंगे।
साथियो,
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में पिछले 12 वर्षों के दौरान आपदा प्रबंधन की सोच और कार्यप्रणाली में बुनियादी बदलाव आया है। पहले आपदाओं को केवल राहत और पुनर्वास के दृष्टिकोण से देखा जाता था, लेकिन आज हम जोखिम कम करने, पूर्व चेतावनी प्रणाली और ‘शून्य जनहानि’ के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। सरकार का उद्देश्य आपदा-रोधी गांवों और शहरों का निर्माण करना है।
आपदाओं से निपटने के लिए अपनाए गए ‘समग्र सरकार’ यानी 'Whole of Government' दृष्टिकोण के साथ हमें आपदा प्रबंधन व्यवस्था को और मजबूत करना होगा।
मोदी सरकार के कार्यकाल में ‘स्टेट डिज़ास्टर रिस्पाँस फंड’ का आवंटन लगभग चार गुना और ‘नेशनल डिज़ास्टर रिस्पाँस फंड’ का आवंटन लगभग तीन गुना बढ़ा है। पिछले 11 वर्षों में इस क्षेत्र पर करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं, जो एक बड़ी उपलब्धि है।
इसके साथ ही, 20 वर्षों बाद आपदा प्रबंधन अधिनियम में संशोधन किया गया है। शहरी आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों की अवधारणा प्रस्तुत कर ऐसे प्राधिकरण स्थापित किए गए हैं तथा राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर डिजिटल आपदा डेटाबेस तैयार करने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है।
मित्रो,
आपदा प्रबंधन अंततः केवल उपकरणों और तकनीक का विषय नहीं है। यह मानवीय संवेदना, सामूहिक जिम्मेदारी और सेवा भावना का विषय है। जब चारों ओर भय और निराशा होती है, तब बचाव दल को देखकर पीड़ित व्यक्ति के भीतर आशा पैदा होती है।
इसलिए मैं कहना चाहूँगा कि आपदा में बचाई गई हर जान, मानवता की जीत है। और जहाँ संकट सबसे बड़ा होता है, वहीं सेवा का अवसर भी सबसे बड़ा होता है।
आइए, हम सब संकल्प लें, आपदा आने से पहले तैयारी करेंगे, आपदा के समय एकजुट होकर कार्य करेंगे, प्रत्येक जीवन की रक्षा को सर्वाेच्च प्राथमिकता देंगे, और एक सुरक्षित, सक्षम तथा आपदा-सहिष्णु भारत का निर्माण करेंगे।
एक बार फिर, इस आयोजन से जुड़े सभी गणमान्य अतिथियों, विशेषज्ञों और बल के वीर जवानों का अभिनंदन करता हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि यहाँ होने वाली चर्चाएँ और निष्कर्ष देश के आपदा प्रबंधन ढांचे को और अधिक मज़बूत और संवेदनशील बनाएंगे।
बहुत-बहुत धन्यवाद।
जय हिन्द!
जय भारत!