SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF THE COMPETENT FOUNDATION’S SPORTS KIT DISTRIBUTION PROGRAMME AT CHANDIGARH ON SEPTEMBER 10, 2026.
- by Admin
- 2026-09-10 19:25
कंपीटेंट फाउंडेशन के ’खेल किट वितरण’ कार्यक्रम के अवसर पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 10.09.2026, गुरूवार समयः शाम 5:00 बजे स्थानः पंजाब लोकभवन
नमस्कार!
आज ‘कम्पीटेंट फाउंडेशन’ की “हँसते-खेलते” पहल के इस प्रेरणादायी अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे विशेष प्रसन्नता हो रही है। यह कार्यक्रम केवल खेल किट और उपकरण वितरित करने का कार्यक्रम नहीं है। मेरे लिए यह प्रतिभा पर विश्वास, समान अवसर, सामाजिक संवेदनशीलता और खेल के माध्यम से आत्मविश्वास पैदा करने का उत्सव है।
आज यहाँ उपस्थित हमारे खिलाड़ियों को देखकर सबसे पहले मेरे मन में यही विचार आता है कि सच्ची प्रतिभा कभी भी महंगे उपकरणों या साधनों की मोहताज नहीं होनी चाहिए। आर्थिक अभाव या शारीरिक परिस्थितियों के कारण किसी भी बच्चे या दिव्यांग खिलाड़ी का सपना अधूरा नहीं रहना चाहिए। हमारी इस पहल की सबसे बड़ी भावना और मूल उद्देश्य यही है, अवसरों को सीधे प्रतिभा तक पहुँचाना।
मुझे बताया गया है कि “हँसते-खेलते” पहल की शुरुआत वर्ष 2021 में हुई थी। शुरुआती 4 वर्षों में 12 सरकारी स्कूलों के ज़रूरतमंद 25-25 विद्यार्थियों को 600 स्कूल किट वितरित की गईं। इसके बाद शिक्षा विभाग के परामर्श से इस पहल को खेल प्रतिभाओं के प्रोत्साहन से जोड़ा गया और अब तक इस यात्रा में चंडीगढ़ के सरकारी विद्यालयों के 10 खेल विधाओं से जुड़े 350 से अधिक युवा खिलाड़ियों को खेल किट उपलब्ध कराई जा चुकी हैं।
मुझे यह जानकर और भी प्रसन्नता हुई कि इस पहल को सामान्य खिलाड़ियों तक सीमित नहीं रखा गया। GRIID (ग्रिड) जैसे संस्थानों को भी खेल उपकरण प्रदान किए गए और 17 ऐसे विशेष रूप से सक्षम खिलाड़ियों को खेल किट एवं उपकरण उपलब्ध कराए गए जिन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर अपनी प्रतिभा सिद्ध की है।
और आज मुझे यह देखकर अत्यंत संतोष हो रहा है कि इस पहल के शानदार छठे वर्ष में, आज 32 होनहार युवा एथलीटों को बैडमिंटन, टेनिस, एथलेटिक्स और फुटबॉल की खेल किट प्रदान की जा रही है।
समाज के हर वर्ग के सपनों को इस प्रकार उड़ान देने के इस पुनीत कार्य के लिए, मैं ‘कम्पीटेंट फाउंडेशन’ को हृदय से साधुवाद देता हूँ। दरअसल, सेवा और समर्पण का यह सिलसिला रातों-रात नहीं बना है; यह उन महान आदर्शों का ही सुफल है, जिसकी नींव वर्ष 2006 में श्रद्धेय स्वर्गीय श्री बलरामजी दास टंडन जी द्वारा रखी गई थी।
स्वर्गीय श्री बलरामजी दास टंडन जी 6 बार पंजाब से विधायक, 3 बार वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री और 1 बार पंजाब के उपमुख्यमंत्री रहे। उन्होंने जुलाई 2014 से अगस्त 2018 तक छत्तीसगढ़ के राज्यपाल के रूप में भी सेवाएँ दीं।
उनकी सेवा भावना को आगे बढ़ाते हुए कंपीटेंट फाउंडेशन पिछले 20 वर्षों से अधिक समय से रक्तदान शिविर, जरूरतमंद मरीजों की सर्जरी के लिए आर्थिक सहायता तथा पी.जी.आई. में हर महीने 10 नेत्र ऑपरेशन प्रायोजित करने जैसे सामाजिक कार्य कर रहा है। कोरोना महामारी के दौरान भी फाउंडेशन ने प्रशासन और आम लोगों को हरसंभव सहयोग दिया।
स्वर्गीय टंडन जी के निधन के बाद उनके पुत्र श्री संजय टंडन जी ने उनकी याद में ‘बलरामजी दास टंडन चैरिटेबल फाउंडेशन’ की स्थापना की तथा उनके विचारों और सेवा-भावना को आगे बढ़ाने के लिए ‘बलरामजी दास टंडन मेमोरियल लेक्चर’ की शुरुआत की, जिसका आयोजन पंजाब विश्वविद्यालय द्वारा प्रतिवर्ष किया जाता है। किसी महान व्यक्तित्व को सच्ची श्रद्धांजलि यही है कि उनके सेवा और जनकल्याण के मूल्यों को निरंतर आगे बढ़ाया जाए। इस दृष्टि से ये प्रयास अत्यंत सराहनीय हैं।
देवियो और सज्जनो,
आज इस मंच पर बैठे हमारे दिव्यांग खिलाड़ी हम सभी के लिए प्रेरणा हैं। उन्होंने हमें यह सिखाया है कि जीवन में चुनौतियाँ कितनी भी बड़ी क्यों न हों, इंसान की इच्छाशक्ति उनसे बड़ी हो सकती है। कई बार हम छोटी-सी परेशानी आने पर हार मान लेते हैं। लेकिन हमारे ये खिलाड़ी हमें बताते हैं कि सीमाएँ हमेशा शरीर की नहीं होतीं, कई बार वे हमारे मन में होती हैं।
जब भी मैं दिव्यांगजनों के अदम्य साहस को देखता हूँ, तो मुझे लगता है कि ‘विकलांगता’ केवल शरीर की एक अवस्था हो सकती है, लेकिन अगर इरादों में जान हो, तो इंसान पूरी दुनिया जीत सकता है।
हमारा इतिहास और वर्तमान ऐसे अनगिनत ‘दिव्यांग अचीवर्स’ से भरा पड़ा है, जिन्होंने दुनिया को हैरान किया है। याद कीजिए दीपा मलिक जी को, जिन्होंने कमर के नीचे लकवाग्रस्त होने के बावजूद पैरालंपिक खेलों में भारत के लिए मेडल जीतकर इतिहास रच दिया।
याद कीजिए भारत की अवनि लेखरा को, जिन्होंने व्हीलचेयर पर बैठकर शूटिंग में पैरालंपिक गोल्ड मेडल जीतकर तिरंगे की शान बढ़ाई। आप सभी ने कश्मीर की उस 16 वर्षीय बेटी शीतल देवी को देखा होगा, जिसके दोनों हाथ नहीं हैं, लेकिन उसने अपने पैरों से तीरंदाजी करके एशियन पैरा गेम्स में दो स्वर्ण पदक जीते और पूरी दुनिया को अचंभित कर दिया।
अरुणिमा सिन्हा अपने कृत्रिम पैर के सहारे माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली विश्व की पहली महिला दिव्यांग पर्वतारोही बनीं। देवेंद्र झाझरिया, जिन्होंने एक हाथ से दो बार पैरालंपिक में स्वर्ण पदक जीतकर विश्व रिकॉर्ड स्थापित किया। सुमित अंतिल ने भाला फेंक प्रतियोगिता में विश्व रिकॉर्ड के साथ पैरालंपिक स्वर्ण जीतकर यह सिद्ध किया कि दृढ़ निश्चय के सामने कोई बाधा टिक नहीं सकती।
और कौन भूल सकता है हमारे पहले पैरालंपिक स्वर्ण पदक विजेता मुरलीकांत पेटकर जी और बैडमिंटन कोर्ट पर अपनी रफ़्तार से दुनिया को मात देने वाले आईएएस अधिकारी सुहास यथिराज को। इन सभी ने यह साबित किया है कि शारीरिक सीमाएं, मानसिक दृढ़ता के सामने घुटने टेक देती हैं। आप 36 खिलाड़ी भी उन्हीं की तरह भारत के प्रेरणास्रोत हैं।
आज मैं आप सभी खिलाड़ियों से कहना चाहता हूँ कि किसी खेल मैदान पर हार-जीत से कहीं ज्यादा अहम आपका वहाँ होना है। दिव्यांगता आपकी कमजोरी नहीं, बल्कि आपकी पहचान, आपकी शक्ति और हर चुनौती को अवसर में बदलने की आपकी प्रेरणा है। मुझे एक बहुत ही सुंदर पंक्ति याद आती है, ‘‘मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।’’
आपका हौसला ही आपकी सबसे बड़ी ताकत है और आपका संघर्ष ही आपकी सबसे बड़ी जीत। आप इसी हौसले के साथ आगे बढ़ते रहें और अपनी सफलता से देश का नाम रोशन करते रहें।
साथियों,
खेल का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि खिलाड़ी कितने पदक जीतता है। खेल हमें अनुशासन सिखाता है। समय का महत्व सिखाता है। टीम भावना सिखाता है। हार को स्वीकार करना और फिर दोबारा प्रयास करना सिखाता है। खेल हमें यह भी सिखाता है कि जीत अंतिम मंजिल नहीं और हार अंतिम सत्य नहीं। खेल हमें गिरकर उठना सिखाता है। इसीलिए हमें बच्चों और युवाओं को खेलों से अधिक से अधिक जोड़ना चाहिए।
मेरा मानना है कि हमारे देश में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। कमी यदि कहीं है, तो कई बार वह अवसरों की होती है। कई बच्चे बहुत प्रतिभाशाली होते हैं, लेकिन उनके परिवार महंगे खेल उपकरण नहीं खरीद सकते। कई खिलाड़ी अच्छे प्रदर्शन की क्षमता रखते हैं, लेकिन उन्हें उचित प्रशिक्षण सुविधा नहीं मिलती। कई बार एक जोड़ी अच्छे जूते, एक सही रैकेट, एक उपयुक्त व्हीलचेयर, एक प्रशिक्षण उपकरण या एक प्रशिक्षक का सही मार्गदर्शन किसी खिलाड़ी के भविष्य को बदल सकता है।
मेरे प्यारे बच्चों,
आज मैं आपसे विशेष रूप से कुछ कहना चाहता हूँ। आपके हाथ में जो किट है, उसे केवल सामान मत समझिए। इसे एक अवसर समझिए। इसे एक जिम्मेदारी समझिए। इसे इस विश्वास का प्रतीक समझिए कि कोई आपके भीतर की प्रतिभा को पहचानता है।
अपने लक्ष्य तय कीजिए। अपने प्रशिक्षकों की बात सुनिए। अनुशासन को अपनी आदत बनाइए। अपने शरीर के साथ-साथ अपने मन को भी मजबूत बनाइए। और सबसे महत्वपूर्ण, अपनी तुलना किसी दूसरे खिलाड़ी से मत कीजिए। अपनी तुलना कल के अपने आप से कीजिए। यदि आप आज कल से बेहतर हैं, तो आप सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
महान मुक्केबाज मुहम्मद अली ने कहा था, “चैंपियन जिम में नहीं बनते; चैंपियन उस चीज से बनते हैं जो उनके भीतर होती है, एक इच्छा, एक सपना और एक दृष्टि।” यह बात हमारे सभी खिलाड़ियों पर लागू होती है। चैंपियन बनने की शुरुआत पदक से नहीं होती। चैंपियन बनने की शुरुआत उस दिन होती है, जब कोई खिलाड़ी कठिन परिस्थिति के बावजूद कहता है, मैं प्रयास करना नहीं छोड़ूँगा।
और महान बास्केटबॉल खिलाड़ी माइकल जॉर्डन की एक प्रसिद्ध पंक्ति है, “मैं बार-बार असफल हुआ हूँ, और इसी कारण मैं सफल हुआ हूँ।” हमारे खिलाड़ियों के लिए इसका संदेश बिल्कुल स्पष्ट है, हार से डरिए मत। हार को सीख में बदलिए।
आज मैं खिलाड़ियों के अभिभावकों को भी विशेष धन्यवाद देना चाहता हूँ। किसी खिलाड़ी की सफलता के पीछे केवल उसका अपना परिश्रम नहीं होता। उसके पीछे माता-पिता का त्याग होता है। उनकी चिंता होती है। उनका समय होता है। और सबसे बढ़कर उनका विश्वास होता है।
कई बार जब बच्चा अभ्यास के लिए सुबह जल्दी उठता है, तो परिवार भी उसके साथ उठता है। जब वह प्रतियोगिता के लिए दूसरे शहर जाता है, तो परिवार की चिंता भी उसके साथ जाती है। और जब वह हारकर लौटता है, तो परिवार ही उसे फिर से खड़ा करता है। इसलिए हर पदक के पीछे खिलाड़ी के साथ उसके परिवार की भी मेहनत होती है।
इसी प्रकार हमारे प्रशिक्षक भी खिलाड़ियों के जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक अच्छा कोच केवल तकनीक नहीं सिखाता। वह खिलाड़ी को स्वयं पर विश्वास करना सिखाता है।
हमें ऐसा खेल वातावरण बनाना होगा जहाँ दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए अलग सोच या अलग अपेक्षा न हो, बल्कि उन्हें समान अवसर और सम्मान मिले। हमारे खेल परिसर अधिक सुगम हों। प्रशिक्षण सुविधाएँ अधिक समावेशी हों। आवश्यक उपकरण आसानी से उपलब्ध हों। और दिव्यांग खिलाड़ियों को प्रतियोगिता, प्रशिक्षण तथा रोजगार के अवसरों से जोड़ने के लिए संस्थागत सहयोग मजबूत हो। समावेशिता केवल सुविधा देने का विषय नहीं है; यह सम्मान और समान अवसर का विषय है।
साथियो,
आज के संदर्भ में खेलों की एक और महत्वपूर्ण भूमिका है। हमारे युवाओं को नशे जैसी बुराइयों से दूर रखने के लिए खेल एक बहुत मजबूत माध्यम है। जिस युवा के पास लक्ष्य है, अभ्यास है, टीम है और मैदान है, उसके जीवन में नकारात्मक गतिविधियों के लिए जगह कम होती है।
आज जो खिलाड़ी खेल किट और उपकरण प्राप्त कर रहे हैं, मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि आपको खेल के उपकरण नहीं, वास्तव में आपको इससे कहीं बड़ी चीज मिली है। आपको यह संदेश मिला है कि समाज आपके साथ खड़ा है। आपको यह विश्वास मिला है कि आपकी मेहनत देखी जा रही है। और आपको यह अवसर मिला है कि आप अपने सपनों को और मजबूती से आगे बढ़ाएँ। इस अवसर को पूरी ईमानदारी और मेहनत से सार्थक बनाइए।
मैं चाहता हूँ कि आप आज यहाँ से केवल खेल किट लेकर न जाएँ। एक संकल्प लेकर जाएँ। संकल्प कि मैं अपनी पूरी क्षमता से मेहनत करूँगा। संकल्प कि मैं अपने परिवार और अपने प्रशिक्षकों का सम्मान करूँगा। संकल्प कि जीत मिलने पर विनम्र रहूँगा और हार मिलने पर हिम्मत नहीं हारूँगा। और सबसे महत्वपूर्ण, संकल्प कि मैं अपनी सफलता को केवल अपनी सफलता नहीं मानूँगा, बल्कि अपने जैसे दूसरे बच्चों के लिए भी प्रेरणा बनूँगा। क्योंकि एक खिलाड़ी का सबसे बड़ा योगदान केवल पदक जीतना नहीं होता। एक खिलाड़ी तब और बड़ा बनता है, जब उसकी सफलता किसी दूसरे बच्चे को सपना देखने की हिम्मत देती है।
साथियो,
मैं समाज से भी एक आग्रह करना चाहता हूँ। दिव्यांगजनों को सहानुभूति की नहीं, समान अवसरों की आवश्यकता है। उन्हें दया नहीं, गरिमा चाहिए। उन्हें अलग पहचान नहीं, समान भागीदारी चाहिए। यदि हम अपने विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, खेल परिसरों, कार्यालयों और सार्वजनिक स्थानों को पूर्णतः सुलभ बना दें, तो हमारे लाखों दिव्यांग युवा अपनी प्रतिभा से देश को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा सकते हैं।
आज आवश्यकता समावेशी बुनियादी ढांचा, समावेशी शिक्षा, समावेशी खेल, और समावेशी रोज़गार की है। यही विकसित भारत की पहचान होगी।
देवियो और सज्जनो,
भारत सरकार ने वर्ष 2016 में ‘दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम’ लागू कर दिव्यांगजनों के अधिकारों को और अधिक सशक्त बनाया। ‘विकलांग’ के स्थान पर ‘दिव्यांग’ शब्द का उपयोग भी इसी सकारात्मक सोच का प्रतीक है। यह परिवर्तन केवल शब्दों का नहीं, बल्कि दृष्टिकोण का परिवर्तन है।
माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में दिव्यांगजनों के सशक्तिकरण को सुशासन की एक महत्वपूर्ण प्राथमिकता बनाया गया है। ‘सुगम्य भारत अभियान’ के माध्यम से सार्वजनिक भवनों, परिवहन व्यवस्था और डिजिटल सेवाओं को अधिक सुलभ बनाया जा रहा है। यूनीक डिसएबिलिटी आईडी परियोजना ने दिव्यांगजनों को एकीकृत पहचान प्रदान कर सरकारी योजनाओं एवं सेवाओं तक उनकी पहुँच को सरल बनाया है। ‘दीनदयाल दिव्यांग पुनर्वास योजना’, ADIP (Assistance to Disabled Persons) योजना के अंतर्गत सहायक उपकरणों के वितरण, ‘राष्ट्रीय वयोश्री योजना’ के माध्यम से वरिष्ठ दिव्यांगजनों को सहायता उपकरण उपलब्ध कराने तथा ‘प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना’ के अंतर्गत विशेष कौशल प्रशिक्षण जैसी पहलों ने दिव्यांगजनों को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में नई शक्ति प्रदान की है।
शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में भी अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020’ समावेशी शिक्षा पर विशेष बल देती है, जबकि ‘दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016’ ने शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास और सार्वजनिक जीवन में दिव्यांगजनों के अधिकारों को और अधिक मज़बूत किया है। ‘खेलो इंडिया’, पैरा स्पोर्ट्स को बढ़ावा, तथा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पैरा खिलाड़ियों को बेहतर प्रशिक्षण, सुविधाएँ और प्रोत्साहन देकर भारत ने खेलों में भी नई पहचान बनाई है।
इन सभी प्रयासों का मूल उद्देश्य यही है कि दिव्यांगजन कल्याण के पात्र नहीं, बल्कि विकास के साझेदार बनें। आज भारत एक ऐसे समावेशी समाज के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जहाँ प्रत्येक नागरिक को उसकी क्षमता के अनुरूप अवसर, सम्मान और समान भागीदारी सुनिश्चित हो सके।
साथियो,
सेवा ही जीवन का मंत्र है। यह ईश्वर की उपासना का माध्यम और त्याग की सच्ची अभिव्यक्ति है। सेवा किसी उपकार की भावना से नहीं, बल्कि निःस्वार्थ भाव और आत्मीयता से की जानी चाहिए।
सेवा के मार्ग में जाति, छुआ-छूत या मनभेद का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। समाज के हर वर्ग की दुर्बलता दूर किए बिना समर्थ और समृद्ध भारत का निर्माण संभव नहीं है। इसलिए हम सभी को मिलकर जरूरतमंदों की सहायता करने और अधिक से अधिक लोगों को समाजसेवा के लिए प्रेरित करने का संकल्प लेना चाहिए।
स्वामी विवेकानंद ने कहा था, “जो दूसरों के लिए जी रहे हैं, वही वास्तव में जी रहे हैं।” इसी भावना को अपने जीवन में अपनाते हुए हमें ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः’ के आदर्श को साकार करने के लिए मिलकर कार्य करना चाहिए।
मैं कम्पीटेंट फाउंडेशन की पूरी टीम को इस सुंदर पहल के लिए एक बार फिर बधाई देता हूँ।
आज खेल किट प्राप्त करने वाले सभी युवा खिलाड़ियों को मेरी ओर से हार्दिक बधाई और उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएँ। आप खेलिए। आप खिलिए। आप आगे बढ़िए। और एक दिन ऐसा प्रदर्शन कीजिए कि आपके साथ आपका परिवार, आपका विद्यालय, आपका चंडीगढ़ और पूरा भारत गर्व से आपका नाम ले।
आइए, हम सब मिलकर ऐसा वातावरण बनाएँ जहाँ, प्रतिभा को अवसर मिले, मेहनत को सम्मान मिले, खेल को प्रोत्साहन मिले, और हर बच्चे को अपने सपने पूरे करने का अधिकार मिले। इन खिलाड़ियों के सपनों को उड़ान देने के लिए हम सबको अपना योगदान देना होगा।
खेलेंगे तो आगे बढ़ेंगे, मेहनत करेंगे तो जीतेंगे, और साथ चलेंगे तो कोई प्रतिभा पीछे नहीं छूटेगी।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूं।
बहुत-बहुत धन्यवाद।
जय हिन्द!
जय भारत!